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योगेश कुमार सोनी का लेख : असहाय परिवारों को मिले मदद

कोरोना महामारी की वजह से आम आदमी के सामने तमाम तरह की परेशानियां आन खड़ी हुई हैं। लॉकडाउन की वजह से ऐसे परिवारों जिनका घर एक कमाई के सहारे चलता था, के सामने रोटी रोजी का संकट आ गया है। सरकारें अपने-अपने स्तर पर मदद करने की घोषणाएं तो कर रही हैं, लेकिन अभी धरातल पर सब शून्य है। मध्यम व गरीब वर्ग के परिवारों का जीवन कठिनाई की ओर इसलिए चला गया चूंकि इनके पास बैकअप के रूप में किसी भी प्रकार की धनराशि व संपत्ति नहीं होती। केंद्र व राज्य सरकार को योजना बना कर कोरोना से जान गंवाने वालों के असहाय परिवारों की मदद करनी चाहिए। योजना को धरातल पर उतारना भी होगा।

योगेश कुमार सोनी का लेख : असहाय परिवारों को मिले मदद
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योगेश कुमार सोनी 

योगेश कुमार सोनी

कोरोना की वजह से मानव जीवन भारी संकट में आ चुका है, लेकिन अब उन परिवारों की परेशानी बहुत बढ़ गई जिनके घरों की अकेले व्यक्ति के आधार पर जीविका चल रही थी। सरकारें अपने-अपने स्तर पर मदद करने की घोषणाएं तो कर रही हैं, लेकिन अभी धरातल पर सब शून्य है। मध्यम व गरीब वर्ग के परिवारों का जीवन कठिनाई की ओर इसलिए चला गया चूंकि इनके पास बैकअप के रूप में किसी भी प्रकार की धनराशि व संपत्ति नहीं होती। इनमें से बहुत से लोग तो किराए पर भी रहते हैं और ऐसे लोगों को जीवन-यापन करना बहुत बेहद मुश्किल हो रहा है। यदि आंकड़ों पर गौर करें तो कोरोना से देश में अब तक ढाई करोड़ लोग संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से करीब पौने तीन लाख लोगों की मौत हो चुकी है और यह वो आंकड़ा है जो सरकार ने बताया है। यदि सच्चाई पर जाएं तो निश्चित तौर यह दोगुना होगा। यदि इन आंकड़ों का भी वर्गीकरण करें तो मरने वाले 68 प्रतिशत गरीब व मध्यमवर्गीय लोग हैं।

बीते दिनों मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी कोरोना से मरने वालों के परिजनों की मदद करने की घोषणा की है। केजरीवाल ने कहा कि 'मैं ऐसे कई बच्चों को जानता हूं जिन्होंने अपने माता-पिता को कोरोना से खो दिया है। मैं उनका दर्द समझता हूं। इसके अलावा जिन बुजुर्गों ने अपने घर के कमाऊ युवाओं को खो दिया है, उन्हें भी सरकार मदद देगी। दिल्ली सरकार ऐसे बुजुर्गों को आर्थिक मदद मुहैया कराएगी।' सवाल व स्थिति अपनी जगह अडिग है, क्योंकि पीडि़त परिवारों को मदद कब और कैसे मिलेगी इसका अभी कोई अता-पता नही हैं? इनमें से बहुत सारे लोग ऐसे थे जो रोज कमाकर अपना जीवन निर्वाह करते थे, मृतक के घरवालों को मकान मालिकों ने किराए का पैसा न मिलने पर भगाना शुरू कर दिया व राशन वालों ने उधार देना बंद कर दिया। हालात बद से बदतर होने लगे हैं। ऐसे लोग सामाजिक संस्थाओं द्वारा जो खाना मिल जाता है उस ही पर आश्रित हो गए। जिसके परिवार में बूढ़े मां-बाप,पत्नी और बच्चे हैं और उनका कमाने वाला चला गया उन परिवारों की स्थिति बेहद दननीय होती जा रही है। ऐसे स्थिति में बूढ़े मां-बाप कमा नहीं सकते। पत्नी छोटे बच्चों को छोड़कर जा नहीं सकती। यदि कुछ महिलाएं जा भी सकती हैं तो लॉकडाउन की वजह से उन्हें कोई काम नही मिल रहा।

ऐसे लोगों के लिए सरकार को बेहद गंभीरता से सोचने की जरूरत है, चूंकि जो कोरोना से मर गया वहां तो कोई कुछ नहीं कर सका, लेकिन ऐसे लोग मात्र भूख से ही मर जाएंगे तो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाएगा। यहां अन्य मामलों की तरह घोषणाओं को लटकाते हुए काम नहीं चलेगा, चूंकि इस बार मामला मानव जीवन पर संकट और बुनियादी जरूरत का है। यदि लोग भूख से मरने लगे तो यहां सरकार पर कई तरह के सवालिया निशान खड़े हो जाएंगे, जिसकी शुरुअात होने लगी है। इसके अलावा सबसे बड़ी चिंता का विषय यह भी है कि जिन लोगों को अस्पतालों में बेड नहीं मिला और वह बिना इलाज के ही मर गए, उन लोगों को सरकार अपने आंकड़े में नहीं गिन रही। इस दिशा में एक कमेटी गठित करके जांच के आधार ऐसे परिवारों को भी मदद देने की जरूरत है। यहां केन्द्र व राज्य सरकारों को बड़े एक्शन ऑफ प्लान की आवश्कता है। सवाल यह है कि ऐसे में सरकारें अपनी राजनीति चमकाने व उपस्थिति दर्ज कराने के चक्कर में जनता को निशाना न बना लें।

उदाहरण के तौर पर यदि हम राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां का वासी केन्द्र व राज्य सरकार के आपसी मतभेद की भेंट चढ़ जाता है। हर मामले पर केजरीवाल कहते हैं कि हम केंद्र सरकार से कुछ मांगते हैं तो वह देती नहीं। केजरीवाल ने अपने स्तर कोरोना से पीडि़त परिवारों की मदद का जो ऐलान किया है तो वह उसकाे जल्द से जल्द पूरा करें। यदि वो अन्य घोषणाओं की तरह इसमें राजनीति कर गए तो जनता के साथ नाइंसाफी हो जाएगी। चूंकि इस बार जरूरत किसी योजना के लाभ से नहीं जुड़ी अब तो मामला भूख से मरने का हो गया। हालात बेचैन करने वाले बन चुके हैं।

पिछले वर्ष लॉकडाउन में केजरीवाल ने मकान मालिकों से किराया न लेने की अपील की थी, लेकिन उसके लिए कोई कानूनी खाका तैयार नहीं किया था और उसका परिणाम यह हुआ कि किसी भी मकान मालिक ने किसी भी प्रकार की कोई मदद नहीं की। कुछ घटिया मानसिकता के लोगों ने तो किराएदारों का सामान घर से बाहर फेंक दिया था। ऐसे मामलों में पुलिस भी कोई सहायता नहीं कर पाई थी। केजरीवाल या अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मदद की घोषणाओं के बाद जरूरतमंद टकटकी लगाए बैठे हैं कि सरकार हमें बचा लेगी, इसलिए तुरंत प्रभाव के साथ पूरे देश में इस मामले को लेकर एक जैसा नियम लागू होना चाहिए। इस बार केंद्र सरकार का स्वास्थ्य बजट 94,452 करोड़ था, लेकिन कोरोना संकट के चलते बढ़ाकर 2,23,846 करोड कर दिया। इस बजट में 35000 करोड़ की वैक्सीन भी शामिल है, लेकिन यहां अहसहाय परिवारों की मदद के लिए थोड़ा सा और बजट बढ़ाया जाए।

अपने-अपने देश की जनता के लिए आर्थिक मामलों पर विश्वस्तरीय चर्चा करें, तो अमेरिका ने पिछले वर्ष कोरोना से मरने वालों के परिजनों व लॉकडाउन की वजह से 17.5 करोड़ डॉलर के पैकेज के द्वारा मदद की थी व इस वर्ष भी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 139 राहत पैकेज का ऐलान किया है। इसके तहत हर अमेरिकी को खाते में करीब एक लाख रुपये मिलेंगे। इसके अलावा रूस, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब व अन्य तमाम देशों ने अपने नागरिकों को आर्थिक मदद करके उन्हें संकट में नहीं आने दिया। हमारे देश में संदर्भ में चर्चा करें तो अधिक जनसंख्या का होना हमें पिछड़ा बनाता है। पूरी दुनिया में लगभग साढ़े सात सौ करोड़ हैं लोग हैं जिनमें से एक तिहाई हमारे देश और चीन में रहते हैं। अधिक जनसंख्या में एक समान किसी भी चीज का लागू करना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन वैश्विक आपदा से निपटने के लिए काम करना होगा। वहीं दूसरी ओर हमारे देश में दलालों का होना भी हमे उभरने नहीं देता। गांव में शौचालयों की योजना में एक घर में एक बजाय तीन शौचालय बताकर घपला किया। सर्वे करने वालों ने आधे पैसे स्वयं लिए व आधे लाभकारी को दिए। यह तो केवल एक योजना के घपले का उदाहरण है, लेकिन यहां केंद्र व राज्य सरकारों को स्वयं धरातल पर उतरकर काम करना होगा। यदि यह काम राज्य स्तर करना है तो उसके लिए मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की जाए और तुरंत प्रभाव से आदेश दिया जाए और यदि यह केंद को अपने संरक्षण में करना है तो भी जल्द से जल्द खाका तैयार कर जरूरतमंदों को लाभ पहुंचाया जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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