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डॉ. जयंतीलाल भंडारी का लेख : मानव विकास की ऊँचाई भी जरूरी

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस वर्ष 2022 में भारत की अर्थव्यवस्था में 7.5 फीसदी वृद्धि करने की आशा है, जो विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक होगी। वहीं हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के द्वारा प्रकाशित मानव विकास सूचकांक 2021 में 189 देशों की सूची में भारत 132वें पायदान पर पाया गया है। पिछले वर्ष 2021 में प्रकाशित इस सूचकांक में भारत 131वें पायदान पर था। यानी हम फिसल रहे हैं। आर्थिक व मानव विकास के बीच विरोधाभासी तस्वीर है। हमें आर्थिक के साथ साथ मानव विकास की ऊँचाई भी हासिल करनी है।

डॉ. जयंतीलाल भंडारी का लेख :  मानव विकास की ऊँचाई भी जरूरी
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डॉ. जयंतीलाल भंडारी 

यद्यपि भारत विकास दर के मामले में दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते हुए दिखाई दे रहा है, लेकिन मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के मामले में भारत अभी बहुत पीछे के पायदान पर है। जहाँ 16 सितंबर को उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस वर्ष 2022 में भारत की अर्थव्यवस्था में 7.5 फीसदी वृद्धि करने की आशा है, जो विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक होगी। वहीं हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के द्वारा प्रकाशित मानव विकास सूचकांक 2021 में 189 देशों की सूची में भारत 132वें पायदान पर पाया गया है। पिछले वर्ष 2021 में प्रकाशित इस सूचकांक में भारत 131वें पायदान पर था। यानी हम फिसल रहे हैं। आर्थिक व मानव विकास के बीच विरोधाभासी तस्वीर है।

यूएनडीपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 के कारण 32 वर्षों में पहली बार दुनिया भर में मानव विकास ठहर सा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक जीवन प्रत्याशा, स्वास्थ्य व शिक्षा की बड़ी चुनौतियों के बीच भी भारत के द्वारा कोरोना संकट का बेहतर तरीके से सामना किए जाने से भारत एचडीआई रैंकिंग में केवल एक पायदान पीछे हुआ है। रिपोर्ट से यह भी मालूम होता है कि मानव विकास सूचकांक 2021 में जहाँ बांग्लादेश व चीन जैसे देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं, वहीं मलेशिया और थाईलैंड जैसे एशियाई पड़ोसी देश भी अत्यधिक उच्च श्रेणी में दिखाई दे रहे हैं। निसंदेह देश की तेजी गति से बढ़ती और इस समय दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा हासिल करने वाले भारत में मानव विकास सूचकांक में कमी आना विचारणीय प्रश्न है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि कोविड-19 ने भारत में गरीबी और भूख की चुनौती को बढ़ाया है। पिछले दशक में देश में जिस तेजी से गरीबी और भूख की चुनौती में कमी आ रही थी, उसे अकल्पनीय कोरोना संकट ने बुरी तरह प्रभावित किया है।

उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र के द्वारा प्रकाशित द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड रिपोर्ट-2022 के अनुसार एक ओर जहाँ दुनिया में भुखमरी पिछले 15 साल से लगातार बढ़ रही है और इसकी रफ्तार पिछले दो साल में तेज हुई है, वहीं दूसरी ओर भारत में पिछले 15 साल में भूख से जंग के मोर्चे पर थोड़ा सुधार हुआ है और कोरोनाकाल में इसकी रफ्तार नियंत्रित रही है। रिपोर्ट बताती है कि 2004 में भारत की 24 करोड़ आबादी कुपोषित थी, यह संख्या घटते हुए 2021 में 22.4 करोड़ पर पहुँच गई है। देश में मानव पूंजी के निर्माण में कोरोना महामारी ने जोखिम बढ़ाई है। महामारी का आर्थिक प्रकोप मध्यम वर्ग और वंचित परिवारों के लिए बहुत अधिक रहा है, जिसके चलते कई परिवार स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के मामले में पीछे हुए हैं।

लेकिन इसमें भी कोई दो मत नहीं है कि जहाँ सरकार गरीबी, भूख परिवार कल्याण और स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाते हुए आगे बढ़ी है, वहीं कोविड-19 के बाद इन सभी क्षेत्रों में सरकार ने और अधिक प्रभावी पहल की है और जो अभियान चलाए उन्हें हर व्यक्ति अनुभव कर रहा है और दुनिया के विभिन्न वैश्विक संगठनों ने भी इसकी सराहना की है। यदि कोरोनाकाल में सरकार के ऐसे विशिष्ट सफल अभियान नहीं होते तो देश में गरीबी भूख, स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा और शिक्षा के क्षेत्र की चुनौतियों और दिखाई देती। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि देश में आम आदमी के कल्याण के लिए लागू की गई विभिन्न सरकारी योजनाएँ मसलन प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्य योजना (पीएमजीकेवाई) सामुदायिक रसोई, वन नेशन, वन राशन कार्ड, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत पोषण अभियान, समग्र शिक्षा जैसी योजनाएँ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गरीबी के स्तर में कमी और स्वास्थ्य व भूखमरी की चुनौती को कम करने में सहायक रही हैं। कोरोना काल में प्रचुर खाद्यान्न उत्पादन के कारण मुफ्त खाद्यान्न की आपूर्ति से गरीबों को राहत मिली है और करोड़ों लोगों को गरीबी में फंसने से बचाया गया है।

अब देश में लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार के साथ-साथ उनके जीवनस्तर को ऊपर उठाने की दिशा में अब लम्बा सफर तय करना है। 2017 में नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में 2025 तक स्वास्थ्य पर खर्च को सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत किया जाना निर्धारित किया गया था। फिर पंद्रहवें वित्त आयोग ने पहली बार स्वास्थ्य के लिए उच्च-स्तरीय कमेटी गठित की थी। इस कमेटी ने भी स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने की बात कही है। इस मामले में देश अभी भी पीछे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बनाए गए 'कमीशन ऑन मैक्रो इकॉनॉमिक्स एंड हेल्थ' ने इस बात के पुख्ता सुबूत दिए कि स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च व्यय नहीं बल्कि एक बेहतरीन निवेश है। यूरोपीय देशों ने महामारियों और संचारी रोगों को आर्थिक विकास और मानवीय कल्याण के लिए खतरे के रूप में देखा है। इन देशों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करने पर बड़ा निवेश किया है। पिछले दशकों में यूरोप में तेजी से बढ़ी जीवन प्रत्याशा और आर्थिक वृद्धि, दोनों ही मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं और स्वस्थ जनमानस के कारण ही परिलक्षित हुई हैं। ऐसे में देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ाया जाना जरूरी है।

कोविड-19 के बाद देश में डिजिटल शिक्षा की जरूरत बढ़ गई है और इसकी अहमियत रोजगार में भी बढ़ गई है। ऐसे में देश की नई पीढ़ी के लिए अधिक से अधिक करियर के मौके जुटाने के लिए एक ओर सरकार के द्वारा डिजिटल शिक्षा के रास्ते में दिखाई दे रही कमियों को दूर करना होगा। दूसरी ओर लगातार बदलती हुई रोजगार की दुनिया के अनुरूप नए स्किल्स सीखने होंगे। अधिक दक्ष व योग्य श्रम बल के लिए शिक्षा पर जीडीपी का करीब छह फीसदी हिस्सा खर्च किया जाना जरूरी है।

हम उम्मीद करें कि सरकार यह ध्यान रखेगी कि आर्थिक विकास के साथ मानव विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सरकार द्वारा सामाजिक अधोसंरचना पर उसी तरह निवेश किया जाएगा, जिस तरह भौतिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किया जा रहा है। देश में बहुआयामी गरीबी, भूख और कुपोषण खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा घोषित नई जनकल्याण योजनाओं, सामुदायिक रसोई व्यवस्था तथा पोषण अभियान-2 को सफल बनाया जाएगा। ऐसे में हम उम्मीद करें कि सरकार यूएनपीडी की मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2021 के मद्देनजर देश में मानव विकास की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, न्यायसंगत और उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, सार्वजनिक सेवाओं में स्वच्छता जैसे मुद्दों पर रणनीतिक रूप से प्रभावी कदमों के साथ आगे बढ़ेगी। निश्चित रूप से ऐसा होने पर आगामी वर्ष प्रकाशित होने वाले मानव विकास सूचकांक 2022 में भारत की मानव विकास रैंकिंक में सुधार आएगा।

(लेखक डॉ. जयंतीलाल भंडारी अर्थशास्त्री हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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