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एसवाईएल पर हरियाणा को शीर्ष कोर्ट से राहत

राजनीति के लिए दिल्ली की सीएम अरविंद केजरीवाल सरकार ने जिस तरह पंजाब का पक्ष लिया, यह भी संघीय ढांचे के खिलाफ है।

एसवाईएल पर हरियाणा को शीर्ष कोर्ट से राहत

सतलुज यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) पर पंजाब सरकार के मनमानी भरे फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने ब्रेक लगाकर हरियाणा सरकार को बड़ी राहत पहुंचाई है। जाट समेत पांच जातियों के लिए आरक्षण का फार्मूला तैयार करने में पसीने बहा रही मनोहर सरकार के सामने एसवाईएल का मुद्दा यूं आ जाने से दो राज्यों के बीच 'पानी' के लिए सियासी 'संग्राम' शुरू हो गया था। पंजाब सरकार ने एसवाईएल नहर मसले पर जिस तेजी से सियासी दांव खेला, उसमें हरियाणा के लिए बहुत ही असहज स्थिति पैदा हो गई।

दरअसल, हरियाणा के लिए एसवाईएल नहर लाइफलाइन बनने वाली है, इस नहर से प्रदेश की पानी की बड़ी जरूरत पूरी होगी। इससे दक्षिण हरियाणा के बड़े हिस्से को पानी मिलेगा। 1990 तक इस नहर के एक बड़े हिस्से को पूरा भी कर लिया गया था। लेकिन पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव को देखते हुए सीएम प्रकाश सिंह बादल की शिरोमणि अकाली दल सरकार ने एसवाईएल के लिए अधिग्रहीत 3928 एकड़ जमीन किसानों को वापस देने का फैसला कर लिया। इसे आनन-फानन में सर्वसम्मति से विधानसभा में पारित भी करवा दिया। जिसमें किसानों की सहानुभूति पाने के मकसद से सभी जमीन मुफ्त में ही लौटाने का प्रावधान कर दिया। यानी कि जमीन लेते वक्त किसानों को सरकार ने जो मुआवजा दिया गया था, वह उनसे वापस नहीं लेने की बात कही।

पारित बिल को राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी के पास मंजूरी के लिए भेज दिया। इतना ही नहीं पंजाब सरकार ने नहर को भरवा कर खेत बनाने में जो भी खर्च आएगा, उसे भी उठाने की घोषणा कर दी। तुरंत हरियाणा के सीएम मनोहर लाल को करीब 192 करोड़ का चेक भी भिजवा दिया। राजनीतिक र्शेय लेने के लिए कांग्रेस के कुछ विधायक नहर को भरना भी शुरू कर दिया। बादल सरकार सबकुछ इतनी तेजी से कर रही थी, मानो पंजाब में जलजला आ रहा हो या आज ही चुनाव हो। हालांकि इस तेजी के पीछे वजह सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई थी, जो इसी हफ्ते शुरू हुई थी।

सर्वोच्च अदालत ने 2004 के पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट की वैधता और हरियाणा सरकार की एसवाईएल पर याचिका की सुनवाई शुरू की थी, इस पर कुछ भी फैसला आता, इससे पहले ही पंजाब ने अधिग्रहीत जमीन वापस करने का एकतरफा निर्णय ले लिया। जिसका हरियाणा ने कड़ा विरोध किया, उसे सुप्रीम कोर्ट में जाना पड़ा।

शीर्ष कोर्ट ने पंजाब सरकार को कड़ी फटकार लगाई और चुपचाप देखते नहीं रहने की सख्त टिप्पणी करते हुए यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए। 2002 में भी सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब को एक साल के भीतर एसवाईएल को पूरा करने का निर्देश दिया था, पर पालन नहीं हुआ। ऐसा पहली बार नहीं है कि पंजाब में एसवाईएल पर राजनीति हुई हो, 2004 में कांग्रेस की अमरिंदर सरकार ने विस में पारित कर जल समझौते को रद कर दिया था। 40 साल से एसवाईएल मामला लटका हुआ है। 1966 में जब हरियाणा बना तो पंजाब पुनर्गठन एक्ट के तहत में पानी देना तय हुआ था। 1976 में एसवाईएल पर काम भी शुरू हुआ।

लेकिन तब से किसी न किसी बहाने पंजाब इसे पूरा नहीं करने के लिए तिकड़म करता आया है। पंजाब में बादल सरकार और हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो सरकार के समय उम्मीद बनी थी कि एसवाईएल पूरा हो जाएगा, क्योंकि दोनों परिवार के प्रगाढ़ रिश्ते जगजाहिर है। लेकिन इनेलो भी राजनीति ही करता रहा। पंजाब को संघीय ढांचे का सम्मान करना चाहिए और हरियाणा को उसका हक देने से इनकार नहीं करना चाहिए। राजनीति के लिए दिल्ली की सीएम अरविंद केजरीवाल सरकार ने जिस तरह पंजाब का पक्ष लिया, यह भी संघीय ढांचे के खिलाफ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जैसे तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी जल विवाद सुलझ गया था, वैसे ही पंजाब और हरियाणा में भी एसवाईएल का हल हो जाएगा।

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