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डाॅ. गौरीशंकर राजहंस का लेख : चीन पर विश्वास करना कठिन

अनेक वर्षों से चीन भारत के साथ धोखेबाजी करता रहा और हम उसकी धोखेबाज की असलियत नहीं पहचान पाए। अनेक वर्ष पहले चीन ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को धोखा दिया था। हम चीन के झूठे आश्वासनों पर भरोसा करते रहे। चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने भारत आकर पंडित नेहरू से बड़े मीठे वादे किए और चीन लौटकर अपनी फौज को आदेश दे दिया कि वह भारत पर चढ़ाई कर दे। चीन की कथनी आैर करनी में अंतर होता है। वह दोस्ती की दुहाई देता है, परंतु उसकी नीयत में खोट है। समय आ गया है जब हम इतिहास से सबक लें और चीन की चिकनी चुपड़ी बातों में न उलझ जाएं।

डाॅ. गौरीशंकर राजहंस का लेख : चीन पर विश्वास करना कठिन
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प्रतीकात्मक फोटो

डाॅ. गौरीशंकर राजहंस

भारत और चीन के वरिष्ठ सैनिक अधिकारियों ने कई दौर की बातें की। हर बार ऐसा ही लगता रहा कि शायद सीमा विवाद पर कोई समझौता हो जाएगा, परंतु चीन के कहने और करने में जमीन-आसमान का अंतर होता है। चीन हमेशा दोस्ती की दुहाई देता है, परंतु असल में उसकी नीयत में खोट है।

पीछे मुड़कर देखें तो चीन हमेशा से विस्तारवादी देश रहा है। उसकी मंशा आस-पड़ोस के देशों के भूभाग को हथिया लेने की रही है। अभी भी चीन बातचीत में नरम रुख अपनाता है, परंतु उसके प्रवक्ता बार-बार कहते हैं कि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश भारत के हिस्से नहीं हैं। भारत ने कई बार उसे मुंहतोड़ जवाब दिया है और उसे कहा है कि भारत के आंतरिक मामलों में चीन दखल नहीं दे।

चीन को दो टूक संदेश दे दिया गया है कि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश सदा से भारत का हिस्सा थे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे। चीन को किसी भी हालत में भारत के आंतरिक मामलों में बोलने का कोई हक नहीं है।

एक तरफ तो चीन कहता है कि वह भारत के सैनिक और राजनीतिक नेतृत्व के साथ बात कर रहा है और दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति चिनफिंग ने अपने सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार रहने का संदेश दे दिया है। चीन सीमाई क्षेत्र में भारत द्वारा बुनियादी ढांचे के विकास का घोर विरोध कर रहा है इस कारण भी तनाव बढ़ता जा रहा है। हाल में भारत के रक्षा मंत्री ने चीन से कहा है कि वह किसी भी हालत में इस तरह के ढांचे का विकास करना बंद नहीं करेगा। हाल में भारत ने सीमा पर कई समरिक दृष्टि से मजबूत पुल और सड़क बनाए हैं। यह देखकर चीन जल भुन गया है।

पीछे मुड़कर देखने से ऐसा लगता है कि अनेक वर्षों से चीन भारत के साथ धोखेबाजी करता रहा और हम उसकी धोख्ेाबाज की असलियत नहीं पहचान पाए। अनेक वर्ष पहले चीन ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भयानक धोखा दिया था। पंडित नेहरू हमेशा यही सोचते रहे कि भारत की तरह चीन भी पश्चिमी ताकतों का सताया है और चीन को आजादी मिल जाएगी तब वह भारत का परम मित्र बन जाएगा। इसी कारण हम चीन के झूठे आश्वासनों पर भरोसा करते रहे। यहां तक कि चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने भारत आकर पंडित नेहरू से बड़े मीठे वादे किए और चीन लौटकर अपनी फौज को आदेश दे दिया कि वह भारत पर चढ़ाई कर दे। भारत इसके लिए तैयार नहीं था। यहां तक कि कपड़े के जूते पहनकर भारतीय फौज ने चीन का मुकाबला किया था। दुर्भाग्यवश इस लड़ाई में भारत की हार हो गई थी। उसके बाद अनेक ऐसे अवसर आए जहां छिटपुट लड़ाइयों में भारत ने चीन को शिकस्त दी थी।

भारत चीन से यह मांग कर रहा है कि चीन ने एलएसी से लगे भूभाग पर अतिक्रमण किया है वह वहां से हट जाए और उस समय की स्थिति बहाल करे। चीन झूठे वादे करता है, परंतु हर बार कोई न कोई बहाना करके वहां से हटने का नाम नहीं ले रहा है।

दोनों देशों के सैनिक अधिकारियों के बीच जो वार्ता होती है उसके ठीक विपरीत चीन का विदेश मंत्रालय भारत के खिलाफ एकदम कटु आलोचना करते हुए कहता है कि वह किसी भी हालत में लद्दाख कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं देगा। इसके जवाब में भारत के रक्षा मंत्री ने दो टूक कह दिया है कि चीन को जो समझना है, वह समझे परंतु अपनी जबान पर नियंत्रण रखे। यदि वह अपनी जबान पर लगाम नहीं लगा सकता तो इस बात के लिए तैयार रहे कि भारतीय सेना उसे मुंहतोड़ जवाब देगी।

चीन ने सीमा पर हजारों हथियारबन्द सैनिकों का जमावड़ा कर लिया है जिसका सीधा अर्थ यह है कि वह लड़ाई करने की तैयारी कर रहा है। अभी भारत के विदेश मंत्री ने न्यूयार्क में कहा कि जिस तरह से हजारों हथियारबंद सैनिक लद्दाख में सीमा पर चीन इकट्ठे कर रहा है जिसका सीधा अर्थ है कि चीन लड़ाई की तैयारी कर रहा है। सच कहा जाए तो यह एक तरह की गीदड़भभकी है, क्योंकि चीन इस बात को अच्छी तरह जानता है कि भारत की फौज पहाड़ पर लड़ाई करने के लिए तैयार है। करगिल में भी भारतीय सेना ने कितनी बहादुरी से पाकिस्तान सेना को धूल चटा दी थी जो चीन के लिए एक सबक है कि यदि उसने कोई बेवकूफी की तो उसकी सजा चीन को अवश्य मिलेगी।

पीछे मुड़कर देखने से लगता है कि हमने उस समय भारी गलती कर ली जब चीन ने तिब्बत को हड़प लिया था। तिब्बत हमेशा से भूटान और सिक्किम की तरह भारत ही का एक हिस्सा था जहां भारतीय मुद्रा का चलना होता था। भारतीय सेना की एक मजबूत टुकड़ी थी। आंतरिक सुरक्षा के लिए भारत के सैनिक होते थे, परंतु भारत के साथ धोखा करके चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। जब भारत ने विरोध किया तब चाउ एन लाई ने प्रधानमंत्री नेहरू को आश्वस्त किया कि तिब्बत की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहेगी। हुआ ठीक इसके विपरित। चीन ने तिब्बत के सभी बौद्ध मठों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया और धोखे से दलाई लामा को गिरफ्तार कर बीजिंग ले जाने की योजना बनाने लगा। दलाई लामा को उनके विश्वस्त अनुयायियों ने जब इसकी सूचना दी तो वे सैकड़ों की संख्या में घोड़े और खच्चरों पर सवार होकर भारत में प्रवेश कर गए जहां पंडित नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण दे दी। दलाई लामा इस तरह भाग खड़े होंगे और भारत उन्हें राजनीतिक शरण दे देगा, इसकी चीन ने कभी कल्पना नहीं की थी। उसके बाद चीन बार बार भारत से आग्रह करता रहा कि दलाई लामा को भारत चीन के सुपुर्द कर दे, परंतु भारत ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद जो कुछ हुआ वह सभी को ज्ञात है। 1962 में चीन ने भारत पर चढ़ाई कर दी और उस दर्द को भारत आज तक नहीं भूला है।

समय आ गया है जब हम इतिहास से सबक लें और चीन की चिकनी-चुपड़ी बातों में न उलझ जाएं। भारत ने सीमा पर मजबूत इन्फ्रास्ट्ेक्चर बनाकर चीन को मुंह तोड़ जवाब दिया है। प्रधानमंत्री सहित भारत के बड़े नेता और सेना के वरिष्ठ अधिकारी सीमा पर जाकर सेना का मनोबल बढ़ा आए हैं। आज पूरा देश भारत के प्रधानमंत्री के साथ है। भारत की फौज का मनोबल बहुत ऊंचा है और वह किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है। चीनी मीडिया खबर फैला रहा है कि भारत की फौज कड़ाके की ठंड को सहन नहीं कर पाएगी, परंतु इस तरह का प्रचार शत-प्रतिशत भ्रामक है, भारत ने पहले से ही ठंड का सामना करने का प्रबंध कर उस क्षेत्र में भरपूर रसद-पानी और सैनिक साजो सामान जमा कर लिया है। कुल मिलाकर यही लगता है कि चीन यदि बेवकूफी कर आक्रमण करने का मन बनाएगा तो उसे निश्चित ही इसका खामियाजा भुगतनाा पड़ेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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