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गांवों के लिए गाइडलाइन से इलाज में मिलेगी मदद

इस गाइडलाइन के मुताबिक, आशा कार्यकर्ताओं को जुकाम-बुखार की मॉनिटरिंग और संक्रमित मामलों में कम्युनिटी हेल्थ अफसर को फोन पर केस देखने के निर्देश दिए गए हैं। एएनएम को भी रैपिड एंटीजन टेस्ट की ट्रेनिंग दिए जाने की बात कही गई है। हर गांव में आशा वर्कर्स जुकाम-बुखार के मामलों की निगरानी करेंगी।

गांवों के लिए गाइडलाइन से इलाज में मिलेगी मदद
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : एक तरफ जहां सकारात्मक चीजें शुरू हुई हैं, वहीं नकारात्मक चीजें भी घटित हो रही हैं। चार-पांच दिनों से नए केस की रफ्तार सुस्त हुई है, रिकवरी दर बढ़ी है, लोग कम संकमित हो रहे हैं, अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ी हैं, ऑक्सीजन की आपूर्ति सुधरी है, दवाओं की किल्लत भी कम हुई है, फिर से वैक्सीनेशन ड्राइव में तेजी आई है तो दूसरी तरफ अस्पतालों में इलाजरत संक्रमितों की मौतों की गति में कमी नहीं आ रही है, इससे लोगों में दहशत है, कोरोना से ठीक हुए लोगों पर ब्लैक फंगस का नया खतरा बढ़ा है और अब यह शहर से बाहर निकल कर गांवों को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है।

चिंता की बात है कि गांवों में स्वास्थ्य सुविधा की हालत खस्ता है, वहां डॉक्टर, नर्स, अस्पताल, बेड, दवा, वेंटिलेटर, एंबुलेंस, ऑक्सीजन आदि सबकी कमी है, साथ ही बिजली व इंटनरनेट स्पीड की भी दिक्कत है। स्वास्थ्य, साफ-सफाई, गुणवत्तापूर्ण खान-पान के प्रति भी जानकारी कम है। ऐसे में कोरोना का फैलाव गांवों में अधिक कहर ढा सकता है। अभी जिन-जिन गांवों में कोविड ने पांव पसारे हैं, वहीं मौतें अधिक हो रही हैं। सरकार ने गांवों में कोविड पर नियंत्रण पाने के लिए अलग से गाइडलाइन जारी कर स्वागत योग्य कदम उठाया है। इस गाइडलाइन के मुताबिक, आशा कार्यकर्ताओं को जुकाम-बुखार की मॉनिटरिंग और संक्रमित मामलों में कम्युनिटी हेल्थ अफसर को फोन पर केस देखने के निर्देश दिए गए हैं। एएनएम को भी रैपिड एंटीजन टेस्ट की ट्रेनिंग दिए जाने की बात कही गई है। हर गांव में आशा वर्कर्स जुकाम-बुखार के मामलों की निगरानी करेंगी। इनके साथ हेल्थ सैनिटाइजेशन और न्यूट्रिशन कमेटी भी रहेगी। देश के ग्रामीण क्षेत्र में आशा वर्कर्स का व्यापक जाल है। जिन मरीजों में कोरोना के लक्षण पाए जाएंगे, उन्हें ग्रामीण स्तर पर कम्युनिटी हेल्थ अफसर (सीएचओ) तत्काल फोन पर देखेंगे। पहले से गंभीर बीमारियों से पीड़ित संक्रमितों या ऑक्सीजन लेवल घटने के केसों को बड़े स्वास्थ्य संस्थानों को भेजा जाएगा। जुकाम-बुखार और सांस से संबंधित इन्फेक्शन के लिए हर उपकेंद्र पर आीपीडी चलाई जाएगी। दिन में इसका समय निश्चित करना पड़ेगा।

संदिग्धों की पहचान होने के बाद उनकी स्वास्थ्य केंद्रों रैपिड एंटीजन टेस्टिंग (आरएटी) जांच होगी या फिर उनके सैंपल नजदीकी कोविड सेंटर्स में भेजे जाएंगे। स्वास्थ्य अधिकारियों और एएनएम को आरएटी की ट्रेनिंग दी जाएगी। हर स्वास्थ्य केंद्र और उप केंद्र पर आरएटी की किट उपलब्ध कराई जाएगी। स्वास्थ्य केंद्रों पर टेस्ट किए जाने के बाद मरीज को तब तक आइसोलेट होने की सलाह दी जाए, जब तक उनकी टेस्ट रिपोर्ट नहीं आ जाती। जिन लोगों में कोई लक्षण नहीं नजर आ रहा है, लेकिन वे किसी संक्रमित के करीब गए हैं और बिना मास्क या 6 फीट से कम दूरी पर रहे हैं, उन्हें क्वारंटीन रखने की बात कही गई है। मरीज होम आइसोलेशन के दौरान केंद्र की मौजूदा गाइडलाइंस का पालन करेंगे। परिवार के सदस्य भी गाइडलाइन के हिसाब से ही क्वारंटीन रहेंगे।

कोरोना मरीज के ऑक्सीजन लेवल की जांच बेहद जरूरी है। इसके लिए हर गांव में पर्याप्त मात्रा में पल्स ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर होने चाहिए। आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और गांवों के स्वयंसेवियों के जरिए एक ऐसा सिस्टम डेवलप किया जाए, जिसमें मरीजों को लोन पर जरूरी उपकरण आसानी से मिले। होम आइसोलेशन किट- पैरासीटामॉल 500mg, आइवरमेक्टीन टैबलेट, कफ सिरप, मल्टीविटामिन देने की बात कही गई है। एसिम्प्टोमैटिक सैंपलिंग के 10 दिन बाद और लगातार 3 दिन बुखार न आने की स्थिति में मरीज होम आइसोलेशन खत्म कर सकता है और इसके बाद टेस्टिंग की भी जरूरत नहीं है। इन उपायों से गांवों में कोरोना पर काबू पाया जा सकता है।

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