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जीएसटी से करों में सुधार

जीएसटी का लागू होना सबसे बड़ा सुधार होगा

जीएसटी से करों में सुधार
नई दिल्ली.जीएसटी (गुड्स एवं सर्विस टैक्स) वह मूल्य संवद्र्घित कर (वैट) है जिसे वस्तुओं एवं सेवाओं दोनों पर लागू किया जाएगा। यह अप्रत्यक्ष कर की र्शेणी में आता है। इस समय वैट केवल वस्तुओं पर लागू होता है। जीएसटी लागू होने के बाद बिक्री कर, सेवा कर, उत्पाद शुल्क वैट आदि तमाम तरह के कर हटा दिए जाएंगे। इससे पूरे देश में एक समान कर की प्रणाली लागू हो जाएगी।
अधिसंख्य राज्यों ने जीएसटी को लागू करने की हामी भर दी है। इस पर तैयार मसौदे को मंजूरी मिल गई है। मूल्य संवद्र्घित कर (वैट) के 2005 में अस्तित्व में आने के बाद जीएसटी का लागू होना सबसे बड़ा सुधार होगा। इसकी संरचना दोहरी किस्म की होगी। पहले स्तर पर केंद्र सरकार इसे वसूलेगी। दूसरे स्तर पर राज्य इसे लगाएंगे। अलग-अलग उत्पादों के लिए कर की दर एक ही होगी। कर वसूलने का काम एक ही एजेंसी करेगी। वस्तुओं की निर्माण प्रक्रिया के विभिन्न स्तर पर इसे लगाने की बजाय एक ही बार वसूला जाएगा।
केंद्र, राज्य एवं स्थानीय निकायों द्वारा लिए जाने वाले विभिन्न अप्रत्यक्ष करों के बजाय एकीकृत रूप से जीएसटी वसूला जाएगा। इससे जहां राजस्व बढ़ेगा वहीं राजकोषीय घाटे में कमी आएगी। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। विभिन्न प्रकार के करों का बोझ कम होने से वस्तुओं के दाम कम होंगे और सीधा फायदा उपभोक्ताओं को मिलेगा।
ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, हांगकांग, न्यूजीलैंड, सिंगापुर जैसे देशों में जीएसटी पहले से मौजूद है। वहां इसे और सख्त बनाया गया है। मसलन यहां एक ही स्तर से जीएसटी लागू किया गया है जबकि भारत ने इसकी दोहरी प्रणाली अपनाई है। इसके लागू हो जाने से उन विदेशी कंपनियों के भी भारत आने का रास्ता खुल जाएगा जो वर्तमान कर प्रणाली के मकड़जाल के कारण भारत में पूंजी निवेश और कारोबार से कतरा रही हैं पर लागू करने में सबसे बड़ा रोड़ा कांग्रेस है।
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि कांग्रेस जानबूझकर जीएसटी की राह रोके हुए है। यह तब है जब जीएसटी का एक तरह से उसका अपना ही विधेयक है और जब भी यह विधेयक पारित होगा तो उसका कुछ न कुछ शेयर उसके खाते में भी जाएगा। बेहतर हो कि कांग्रेस जीएसटी के मामले में न केवल तार्किक रवैये का परिचय दे बल्कि देशहित को भी प्राथमिकता दे। आर्थिक मामलों को संकीर्ण राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
लेकिन कांग्रेस ऐसा ही कर रही है। उसके सहमति-असहमति के बिंदु समय और सुविधा के अनुसार बदल रहे हैं। फिलहाल मामला बिल में कर की दर लिखने को लेकर अटका हुआ है। कांग्रेस की इस राय से भाजपा सहमत है कि जीएसटी को 18 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, लेकिन उसका मानना है कि संविधान संशोधन विधेयक के मसौदे में यह लिखना ठीक नहीं है।
लोकसभा में भाजपा के पास बहुमत था, सो उसने बिल को वहां से पास करा लिया, मामला राज्यसभा में फंसा हुआ है, लेकिन वहां के गणित को भी सत्ता पक्ष साधने में लगा हुआ है। लोकसभा के बाद राज्यसभा में बिल पास हो जाने के बावजूद कानून बनने के लिए इस विधेयक को लंबा रास्ता तय करना होगा। यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए राष्ट्रपति के पास दस्तखत के लिए जाने से पहले इसे कुल 29 के आधे से ज्यादा, यानी 16 राज्य विधानसभाओं से भी मंजूरी लेनी पड़ेगी।
इसी संबंध में पिछले दिनों 22 राज्यों के वित्त मंत्रियों की बैठक के बाद वित्त मंत्री ने दावा किया कि 21 राज्य विधेयक के पक्ष में हैं। भाजपा में एक तबके की राय यह है कि कांग्रेस के सर्मथन के बगैर जीएसटी विधेयक पास करा लिया जाए और जनता में यह बात ले जाई जाए कि कांग्रेस विकास में बाधक बनी हुई है। एक राजनीतिक रणनीति के रूप में इसमें कोई बुराई नहीं है, पर जिस कानून को अर्थव्यवस्था के लिए इतना महत्वपूर्ण बताया जा रहा है, उसे किसी की जीत या हार के रूप में पेश करना ठीक नहीं होगा। अच्छा होगा कि दोनों पार्टियां व्यावहारिक रवैया अपनाएं।
जीएसटी की भूमिका अगर टैक्स घटाने और सामान सस्ते करने के रूप में सामने आती है तो इसे जनहित में उठाए गए कदम के रूप में लिया जाएगा। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह उम्मीद जाहिर की है कि मानसून सत्र में जीएसटी विधेयक पारित हो जाएगा, लेकिन फिलहाल इसके बारे में पूरी तौर पर सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता। एक तो अभी यह देखना होगा कि कांग्रेस नेतृत्व की अधिकारिक प्रतिक्रिया क्या रहती है।
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