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सतीश सिंह का लेख : बढ़ रही स्वास्थ्य असमानता

ऑक्सफैम इंडिया ने हाल ही में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में व्याप्त असमानता को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में क्षेत्रों के अनुसार भी देश में स्वास्थ्य सेवा का असमान वितरण है। ग्रामीण क्षेत्र की आबादी की तुलना में शहरी आबादी स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर लाभ ले रही है। भारत में स्वास्थ्य सेवा की स्थिति बहुत ही ज्यादा संतोषजनक नहीं है, जिसे ठीक करने के लिए सरकार को प्राथमिकता के आधार पर स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करना होगा। वैसे, भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के असमान वितरण का एक बड़ा कारण देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी है। कोरोना के बाद स्वास्थ्य असमानता और बढ़ी ही है।

सतीश सिंह का लेख : बढ़ रही स्वास्थ्य असमानता
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सतीश सिंह

सतीश सिंह

ऑक्सफैम इंडिया ने हाल ही में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में व्याप्त असमानता को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके निहितार्थ चौंकाने वाले हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में स्वास्थ्य सेवा का लाभ लेने के मामले में सामान्य वर्ग के लोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। गरीबों की तुलना में अमीर बेहतर स्वास्थ्य सेवा का लाभ ले रहे हैं। पुरुष और महिला के बीच भले ही समानता लाने की बात एक अरसे की जा रही है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के मामले में महिलाओं के मुकाबले पुरुष आज भी बहुत आगे हैं। क्षेत्रों के आधार पर भी देश में स्वास्थ्य सेवा का असमान वितरण है। ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहरी आबादी स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर लाभ ले रही है। कोरोना के बाद स्वास्थ्य असमानता और बढ़ी है।

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य बीमा के अभाव में कमजोर एवं वंचित तबके के लोगों की स्वास्थ्य स्थिति ज्यादा खराब है। राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा दी जाने वाली बीमा योजनाओं का दायरा देश में बहुत ही सीमित है। सूचना के अधिकार के तहत मिले आंकड़ों से पता चलता है कि केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना के तहत कोरोना वायरस से केवल 19 संक्रमितों का इलाज किया गया है। समय पर इलाज नहीं होने के कारण गरीब लोगों की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो जाती है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का अभाव है। इसका एक कारण बुनियादी सुविधाओं का अभाव होना भी है। अभी भी देश के सभी गांव सड़क से नहीं जुड़ सके हैं। बिजली व पानी की सुविधाओं से भी ग्रामवासी वंचित हैं। महामारी की वजह से भी आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर तबके के लोगों की हाल के महीनों में ज्यादा मौत हुई है साथ ही साथ सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर भी लोगों के बीच असमानताओं में वृद्धि हुई है।

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य वर्ग के 65.7 प्रतिशत परिवारों के पास शौचालय की सुविधाएं बीते महीनों में बेहतर हुई हैं। अब उन्हें शौचालय किसी के साथ साझा नहीं करना पड़ता है, जबकि केवल 25.9 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति परिवारों के पास ऐसी सुविधा है। इसके अलावा, सामान्य श्रेणी के घरों की तुलना में अनुसूचित जाति के घरों में 12.6 प्रतिशत से अधिक बच्चों की शारीरिक वृद्धि नहीं हुई है। शीर्ष स्तर पर मौजूद 20 प्रतिशत आबादी की तुलना में निचले स्तर पर मौजूद 20 प्रतिशत लोगों के घरों में 5 वर्ष की उम्र से पहले मरने वाले बच्चों की संख्या तीन गुना अधिक है। रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि एकीकृत बाल विकास सेवा के तहत अस्पतालों में खाद्य सामग्री की उपलब्धता भी दो समुदायों में असमानता है। इतना ही नहीं बच्चों को किए जाने वाले टीकाकरण में भी 8 प्रतिशत का अंतर पाया गया है।

कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की खामियों को बड़े स्तर पर उजागर किया है। वर्ष 2017 के नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के अनुसार प्रत्येक 10,189 लोगों पर महज एक ही सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर है और प्रत्येक 90,343 की आबादी पर एक सरकारी अस्पताल है। इतना ही नहीं भारत में प्रत्येक 1000 की आबादी पर अस्पताल में बेडों की संख्या 0.5 है, जो भारत के मुक़ाबले कम विकसित देशों जैसे बांग्लादेश 0.87, केन्या 1.4 और चिली 2.1 से भी कम है।

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट से पता चलता है कि बीते सालों में सरकारी स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करने के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं किए गए हैं। वर्ष 2010 और 2020 के बीच प्रत्येक 10,000 की आबादी पर अस्पताल में बेडों की संख्या 9 से घटकर 5 हो गई है। अस्पतालों में बेडों की उपलब्धता के लिहाज से 167 देशों में भारत 155वें स्थान पर है और 10,000 की आबादी पर 5 बेड और 8.6 डॉक्टर ही उपलब्ध हैं। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार देश के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी रहती है के लिए केवल 40 प्रतिशत बेड ही देश में उपलब्ध हैं। कमजोर स्वास्थ्य अवसंरचना के कारण कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान कोरोना वायरस से संक्रमित 2 मरीजों में से एक मरीज ग्रामीण क्षेत्र का था। हालांकि, विगत कुछ दशकों में भारत के समग्र स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार आया है, लेकिन उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। बेहतर स्वास्थ्य प्रणाली ने जीवन प्रत्याशा बढ़ाने में मदद की है, लेकिन लिंग, जाति और आय के स्तर में असमानता होने के कारण इसका लाभ सीमित लोगों को ही मिल सका है।

रिपोर्ट का यह भी कहना है कि अमीर, गरीब की तुलना में औसतन 7 साल 6 महीने अधिक जीते हैं, वहीं सामान्य वर्ग की महिला किसी दलित वर्ग की महिला की तुलना में औसतन 15 साल अधिक जीती है। शिशु मृत्यु दर में भी बीते सालों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। फिर भी, सामान्य वर्ग की तुलना में दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों में शिशु मृत्यु दर ज्यादा है। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र पर किए जा रहे खर्च के कारण हर साल 6 करोड़ लोग और गरीब हो जाते हैं। हालांकि, भारत स्वास्थ्य खर्च के मामले में विश्व में 154वें स्थान पर है, जोकि नीचे से पांचवां है। वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश किए गए केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 76,901 करोड़ रुपये का कुल आवंटन किया है, जो वित्त वर्ष 2020-21 के 85,250 करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान की तुलना में 9.8 प्रतिशत कम है।

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करने वाले राज्यों में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या कम रही है, जबकि स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करने वाले राज्यों में कोरोना वायरस से ठीक होने वाले मरीजों की संख्या दूसरे राज्यों से बेहतर रही है। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में स्वास्थ्य सेवा की स्थिति बहुत ही ज्यादा संतोषजनक नहीं है, जिसे ठीक करने के लिए सरकार को प्राथमिकता के आधार पर स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करना होगा। वैसे, भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के असमान वितरण का एक बड़ा कारण देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी है। इसी वजह से देश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं, ग्रामीण आबादी आदि की स्थिति अन्य मामलों में भी खराब है। इसको दुरुस्त बनाने के लिए सरकार को व्यापक प्रयास करने होंगे। देश के समावेशी विकास के लिए प्रयास करना होगा। साथ में, समाज के सभी स्तरों पर सभी को सामाजिक कुरीतियों और समाज में व्याप्त असमानता को दूर करने के लिए लोगों को जागरूक बनाना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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