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आलोक पुराणिक का लेख : सरकारी-निजी सहअस्तित्व जरूरी

सरकारी उपक्रमों के शेयर बेचकर 2020-21 में 2,10,000 करोड़ रुपये उगाहे जाने थे, पर सिर्फ 32,835 करोड़ रुपये ही उगाहे जा सके। यानी तय लक्ष्य का करीब 16 प्रतिशत ही हासिल किया जा सका। 2021-22 के लिए इस मद से 1,75,000 करोड़ रुपये उगाहे जाने का प्रस्ताव रखा गया है। यह लक्ष्य हासिल हो पाएगा या नहीं, यह सवाल बना हुआ है, क्योंकि विनिवेश के लक्ष्य पूरा कर पाना कोरोना काल में खासा चुनौतीपूर्ण ही है। सरकार को बहुत उम्मीद है जीवन बीमा निगम से, जिसके शेयर बेचकर सरकार संसाधन अर्जित करना चाह रही है। पर जीवन बीमा निगम जैसे संगठन एक तरह से सोने से खरे संगठन हैं, जो सरकार के लिए तमाम तरह से मददगार साबित हुए हैं, पर अब सरकार ने इसमें आईपीओ के जरिये 10 फीसदी विनिवेश करने का मन बनाया है, यह विचारणीय है।

आलोक पुराणिक का लेख : सरकारी-निजी सहअस्तित्व जरूरी
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आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

विनिवेश यानी सरकारी उपक्रमों के शेयर बेचकर 2020-21 में 2,10,000 करोड़ रुपये उगाहे जाने थे, पर सिर्फ 32835 हजार करोड़ रुपये ही उगाहे जा सके। यानी तय लक्ष्य का करीब 16 प्रतिशत ही हासिल किया जा सका। 2021-22 के लिए इस मद से 1,75,000 करोड़ रुपये उगाहे जाने का प्रस्ताव रखा गया है। यह लक्ष्य हासिल हो पाएगा या नहीं, यह सवाल बना हुआ है, क्योंकि विनिवेश के लक्ष्य पूरा कर पाना कोरोना काल में खासा चुनौतीपूर्ण ही है। सरकार को बहुत उम्मीद है जीवन बीमा निगम से, जिसके शेयर बेचकर सरकार संसाधन अर्जित करना चाह रही है। जीवन बीमा निगम जैसे संगठन एक तरह से सोने से खरे संगठन हैं, जो सरकार के लिए तमाम तरह से मददगार साबित हुए हैं, पर अब सरकार ने इनमें विनिवेश करने का मन बनाया है। हालांकि सरकार की तरफ से यह साफ किया गया है कि जीवन बीमा निगम में सरकार की मजबूत उपस्थिति बनी रहेगी। निजी बनाम सार्वजनिक की बहस फिर तेज इसलिए हो गई है कि विपक्षी दलों ने सरकार पर सब कुछ बेच खाने का आरोप लगाया है।

विचार की नई धारा

हाल में अपने एक संसदीय संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निजी क्षेत्र को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हैं, उन पर खुला खरा विमर्श होना चाहिए और तमाम नेताओं को निजी क्षेत्र को लेकर दोहरे चरित्र का पर्दाफाश भी होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा उसका आशय यह है कि निजी क्षेत्र के सहयोग से अर्थव्यवस्था का विकास हुआ है और हर काम सिर्फ नौकरशाह नहीं कर सकते। प्रकारांतर से प्रधानमंत्री का आशय यह था कि उद्योगों को सरकारी हिसाब से नहीं चलाया जा सकता, उसके लिए उद्यमी चाहिए, जो धन पैदा करें, रोजगार पैदा करें। उद्यमियों के प्रति और खासकर निजी क्षेत्र के उद्यमियों के प्रति मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों में बड़ा दोहरा रवैया रहा है। वामपंथी विचारधारा से प्रेरित दल तो मोटे तौर पर पूंजी और पूंजीपतियों के विरोधी रहे हैं, खैर वो तो अब भारतीय राजनीति में हाशिये पर हैं, पर दूसरे महत्वपूर्ण दल निजी क्षेत्र को एक तरह से चोर मानते रहे हैं और कई बार तो ऐसा लगता है कि वो निजी क्षेत्र को सिर्फ लूटतंत्र का केंद्र मानते रहे हैं। यह अतिवादिता है। यह ठीक है कि निजी क्षेत्र के अस्पताल, निजी क्षेत्र के स्कूल बहुत लूट मचाते हैं, पर यह भी सच है कि जिन सेवाओं की आपूर्ति करने में सरकारी तंत्र विफल रहता है, वह आपूर्ति निजी क्षेत्र का मुनाफा केंद्रित कारोबार कर देता है। एक वक्त था, जब फोनों के कारोबार सिर्फ सरकारी संगठनों का एकाधिकार था। फोन मिलने में सालों का समय लगता था और लाइनमैन का भ्रष्टाचार बहुत आम हुआ करता था। मोबाइल सेवाओं के सस्ते और बेहतर होने में निजी क्षेत्र की कंपनियों की भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता। वामपंथी-साम्यवादी विचाराधारा से प्रेरित अर्थचिंतन में सार्वजनिक क्षेत्र को ही वरीयता दी जाती थी।

नब्बे के दशक में सोवियत संघ के ध्वस्त होने के बाद साम्यवादी विचारधारा की व्यावहारिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगे। साठ सत्तर के दशक में भारतीय फिल्मों में पूंजीपति उद्योगपति को भ्रष्ट शोषक दिखाया जाता है। निजी क्षेत्र अब अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उस पर अविश्वास करके काम नहीं चल सकता, इसलिए तमाम नेताओं को अपना छद्म त्याग देना चाहिए और बड़े उद्योगपतियों के नाम को गाली की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। वक्त बदल गया है, अब साठ और सत्तर के दशकों के नारे बहुत निरर्थक लगते हैं, जब तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री उद्योगपतियों से निवेश का निवेदन करते हैं। निवेश से रोजगार आते हैं, संपन्नता आती है। निजी क्षेत्र के प्रति अविश्वास खत्म होना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि निजी क्षेत्र की लूट की अनदेखी होनी चाहिए। नियामक सस्थाएं अपना काम करें और निजी क्षेत्र को अपना काम करने देने चाहिए।

शीर्ष पर होने का काल

एक वक्त था, जिसे समाजवादी वक्त कहा जा सकता है। दुनिया समाजवादी विचार में डूबी हुई थी। यह रूस के शीर्ष पर होने का दौर था। रूस यानी समाजवादी व्यवस्था का हेडक्वार्टर, वहां ही पूरी दुनिया के समाजवादी विचारों की गंगोत्री थी। इस विचार के केंद्र में यह था कि सरकार ही अर्थव्यवस्था का संचालन करेगी। एक वक्त भारत में प्रधानमंत्री नेहरु इस तरह की बातें करते थे कि एक समय निजी क्षेत्र अर्थव्यवस्था से तिरोहित हो जाएगा और सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र और सहकारिता क्षेत्र ही बचेगा। यह अतीत की बातें हैं गलत साबित हुई।

समाजवादी अर्थव्यवस्था ही ध्वस्त हो गई है। उसके मूल में यह था कि सरकारी कंपनियां श्रेष्ठ कारोबार की नहीं, निकम्मेपन का प्रतीक बनीं। भारत में सरकारी टेलीफोन कंपनियों से डील करने वाले ग्राहक जानते हैं कि लाइनमैन होली दीवाली पर रिश्वत मांगते थे और इन एकाधिकारी कंपनियों से कुछ काम कराना बहुत मशक्कत का काम होता था। अब निजी टेलीफोन कंपनियों ने ग्राहकों का दायरा बढ़ाया और सभी काम आसान होने के साथ-साथ ग्राहक सेवा को बेहतर किया।

सहअस्तित्व के मायने

सार्वजनिक और निजी-दोनों ही क्षेत्रों का सहअस्तित्व रहे, तो अर्थव्यवस्था में एक तरह से अनुशासन रहता है और निजी क्षेत्र मुनाफे का खेल खुलकर नहीं खेलता, इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र का अंकुश रहे, तो अर्थव्यवस्था में एक हद तक संतुलन रहता है, पर सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र ही रहे, और सिर्फ निजी क्षेत्र ही रहे, इस आशय की नीतिगत घोषणाएं अव्यावहारिक हैं। भारत लोकतांत्रिक देश है, करदाताओं के पैसे से ही सार्वजनिक संस्थाएं चलती हैं। जब डूबते हुए सरकारी बैंकों को सरकार पूंजी देकर बचाती है, तो वह रकम करदाताओं की होती है। वह रकम नए स्कूलों और पुलों को बनाने में भी लग सकती थी। इससे सुविधाएं और सेवाएं और बेहतर हो सकती हैं।

सार्वजनिक संस्थाओं को करदाताओं की रकम से बचाए जाने का सीमा होनी चाहिए। एक बिंदु के बाद अगर सरकारी बैंक या सरकारी फोन कंपनियां चल ही ना पा रही हों, तो उन्हे बंद करने में हर्ज नहीं है, पर यह नहीं होना चाहिए कि चलती हुई या कामयाब सरकारी संस्थाओं का भी जबर्दस्ती निजीकरण कर दिया जाए। जीवन बीमा निगम के शेयर निजी हाथों में जाएंगे पर इसका सार्वजनिक उपक्रम का चरित्र बरकरार रहेगा, ऐसा माना जा सकता है, इसलिए जीवन बीमा निगम पूरे तौर पर निजीकृत नहीं होगा, पर एयर इंडिया के सरकारी खजाने पर बोझ बनने का वक्त खत्म हो गया है। अब वहां निजी एयरलाइंस ज्यादा बेहतर तरीके से और उत्पादक तरीके से काम कर रही हैं। उपयुक्त नियामक बनाकर निजी क्षेत्र की मुनाफाखोर महत्वाकांक्षाओं पर नकेल डाली जा सकती है। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में संतुलन की आवश्यकता है। अतिवादी विचारों और खास तौर पर अतिवादी समाजवादी विचारों के दिन लद चुके हैं।

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