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डा. रमन सिंह का लेख : दूसरी आज़ादी कांग्रेस से लड़कर ली

25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा की थी। इस तरह भारत अपने ही लोगों का फिर से ग़ुलाम हो गया था। श्रीमती गांधी ने तमाम राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया और प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया। तब लोकनायक ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था। वस्तुतः तब आपातकाल जैसी कोई परिस्थिति थी ही नहीं सिवाय इसके कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने गांधी के खिलाफ चुनाव हारे राजनारायण की याचिका पर फैसला देते हुए गांधी का चुनाव रद कर दिया था।

डा. रमन सिंह का लेख : दूसरी आज़ादी कांग्रेस से लड़कर ली
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डा. रमन सिंह

बीसवीं सदी में भारत आज़ादी की लड़ाई का मुख्यतया दो बार गवाह बना। ज़ाहिर है पहली लड़ाई फिरंगियों से थी जिसकी शुरुआत उन्नीसवीं सदी से ही हुई थी और दूसरी लड़ाई राष्ट्रवादियों को कांग्रेस से ही लड़नी पड़ी थी, आपातकाल के विरुद्ध, जब देश से लोकतंत्र को ही ख़त्म कर दिया गया था। अन्य मौलिक अधिकारों की तो बात ही क्या करें, तब नागरिक अपने जीने के नैसर्गिक अधिकार तक से भी वंचित हो गए थे। जहां पहली आज़ादी में सत्ता हासिल करने के लिए देश के ही टुकड़े कर दिए गए थे, वहां 'दूसरी आज़ादी' की लड़ाई इसलिए लड़नी पड़ी क्योंकि न्यायालय से अयोग्य घोषित हुई प्रधानमंत्री ने सत्ता बचाए रखने के लिए संविधान के ही चिथड़े कर दिए थे। अभी हम जिस आज़ादी में सांस ले पा रहे हैं, वह लोकनायक जयप्रकाश, जननायक अटल-आडवानी की पार्टी द्वारा त्याग और बलिदानों से पायी हुई आज़ादी है। विडंबना ही है कि जिस दल के विरुद्ध लड़कर हमने यह आज़ादी पायी है, उसी दल को आज भी आज़ादी का श्रेय दिया जाता है जबकि यह अवधारणा तथ्यों के बिल्कुल उलट है।

25 जून 1975 की दरम्यानी रात तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा की थी। इस तरह भारत अपने ही लोगों का फिर से ग़ुलाम हो गया था। श्रीमती गांधी ने तमाम राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया और प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया। तब लोकनायक ने इसे 'भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि' कहा था। वस्तुतः तब आपातकाल जैसी कोई परिस्थिति थी ही नहीं सिवाय इसके कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने श्रीमती गांधी के खिलाफ चुनाव हारे राजनारायण की याचिका पर फैसला देते हुए श्रीमती गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था और उसके बाद उनका प्रधानमंत्री पद पर बने रहना मुश्किल था।

यह वो दौर था जब श्रीमती इंदिरा गांधी की तानाशाही, भ्रष्टाचार एवं तमाम अनियमितता के खिलाफ देश भर में तब भयंकर आक्रोश था। गुजरात में कांग्रेस के चिमन भाई पटेल की सरकार को भ्रष्टाचार के आरोप में ही जाना पड़ा था। समूचे गुजरात की छात्र शक्ति सुलग रही थी। इधर बिहार में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन रफ्तार पकड़ रहा था, जो देखते ही देखते देशव्यापी हो गया था। मार्च-अप्रैल, 1974 में बिहार के छात्र आंदोलन का जयप्रकाश नारायण ने समर्थन किया। उन्होंने पटना में संपूर्ण क्रांति का नारा देते हुए छात्रों, किसानों और श्रम संगठनों से अहिंसक तरीके से भारतीय समाज का रुपांतरण करने का आह्वान किया। एक महीने बाद देश की सबसे बड़ी रेलवे यूनियन राष्ट्रव्यापी हड़ताल पर चली गई। इंदिरा सरकार ने निर्मम तरीके से इसे कुचला। इससे सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ा।

आपातकाल की घोषणा होते ही स्वयंसेवकों और तमाम गैरकांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गयी। देश भर से लाखों लोग सत्याग्रह करके जेल गए और लाखों लोगों को गिरफ्तार किया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी भाई देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, के.आर. मलकानी, अरुण जेटली, जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रामविलास पासवान, शरद यादव, रामबहादुर राय आदि गिरफ्तार रहे और गुजरात के ही प्रकाश बह्मभट्ट, हरिन पाठक, नलिन भट्ट समेत समूचा विपक्ष जेल में था। अविभाजित मध्य प्रदेश से भी सारे नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे। वरिष्ठ भाजपा नेता सच्चिदानंद उपासने भाइयों समेत जेल में थे। हाल में ही दिवंगत हुए अंचल के वरिष्ठ नेता बद्रीधर दीवान समेत सैकड़ों लोगों पर आपातकाल का कहर किस हद तक टूटा था, यह आज इतिहास ही है। यहां खासकर यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि 'सेक्युलरिज्म' शब्द पहले हमारे संविधान में नहीं था। आपातकाल में जब सारी ताकतें केवल एक व्यक्ति में केन्िद्रत थी, तभी 'पंथनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' इन दोनों शब्द भी संविधान के प्रस्तावना में चुपके से ड़ाल दिए गए थे।

आपातकाल में अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी कुचल दिया गया था। 25 जून 1975 की आधी रात को इमरजेंसी लगने के तुरंत बाद अख़बारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, ताकि ज़्यादातर अख़बार अगले दिन आपातकाल का समाचार ना छाप सकें। आपातकाल के दौरान 3801 अख़बारों को ज़ब्त किया गया। 327 पत्रकारों को मीसा कानून के तहत जेल में बंद कर दिया गया। 290 अख़बारों में सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। ब्रिटेन के 'द टाइम्स' और 'द गार्डियन' जैसे समाचार पत्रों के 7 संवाददाताओं को भारत से निकाल दिया गया था। रॉयटर्स सहित कई विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के टेलीफोन और दूसरी सुविधाएं काट दी गई। 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता छीन ली गई। 29 विदेशी पत्रकारों को भारत में प्रवेश देने से मना कर दिया गया।

अगर इस घटनाक्रम को कांग्रेस पार्टी के सन्दर्भ में देखें, तो उस दल की मानसिकता आज भी बिल्कुल आपात्काल वाली ही दिखेगी। छत्तीसगढ़ समेत जिन मुट्ठी भर प्रदेशों में कांग्रेस या उसके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थित दलों का शासन है, वहां के हालात आज भी इसी मानसिकता की गवाही दे रहे हैं। महाराष्ट्र में किस तरह से असहमति के कारण अभिनेत्री का घर ढ़ाह दिया जाता है, पत्रकारों के साथ कैसा सलूक होता है। पालघर के साधुओं को भीड़ द्वारा लिंच कर देने की खबर दिखाने के कारण अर्णव गोस्वामी और उनकी टीम के साथ कांग्रेस समर्थित सरकार ने वहां कैसा बर्बर अत्याचार किया, यह उदाहरण सामने है। चुनाव उपरान्त पश्चिम बंगाल की नृशंस हिंसा का ही उदाहरण देखें। ये चीज़ें महज़ संयोग नहीं बल्कि प्रयोग है। छग का अभी का उदाहरण तो और भी अनूठा है, किसी ट्वीट को रीट्वीट तक करना बड़ा अपराध बना दिया जाता है। जहां शासन के संसाधनों और समय का पूरा उपयोग भाजपा प्रवक्ता की आवाज़ को पुलिसिया ड़र दिखा कर दबाने, राष्ट्रीय पत्रकारों पर सौ-सौ मुकदमें दर्ज करने में लगा दिया जाता है।

जहां कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा पुलिस स्टेशन के सामने ही पत्रकारों से बर्बरता से हिंसा तक की जाती है, महज़ इसलिए क्योंकि वह आपसे असहमत है और उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी को ख़त्म करना चाहते हैं जैसा इंदिरा जी ने किया था। यूपीए के कार्यकाल में ही जिस आईटी एक्ट की धारा 67 A को सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद रद्द किया गया, वह वही तो था कि आपने सोश्ाल मीडिया पर भी असहमति के ज़रा सा स्वर बुलंद किये तो आपको जेल में डाल दिया जाएगा। आपातकाल के सन्दर्भ में यह कहना होगा कि आज 2021 में हम जिस आज़ादी की हवा में सांस ले रहे हैं, यह आज़ादी कांग्रेस से लड़ हासिल की गई है। आवश्यकता खासकर इसलिए है क्योंकि इतिहास याद नहीं रखने पर उसके दुहराये जाने का खतरा बना रहता है। आपातकाल के सन्दर्भ में यह कहना होगा कि आज 2021 में हम जिस आज़ादी की हवा में सांस ले रहे हैं, यह आज़ादी कांग्रेस से लड़ हासिल की गयी है। अंग्रेजों से लड़ कर हमें जो आज़ादी मिली थी।

( लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

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