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पुस्तक दिवस पर अरुण कुमार का लेख: अच्छी किताबों और अध्ययन की उपेक्षा

शैक्षिक संस्थानों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे विद्यार्थियों को बेहतर किताबें उपलब्ध करवाएंगी, लेकिन बदकिस्मती है कि ऐसा हो नहीं रहा।

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अंधकार में सूरज बनकर सबको दे उजियारा पुस्तक जब भी भटकें सही दिशा से बने भोर का तारा। किसी कवि की ये पंक्तियां हमारे जीवन में किताबों की अहमियत को बयां करती हैं। किताबें केवल समय काटने का साधन ही नहीं हैं, बल्कि बेहतर सहयोगी, सद्भावनापूर्ण, तर्कशील, विचारशील व ज्ञान आधारित नागरिक समाज के निर्माण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। क्योंकि किताबें मनुष्य को संवेदनशील बनाती हैं। शिक्षा भी यही काम करती है। शिक्षा किताबों के संसार से हमारा परिचय कराती है।

शैक्षिक संस्थानों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे विद्यार्थियों को बेहतर किताबें उपलब्ध करवाएंगी, लेकिन बदकिस्मती है कि ऐसा हो नहीं रहा। बेहतर नागरिक बनने-बनाने की बजाय यहां पर किताबें पढ़ने का मकसद परीक्षा की वैतरणी को पार करना हो गया है। बच्चों को तो छोड़ ही दें, अध्यापकों में भी पढ़ने की संस्कृति का अभाव है। अधिकतर अध्यापक प्राय: पढ़ाए जाने वाली विषय-वस्तु का कामचलाऊ ज्ञान रखते हैं। यही कारण है कि स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति चिंताजनक है। सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों का प्रावधान होता है। प्राथमिक पाठशालाओं में भी पुस्तकालय के नाम पर किताबें तो होती ही हैं, लेकिन अध्यापक उन्हें अक्सर संदूक या पेटी में भरे रखते हैं। किताबें खुद ही कैद हो जाएंगी तो वे मुक्ति का माध्यम कैसे बनेंगी? उच्च एवं वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में पुस्तकालय को विद्यार्थियों की जरूरतों के अनुसार संपन्न बनाने के लिए हर वर्ष अनुदान दिया जाता है, लेकिन जरूरतों की बजाय पुस्तकालयों में लुगदी साहित्य का ढेर लगता जाता है। जैसे हर स्थान पर बाजार ने घुसपैठ की है, उसी प्रकार किताबों का भी एक भरापूरा बाजार है। लुगदी साहित्य मतलब जिसकी उपयोगिता शिक्षा कर्म में लोगों को न हो, बल्कि बाजार के लाभ के लिए हो। मुनाफे के लालच में कुंजीनुमा किताबों के प्रकाशक स्कूलों में पहुंचते हैं। स्कूलों को कमीशन देते हैं और अपनी किताबें डाल कर चलते बनते हैं। ऐसे में बच्चों के सर्वांगीण विकास और अध्ययन संस्कृति के विकास के प्रति तो उदासीनता स्पष्ट हो जाती है। निजी स्कूलों की स्थिति इससे भी अधिक चिंताजनक है। अधिकतर स्कूलों में तो पुस्तकालय देखने को भी नहीं मिलता। कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में भी पुस्तकालयों और किताबें पढ़ने की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है।

सरकारों द्वारा स्मार्ट सिटी और स्मार्ट विलेज की अवधारणाओं को जमकर उछाला जा रहा है। आदर्श गांव-शहर के विविध आयामों पर चर्चा भी होती है, लेकिन पुस्तकालय व किताबें पढ़ने की संस्कृति उनके भाषणों से नदारद रहती है। देश भर में विकास के नाम पर तरह-तरह के उपाय किए जा रहे हैं। सड़कों का निर्माण, ग्राम सचिवालय, वाई-फाई की सुविधा, बड़े-बड़े भवन आदि बन रहे हैं, लेकिन कितने ही कस्बों और शहरों में पुस्तकालय बनाने की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। कईं बार तो ऐसा भी लगता है जैसे किताबों से होने वाले सशक्तिकरण से हमारे राजनेता भय खाते हैं। इसीलिए तो बने-बनाए पुस्तकालयों को विकास की भेंट चढ़ा दिया जाता है। हरियाणा के करनाल में पाश पुस्तकालय को मेडिकल कॉलेज के नाम पर ध्वस्त कर दिया जाना इसी प्रकार का उदाहरण दिखाई देता है।



हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में कई पंचायतें बहुत ही संपन्न हैं, जिनकी सालाना आमदनी करोड़ों-अरबों में है। पंचायतों और लोगों द्वारा बहुत ही महंगे आयोजन होते हैं, लेकिन एक अदद पुस्तकालय खोलने के बारे में नहीं सोचा जाता। जहां से बच्चे व युवा ज्ञान व आनंद के लिए पढ़ने का हुनर सीखें। मूल्यहीनता की स्थिति में इस सारे विकास को हम बेकार होते हुए देख रहे हैं, लेकिन मूल्यों व बेहतर संस्कारों के लिए स्थायी उपाय की तरफ नहीं सोच पा रहे हैं। आज स्मार्ट गांव व शहर बनाने के लिए अध्ययन संस्कृति के विकास और पुस्तकालय की अनिवार्यता के विचार को जोर-शोर से उठाए जाने की जरूरत है। अध्ययन संस्कृति और विचार-विमर्श की संस्कृति का गहरा संबंध है। किताबें हमारे बीच आएंगी। उन्हें पढ़ा जाएगा तो संवादहीनता और मुद्दाविहीन समाज में मुद्दे केंद्र में आएंगे और उन पर चर्चा भी हो पाएगी। 21वीं सदी में विकास के दावों और अंधविश्वास, जात-पात, साम्प्रदायिकता व भेदभाव की सबसे बड़ी वजह किताबों की अनुपस्थिति है। इसी कारण से हम बहुत से संतों-महापुरूषों के नाम लेते हैं। उनकी पूजा भी करते हैं, लेकिन उनके विचारों को जानते तक नहीं। आईये आज के दिन हर गांव में पुस्तकालय और हर विद्यार्थी के हाथ में किताब, उसके अध्ययन और विचार-विमर्श को मुद्दा बनाएं।

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