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प्रमोद जोशी का लेख : ओलंपिक में स्वर्णिम सफलता

खेलों को आर्थिक-सामाजिक विकास का संकेतक मानें तो अभी तक हमारी बहुत सुन्दर तस्वीर नहीं है। चीनी तस्वीर दिन-पर-दिन बेहतर होती जा रही है। खेल सामाजिक विकास की कहानी भी कहते हैं। हम छोटे-छोटे देशों से भी पीछे हैं। जमैका, इथोपिया, युगाण्डा, उज्बेकिस्तान, वेनेजुएला, फिजी, इक्वेडोर, ट्यूनीशिया, बरमूडा और मोरक्को जैसे देशों ने भारत के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। दीपक पुनिया को सैन मैरीनो के पहलवान ने हराया, जिस देश की आबादी 33 हजार है। आर्थिक महाशक्ति के रूप में अमेरिका हर तरह के खिलाड़ियों को प्रश्रय देता है और सबसे अग्रणी देश बन जाता है। हमारी बुनियादी खेल-संरचना आर्थिक-विकास से जुड़ी है। राजनीति और समाज के दोष भी हमारे खेलों में झलकते हैं। खेल को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार व कॉरपोरेट सबको मिलकर काम करना होगा।

प्रमोद जोशी का लेख : ओलंपिक में स्वर्णिम सफलता
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 ओलिम्पिक में पदक विजेता खिलाड़ी। 

प्रमोद जोशी

उपलब्धियों के लिहाज से देखें, तो टोक्यो भारत के लिए इतिहास का सबसे सफल ओलंपिक रहा है। नीरज चोपड़ा ने गोल्ड मेडल के साथ एथलेटिक्स में पदकों का सूखा खत्म किया है, साथ ही पदकों की संख्या के लिहाज से भारत ने सबसे ज्यादा सात पदक हासिल किए हैं। यह असाधारण उपलब्धि हैं, हालांकि भारत को इस बार इससे बेहतर की आशा थी। हमारा स्तर बेहतर हो रहा है। इस बार की सफलता हमारे आत्मविश्वास में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी करेगी। जिस तरह से पूरे देश ने नीरज के स्वर्ण और हॉकी टीम के कांस्य पदक जीतने पर खुशी जाहिर की है, उससे लगता है कि खेलों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। बेशक सरकार और कॉरपोरेट मदद के बगैर काम नहीं होगा, पर सबसे जरूरी है जन-समर्थन। खेलों को आर्थिक-सामाजिक विकास का संकेतक मानें तो अभी तक हमारी बहुत सुन्दर तस्वीर नहीं है। चीनी तस्वीर दिन-पर-दिन बेहतर होती जा रही है। 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के 35 साल बाद 1984 के लॉस एंजेलस ओलंपिक खेलों में चीन को पहली बार भाग लेने का मौका मिला और उसने 15 गोल्ड, 8 सिल्वर और 9 ब्रॉन्ज मेडल जीतकर चौथा स्थान हासिल किया था। उस ओलंपिक में सोवियत गुट के देश शामिल नहीं थे, पर चीन ने धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराकर अपनी भावी वैश्विक महत्ता को दर्ज कराया था।

पदकों में चीनी वर्चस्व

2008 के बीजिंग ओलिम्पिक में चीन को सबसे ज्यादा 100 मेडल मिले थे। उस बार मेडल तालिका में उसका स्थान पहला था। लंदन ओलिम्पिक में उसका स्थान दूसरा हो गया और रियो में तीसरा। टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदकों की संख्या के आधार पर चीन पहले स्थान पर और अमेरिका दूसरे पर है। कुल संख्या के आधार पर अमेरिका नम्बर एक और चीन नम्बर दो पर है। इसबार केवल महिला खिलाड़ियों की पदक सूची भी उपलब्ध है। उसमें भी चीन सबसे ऊपर है। हाल में किसी ने भारत की पूर्व एथलीट पीटी उषा से पूछा कि भारत ओलंपिक में चीन की तरह पदक क्यों नहीं लाता? जवाब मिला, 'मैंने सच बोल दिया तो वह कड़वा होगा।' कड़वा सच क्या है? चीन इतने कम समय में ओलंपिक सुपर पावर कैसे बन गया? उन्होंने अंग्रेज़ी के एक शब्द में इसका जवाब दिया, 'डिज़ायर' यानी मनोकामना। इसे महत्वाकांक्षा भी मान सकते हैं। चीनी समाज के सभी तबक़ों में मेडल जीतने करने की ज़बरदस्त चाह है।

भारतीय प्रदर्शन

टोक्यो ओलंपिक से पहले भारत ने अपने 121 साल के ओलंपिक इतिहास में केवल 30 पदक जीते थे। इनमें से दो रजत पदक अंग्रेज एथलीट नॉर्मन प्रिचर्ड के नाम हैं। इसलिए इन्हें 28 ही मानिए, जिनमें से नौ स्वर्ण पदक हैं। आठ अकेले हॉकी में और एक अभिनव बिंद्रा का शूटिंग गोल्ड। भारत 1900 से ओलंपिक मुक़ाबलों में भाग लेता रहा है और चीन ने पहली बार 1984 में हुए लॉस एंजेलस ओलंपिक में भाग लिया था। टोक्यो से पहले उसने 546 पदक जीत लिए थे, जिनमें 224 स्वर्ण पदक थे। टोक्यो में भी भारत को सात पदक से ही संतोष करना पड़ा है।

क्रिकेट का अनुभव

कुछ लोग मानते हैं कि भारत में क्रिकेट को छोड़कर किसी और खेल में किसी को दिलचस्पी नहीं है। क्रिकेट को दोष क्यों दिया जाए? बीसीसीआई को इसका श्रेय क्यों न दिया जाए, जिसने इस खेल को कारोबारी दुनिया के साथ इतने अच्छे तरीके से जोड़ा कि केवल भारत का ही नहीं, दुनिया का सबसे अच्छा क्रिकेट-इंफ्रास्ट्रक्चर आज भारत में है। हमारी आईपीएल प्रतियोगिता में दुनिया भर के खिलाड़ी शामिल होने को आतुर रहते हैं। खेल हमें स्वस्थ रखते हैं, अनुशासित बनाते हैं, नियम-पालन के महत्व को समझना है, तो खेलों से सीखना होगा। न्याय और निर्णय-प्रक्रिया खेलों जैसी हो, तो कहीं कोई कमी नहीं रहेगी। खेलों में सामाजिक न्याय के सिद्धांत काम करते हैं। अच्छा खेलने वालों के जाति-धर्म नहीं देखे जाते। अच्छा खेलकर प्रतिस्पर्धी हराए तो रंज नहीं होता।

सामाजिक जिम्मेदारी

खिलाड़ियों को प्रोत्साहित या हतोत्साहित करने में माता-पिता की पहली भूमिका होती है। सायना नेहवाल और पीवी सिंधु को उनके माता-पिता ने आगे बढ़ाया। हरियाणा की फोगट बहनों की कहानी भी ऐसी ही है। मीराबाई चानू से रानी रामपाल तक किसी के भी अनुभव पढ़िए। अभावों के बीच संकल्पों की दास्तान सुनाई पड़ेगी। पर केवल माता-पिता के प्रोत्साहन से सभी खिलाड़ी नहीं बनते। रोजगार व सुविधाओं की जरूरत होती है। इसके लिए कॉरपोरेट समर्थन चाहिए। एटम बमों से तबाह जापान ने युद्ध के बाद बीस साल में जो चमत्कार किया वह उसने 1964 के टोक्यो ओलंपिक में दिखाया। 1988 में दक्षिण कोरिया ने खुद को 'शोकेस' किया। ऐसा ही मौका 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स के मार्फत भारत को भी मिला था, ये खेल उल्टे गले पड़े। खेल सामाजिक विकास की कहानी भी कहते हैं। हम छोटे-छोटे देशों से भी पीछे हैं। जमैका, इथोपिया, युगाण्डा, उज्बेकिस्तान, वेनेजुएला, फिजी, इक्वेडोर, ट्यूनीशिया, बरमूडा और मोरक्को जैसे देशों ने भारत के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। दीपक पुनिया को सैन मैरीनो के पहलवान ने हराया, जिस देश की आबादी 33 हजार है।

सभी खेल को मिले प्रश्रय

खेलों का रिश्ता सामाजिक संरचना और जीन्स से भी है। हरियाणा की लड़कियाँ हॉकी और कुश्ती में चमत्कार कर रही हैं, तो पूर्वोत्तर की लड़कियाँ वेटलिफ्टिंग और बॉक्सिंग में। दक्षिण भारत की लड़कियाँ एथलेटिक्स में उभर रही हैं। भारत के बाहर देखें कैरीबियन सागर के छोटे से देश जमैका का स्प्रिंट यानी छोटी दूरी की रेसों में बोलबाला है। उसैन बोल्ट और अफाफा पॉवेल इसके उदाहरण हैं। मैराथन जैसी लम्बी दूरी की रेसों में अफ्रीका के केन्या और इथोपिया जैसे देशों की धाक है। कुश्ती और बॉक्सिंग में पूर्वी यूरोप और एशिया की सीमा के कॉकेशियन लोग सफल हैं। बैडमिंटन और टेबल टेनिस प्रतियोगिताओं के ज्यादातर विजेता चीनी मूल के खिलाड़ी होते हैं। मोटे तौर पर गोरे यूरोपियन, अफ्रीकी मूल के अश्वेत और चीनी मूल के खिलाड़ी खेल के मैदान पर राज करते हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में अमेरिका हर तरह के खिलाड़ियों को प्रश्रय देता है और सबसे अग्रणी देश बन जाता है। हमारी बुनियादी खेल-संरचना आर्थिक-विकास से जुड़ी है। राजनीति और समाज के दोष भी हमारे खेलों में झलकते हैं।

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