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ब्लॉग: आदिवासी बौद्धिक संपदा की वैश्विक लूट

आदिवासी के पारम्परिक ज्ञान स्त्रोत, हस्तकलाएं, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां वगैरह रहायशी धरती की सोंधी गमकें हैं।

ब्लॉग: आदिवासी बौद्धिक संपदा की वैश्विक लूट

धरती आदिवासी की स्थानिकता, पहचान और विशेषता है। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ड.) और (छ) के अनुसार जीवनयापन के लिए प्रत्येक नागरिक को भारत के किसी भी भू भाग में बस जाने का अधिकार होगा। बसे हुए भूभाग से बेदखल नहीं होने को आदिवासी सांस्कृतिक संवैधानिकता समझता है। आदिवासी के पारम्परिक ज्ञान स्त्रोत, हस्तकलाएं, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां वगैरह रहायशी धरती की सोंधी गमकें हैं।

धरती का अर्थ सभी प्राकृतिक संसाधनों और माहौल से है। माहौल देखने में स्थिर लेकिन समय के आयाम में बहता है। धरती चमत्कार है क्योंकि उसके भूगोल का अर्थ इतिहास भी है। इस नजर से अलग धरती का हिस्सा आदिवासी समूह के लिए पूरी दुनिया है। आदिवासी जीवन का अर्थशास्त्र भी है। आदिवासी से धरती की रहस्यात्मक अनुभूति का गहरा आध्यात्मिक रिश्ता भी है। वह एक साथ पूर्वज पीढ़ियों के संस्कार सुरक्षित रखने, सामूहिकता में जीने और वंशज पीढ़ियों को परम्पराओं का यश देते जाने के जीवन प्रयोगों को होने का अर्थ समझता है।

पहाड़, नदियां, पशु पक्षी, वनसंगीत, पेड़ पौधे आदि उसे सभ्यता के आक्रमणों से बचाए रखने का कवच भर नहीं हैं। ये सब जीवन का संगीत पैदा करते हैं। ऐसा जीवन अपनी दैहिक सीमाओं के परे जाकर दूसरों का भला करता उनमें भी जी रहा हो। ‘अपनी‘ धरती पर अधिकार बनाए रखना आदिवासी का कुलोदभव सांस्कृतिक अधिकार है। वह केवल आर्थिक या वैयक्तिक नहीं जो भू-अधिकारों का सर्वश्रुत, सर्वव्यापी शहरी अनुवाद है। अपनी धरती के सीमा पार का संसार आदिवासी के लिए सदैव विदेश, अन्य लोक, अबूझ या अरुचि का क्षेत्र रहा है।

आदिवासियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी भूमियों के स्वामित्व और आधिपत्य को बचाए रखने, उसकी वैधानिक मान्यता चाहने, उसके पारम्परिक दोहन और उसके माध्यम से अपनी संस्कृति, परम्पराओं, ज्ञानशास्त्र, दृष्टिकोण और समूचे अस्तित्व को सुरक्षित रखने से है। आज समन्वित विकास का शोर है। आदिवासी तो उस अवधारणा का अपने आचरण में अनजाने ही समर्थक रहा है।

खेती के क्रियाकलापों को जीवनोपयोगी और समाजोन्मुख बनाने के लिए आदिवासियों ने सदियों में अपनी तकनीक का विकास कर उसे सुस्थिर किया है। वही उसके जीवन का मूलमंत्र और अस्तित्व का अर्थ है। वही जीवन शैली उसे सभ्यता के हाथों संस्कृतिसम्पन्नता का प्रमाण पत्र भी दिलाती रही है। जैव विविधता के अनुरक्षण के लिए भी आदिवासी ही श्रेय के हकदार हैं। वैश्वीकरण ने आदिवासी जीवन और वनों तथा पारंपरिक संसाधनों में छिपी अकूत सम्पत्तियों को ध्यान में रखकर उनका शिकार किया।

उद्योगों के नाम पर इन स्त्रोतों पर कब्जा कर लेने का अन्तरराष्ट्रीय व्यापारिक षड़यन्त्र रचा गया। निजी उद्योगपति बाजार की सत्ता के केन्द्र में हैं। आदिवासी, दलित और गरीब तथा मध्य वर्ग परिधि पर और मन्त्रिपरिषदें, नौकरशाह और तथाकथित विशेषज्ञ नवोन्मेषी बुद्धिजीवी त्रिज्या की भूमिका अदा करने लगे हैं। स्थानीय या देशज कम्पनियों की खाल ओढ़े सभी संसाधनों पर गिद्ध दृष्टि गड़ाए वैश्वीकरण धंसता गया है।

आदिवास को इतिहास की फकत याद बनाकर रखने का कुचक्र हो रहा है। खनिज, वनोत्पाद, जल, भूमि आदि के साथ साथ आदिवासी संस्कृति को भी कमोडिटी समझकर व्यापार का आइटम बना दिया गया है। तर्क करते हैं कि आदिवासियों के रहन सहन, बोलियों, जीवनयापन, संगीत, कलाओं आदि की समुच्चय-संस्कृति विश्व बाजार की नई उपभोक्ता वस्तु बना देने से आदिवासी-संस्कृति तालाब के बदले समुद्र का विस्तार पाएगी। बड़े कारखानों की सस्ती लेकिन घटिया वस्तुओं से बाजार पट रहा है।

आदिवासियों के कला-उत्पाद बाजार खो रहे हैं। बौद्धिक खलनायकी और राजनीतिक बेईमानी का दृष्टांत यह भी है। सरकारें राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी के लिए गैर आदिवासी के ढांचागत विकास में असफल होने के कारण/बाद आदिवासी वन क्षेत्रों की सम्पदा के दोहन के आधार पर राष्ट्रीय विकास सूचकांकों में इजाफा कर रही हैं। आदिवासी संस्कृति के अवयवों की लूट लपेट के कई उदाहरण हैं। उनकी दुर्लभ कलाओं, नाम, चेहरे, भंगिमाएं, चित्र और पहचान भी व्यापारिक वस्तु या लोगो बनाकर बेचे जा रहे हैं। उन्हें कीमत तो क्या गुडविल भी नहीं दी जा रही है। अधिकतर दैहिक चित्रण आपत्तिजनक,अश्लील और हिंसक होता है। मूल मकसद संस्कृति का विस्तार या प्रचार नहीं, मुनाफा कमाना है।

बाजार की दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियां, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी संगठन (आई.एम.एफ.) और समुद्रपार की विकास एजेंसियां वगैरह शामिल हैं। अन्तरराष्ट्रीय विकासवाद की यह सामान्य, सर्वमान्य और सुविचारित समझ है कि अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक समृद्धि के लिए ‘एक खिड़की‘ के विश्व व्यापार सिद्धान्त पर निर्भर रहना मुनासिब होगा। वहां एक जैसे व्यापार नियम लागू हों और खेती और उद्योगों पर एक जैसी व्यवस्था का नियन्त्रण हो। आदिवासियों का पारम्परिक ज्ञान सामूहिकता का कायल रहा है। व्यक्तिगत उपलब्धियां, शोध, अधिकार, श्रेय वगैरह पश्चिमी अवधारणाओं के ठनगन हैं। कहानियां, गीत, नृत्य, विश्वास, कृषि सम्बन्धी प्रयोग, तकनीक, प्रकृति से सहकार सहित सभी ज्ञान विधाओं में किसी व्यक्ति के एकाधिकार की गुंजाइश आदिवासी सोच में नहीं है।

दैनिक जीवन की चुनौतियों से लेकर प्रथाओं के परिष्कार और भविष्य को सहेजने की कोशिशों को आदिवासी समझ निजता के मोनोपली के अर्थ में नहीं बूझती। उसकी वैचारिक दुनिया सहकार का आंतरिक सम्मेलन है। दुनिया की उन्नत और नागर सभ्यताओं को इस तरह आदिवासी जीवन ने समृद्ध और अर्थमय भी बनाया है। हर चुनौती का आदिवासियों ने हल ढूंढ़ने की कोशिश की है। उनका जीवन आत्मसम्मान, आत्म संयम और आत्मविश्वास का विश्वविद्यालय है।

यह विश्वविद्यालय बंद किया जा रहा है। उसके प्रयोगों से उपजे सत्य का सभ्य दुनिया ने पेटेन्ट करा लिया है। उसे डिब्बा बंद करके वापस उन्हें ही बेचा जा रहा है। आदिवासी-ज्ञान के साथ छल और धोखाधड़ी के करतब किए जा रहे हैं। दुनिया के अकादेमिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों के शोधकर्ता पारम्परिक ज्ञान के कच्चे माल के सबसे बड़े ग्राहक हैं। इस ज्ञानशास्त्र को बाजार की वस्तु बना लिया गया है। पश्चिमी वैश्विक कम्पनियां इनके वित्तीय अधिकार हथियाए हुए हैं।

आदिवासी सूत्रों का हवाला तक नहीं दिया जा रहा है। बहुत से उपभोक्ता उत्पाद, दवाइयां, सौंदर्य प्रसाधन, हस्तशिल्प वगैरह में आदिवासी सांसें धड़क रही हैं लेकिन बाजार में बहुत शोर है। उस ज्ञान की योनि का परिवर्तन हो रहा है। आदिवासियों ने जब सामूहिक ज्ञान के उद्भव, विकास और अन्तरण वितरण की अनोखी पद्धति का आविष्कार कर ही रखा है, तब उन्हें गोरे देशों की लाठी से हकालने का क्या अर्थ है?

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