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चिंतन: आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल लड़ाई जरुरी

प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक वैश्विक लड़ाई की अपील की और इसमें संयुक्त राष्ट्र के अहम भूमिका निभाने की बात कही।

चिंतन: आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल लड़ाई जरुरी
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अपनी तीन देशों की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल लड़ाई को और मजबूत करने की दिशा में बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल की है। इस यात्रा के आखिरी पड़ाव में इस्लामिक देश सऊदी अरब ने भारत के साथ मिलकर आतंकवाद से लड़ने पर सहमति जताई है। इस यात्रा के पहले चरण में बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में भी प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक वैश्विक लड़ाई की अपील की और इसमें संयुक्त राष्ट्र के अहम भूमिका निभाने की बात कही।

प्रधानमंत्री की यात्रा से ठीक पहले आतंकियों ने जिस तरह बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स को निशाना बनाया, उससे एक बारगी लगा था कि पीएम की यात्रा टल सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री ब्रसेल्स गए और भारत व बेल्जियम ने आतंकवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ने का संकल्प लिया। उसके बाद पीएम विश्व परमाणु सम्मेलन में हिस्सा लेने अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन गए तो वहां भी उन्होंने विश्व को परमाणु हमलों से सुरक्षित करने के लिए आतंकवाद के खात्मे को जरूरी बताया। अब दो दिन की यात्रा के दौरान पीएम ने आतंकवाद से लड़ने के लिए सऊदी अरब के शाह सलमान बिन अब्दुल अजीज के साथ द्विपक्षीय संकल्प लेकर एक बड़ी शक्ति को अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की।

दरअसल, भारत करीब 40 साल से पाक प्रायोजित आतंकवाद से पीड़ित है। यह बात दुनिया को भी मालूम है। भारत विश्व के देशों से लगातार कहता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल लड़ाई होनी चाहिए और जो देश इसे शह दे रहा है, उसे अलग-थलग किया जाना चाहिए। लेकिन यूरोप और अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ ढुलमुल नीति के चलते सामूहिक लड़ाई को बल नहीं मिल रहा था। अब जब आतंकी गुट इस्लामिक स्टेट ने फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम, तुर्की जैसे यूरोपीय देशों को निशाना बनाना शुरू किया है और इससे पहले अलकायदा ने अमेरिका में 9/11 हमले को अंजाम दिया, उसके बाद यूरोप और अमेरिका ने आतंकवाद को ग्लोबल समस्या माना है।

इस बीच आतंकवाद के खिलाफ सऊदी अरब भी खुद संजीदा हुआ है। सऊदी की पहल से ही पाकिस्तान की अगुवाई में 34 मुस्लिम देशों ने आईएस, अलकायदा जैसे कट्टर इस्लामिक आतंकी गुटों के खिलाफ लड़ने के लिए एक मंच बनाया है। यह मंच पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों में सक्रिय आतंकी संगठनों के खात्मे के लिए अभियान चलाएगा। खास बात यह है कि इस अभियान में सऊदी अरब की अहम भूमिका है। इसमें पाकिस्तान को शामिल कर सऊदी अरब ने उसे कूटनीतिक रूप से आतंक के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर किया है।

इससे पहले प्रधानमंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा की थी और उस दौरान भारत और यूएई ने आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने का संकल्प लिया था। नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, तब से वे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस मायने में पीएम की यह यात्रा सफल कही जा सकती है। में उनसे है वफा की उम्मीद, जो नहीं जानते कि वफा क्या है ! शायर जब ये शेर कहता है तो उसका निहित मंतव्य वही होता है जो एक धोखेबाज माशूका की जाती फितरत का हाले-बयां होता है।

इस आलोच्य शेर में उम्मीद शब्द तो फिर भी इस संभावना को जीवित रखता है कि आज भले ही माशूका बेवफा है तो क्या, भविष्य में उसका हृदय परिवर्तित भी हो सकता है, और उसे वफादारी आ भी सकती है, क्योंकि यहां मामला केवल माशूका के वफा न जानने को लेकर अटका हुआ है। अत: देर-सवेर ही सही, माशूका वफा का भूला हुआ सबक सीख कर प्यार की मूल शर्त पूरी कर भी सकती है। मतलब, वह एक ईमानदार माशूका बन भी सकती है। यहां उम्मीद के लिए उम्मीद से उम्मीद कायम है मगर यहां जिक्र है एक ऐसी हमसाया माशूका का जो न तो वफा ही जानती है, और न ही वफा जानने का उसका कोई ज्ञात-अज्ञात इतिहास ही रहा है, और तो और भविष्य में भी उसके द्वारा वफा का सबक सीखने की कोई गुंजाइश नहीं है।

उसे तो सिर्फ और सिर्फ एक काम बखूबी आता है वह है धोखा देना, बात-बात पर धोखा देना, पल-पल में धोखा देना, विश्वास में अविश्वास का धोखा देना, दरअसल, वफा शब्द उसके डीएनए की गुणमाला का जन्मजात हिस्सा ही नहीं है। वह सिर्फ बेवफाई जानती है। छल-परस्ती उसका नैतिक संस्कार है। वह खुद अपने विश्वास के साथ भी बेवफा है। जख्म देना उसके रक्त में है और धोखा देना उसका माजी से शगल रहा है। आतंकवाद की गोद में पली-बढ़ी ये माशूका किसी डायन-सी रक्त-पिपासु है। प्रेम के बदले धोखा देकर फिर प्रेम का स्वांग रचना उसका राजनय-शौक है।

सुना है हमने उस माशूका को अपनी बेवफाई के हरे जख्म देखने के लिए अपने घर (मुल्क में) चाय पर बुलाया है। हम उसे अपने जख्मों का नाप व गहराई दिखाकर उससे वफा की काफिर उम्मीद लगा बैठे हैं। हमें एक बार फिर भरोसा है कि वह हमारे दर्द की इंतेहा को शिद्दत से पहचानेगी। हमारे जख्मों की खैरख्वाह होकर गमगुसारी करेगी। जख्मों पर वफादारी का मल्हम लगाकर उन्हें सहलाएगी। एक बार फिर हम उसी को देखकर जीना चाहते हैं जिस काफिर पर हमारे विश्वास का दम दशकों से निकलता आ रहा है। वो बेवफा भी हमारे ताजादम जख्मों को देखकर मुतमईन है कि ये इतने हरे तो नहीं हैं जितने मैंने इस सहिष्णु-दीवाने को देना चाहे थे। वह अचंभित है कि मेरी बेवफाई तेरी सहनशीलता के आगे आखिर कमतर कैसे रह गई।

मेरी बेवफाई में कुछ तो कोर-कसर बाकी है जो तेरे जख्म अब तक मुकम्मल सब्ज नहीं हुए। वह हमारे इम्तहान के शौक का दोबारा इम्तहान लेने को बेकरार है। तभी तो उसने फरमाइश की है कि ए.. दीवाने, हम तेरे दर्द की तड़पन का दोबारा दीदार करना चाहते हैं । इधर, हम भी ऐसे जुनूनी दीवाने ठहरे कि उस जालिम को अपने जख्मो-दर्द के दीदार का खुला न्योता दे बैठे हैं। सुना है वे अपने मुल्की लाव-लश्कर के साथ हमारे जख्मो-दर्द के दीदार के लिए हमारे मुल्क आए और हमारे घावों की हरियाली का तमाशा देखकर चले गए। हम खुश हैं कि वह हमारे जख्मों की चारासाजी करेगा।

राजेश सेन गृह युद्ध से जूझ रहे सीरिया में एक अहम घटनाक्रम के तहत राष्ट्रपति बशर अल असद के अलावी संप्रदाय के कई नेताओं ने एक दस्तावेज जारी कर असद के शासन से किनारा कर लिया है। अलावी संप्रदाय के सामुदायिक और धार्मिक नेताओं ने अपने संप्रदाय की भविष्य की रूपरेखा तैयार की है। इस दस्तावेज को तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वालों का कहना है कि अलावी संप्रदाय असद के शासन से पहले भी अस्तित्व में था और उसके बाद भी रहेगा। उनका कहना है कि यह दस्तावेज अलावी संप्रदाय की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा और उनकी अलग पहचान अलावियों और असद शासन के बीच की गर्भनाल को अलग करने का काम करेगा। आठ पन्नों के दस्तावेज में अलावियों के लिए इस्लाम के भीतर तीसरे मॉडल की बात कही गई है।
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