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''जो प्रेस कभी बंद नहीं हो सकती उसका नाम है ''गीता प्रेस''

सोशल मीडिया के युग में कोई भी गलत समाचार आसानी से प्रसारित हो जाता है और लोग उस पर यकीन भी कर लेते हैं। आज अनेक नेता–अभिनेताओं के निधन की खबर आये दिन चल जाती हैं।

सोशल मीडिया के युग में कोई भी गलत समाचार आसानी से प्रसारित हो जाता है और लोग उस पर यकीन भी कर लेते हैं। आज अनेक नेता–अभिनेताओं के निधन की खबर आये दिन चल जाती हैं। फिर भला गीता प्रेस जैसी प्रतिष्ठित संस्था इससे अछूती कैसे रहती।

आजकल गीता प्रेस के बंद होने की खबर अचानक व्हाट्सअप पर चलने लग जाती हैं। ऐसी खबरें आपको तकलीफ देती हैं और हौसला तोड़ने का काम करती हैं। हाल ही में मेरा गोरखपुर जाना हुआ तो मेरी दो ही प्राथमिकताएं थीं एक तो भगवान गोरखनाथ जी के दर्शन और दूसरा गीता प्रेस के दर्शन।

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मैंने बचपन से गीता प्रेस का नाम सुन रखा था। घर में हनुमान चालीसा हो या रामचरित मानस सभी वहीं की हुआ करती थीं। संयोग से मेरी माता का नाम भी गीता ही है और मैं भी अपनी कार्टून पत्रिका कार्टून वॉच एक प्रेस में ही छपवाता हूं। आज के दौर में जब अखबार, पत्रिकाएं, संस्थाएं बिना सरकारी मदद और विज्ञापन के नहीं चल सकतीं वहीं 95 बरस से चल रही यह संस्था किसी अजूबे से कम नहीं। क्योंकि यह संस्था ना तो किसी तरह की सरकारी मदद लेती हैं और ना ही विज्ञापन।

सस्ती किताबें

आज प्रकाशन इतना महंगा होने के बावजूद यह संस्था रंगीन, मोटी, साफ सुथरी पुस्तकें इतने कम दामों पर देती हैं तो लोग चौंक जाते हैं। गीता प्रेस सचमुच में आर्थिक लाभ के लिये काम नहीं करती, सचमुच इसलिये क्योंकि आज के युग में अनेक संस्थायें ऐसा कहती प्रतीत हो सकती हैं। मैं श्रद्धा, कौतुहल और इस भय से गीता प्रेस पहुंचा कि कहीं वह सचमुच बंद होने की स्थिति में तो नहीं।

गीता प्रेस के वर्तमान में पदस्थ प्रोडक्शन मैनेजर राजेश शर्मा ने पूरे जोश से हमारा स्वागत किया। मैंने सोशल मीडिया पर चली गीता प्रेस के बंद होने की खबर के विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि यह बिल्कुल गलत खबर है और यह किसी की शरारत है। आप पहले हमारे साथ पूरे प्रेस प्रांगण का अवलोकन करें फिर आपको स्वयं ही आपके प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा।

कई एकड़ में फैली है गीता प्रेस

जब मैं उनके साथ चलने लगा तो पाया कि गीता प्रेस कई एकड़ों में फैली है और कितने ही गोदाम पेपर के रोल और पेपर के बंडलों से भरे हैं। एक तरफ जहां नई तकनीक वाली विदेशी प्रिंटिंग मशीनों में धकाधक रामचरित मानस, कल्याण और गीता सहित अनेक ग्रंथ तैयार हो रहे थे वहीं पुरानी मशीनों को भी खाली नहीं रखा गया था। वे मशीनें भी चल रहीं थी जिसमें आदमी के हाथ का सहयोग ज्यादा होता है।

बाइंडिंग की मशीनें भी अत्याधिुनिक थीं जिसमें कल्याण के वार्षिक अंक बन रहे थे। हम हाल दर हाल चलते जा रहे थे और मशीनें थी की कम ही नहीं हो रहीं थीं। सब पर धड़ल्ले से काम हो रहा था। लाख पचास हजार से कम का आंकड़ा तो मानों उन्हें मालूम ही नहीं था। आज जब बाजारवाद अच्छे अच्छे संस्थानों को खा जाता है वहीं मैंने पाया कि एक संस्थान बाजारवाद को न सिर्फ जूते की नोंक पर रखकर चल रहा है अपितु उसे रौंद भी रहा है।

यहां यह बता देना लाजमी है कि गीता प्रेस में किसी भी जीवित व्यक्ति की तस्वीर या विज्ञापन नहीं प्रकाशित किया जाता। यहां तक कि इसके संस्थापक जयदयाल गोयन्दका जी की भी आज तक एक भी तस्वीर प्रकािशत नहीं की गई, जो हम इस लेख के साथ प्रकािशत कर रहे हैं।

40-90 प्रतिशत कम मूल्य

किसी भी प्रकाशक से आप कोई भी गीता प्रेस में छपी पुस्तक दिखाकर उसका प्रकाशन मूल्य पूछ लें तो आप चौंक जायेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है। कोई लागत से 40 से लेकर 90 प्रतिशत तक कम मूल्य में किताबें कैसे बेच सकता है, और फिर जब फायदा नहीं होता, सरकारी मदद नहीं लेते, तो फिर इसका खर्च कैसे चलता होगा। इस प्रश्न का जवाब मिला कि गीता प्रेस का ऋषिकेश में आयुर्वेदिक औषधालय है और कानपुर और गोरखपुर में कपड़ों का काम भी होता है और इससे प्राप्त आमदनी से इस संस्था को होने वाले नुकसान की भरपाई की जाती है।

15 भाषओं में छपती हैं किताबें

गीता प्रेस की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह काफी सस्ती होती है, साफ सुथरी प्रिंटिंग होती है और फोंट का आकार भी काफी बड़ा होता है जो सभी उम्र के लोगों के लिये पठनीय होता है। गीता के प्रकाशन के लिये प्रारंभ हुआ यह मिशन आज रामचरित मानस, हनुमान चालीसा सहित अनेक धार्मिक प्रकाशनों के लिये जाना जाता है। हिन्दी के अलावा यहां देश की 15 से अधिक भाषाओं में पुस्तकें प्रकािशत होती हैं। अब तो इसकी वेबसाइट भी है और आन लाईन भी पुस्तकें मंगाई जा सकती हैं।

गीताप्रेस बंद होने की अफवाह

राजेश शर्मा ने आगे बताया कि जब गीता प्रेस के बंद होने की अफवाह फैलाई गई तो हमारे बैंक एकाउंट में पैसा बरसने लगा, लोग बिना मांगे उस एकाउंट में पैसे डालने लगे और हमें इससे बचने के लिये उस बैंक एकाउंट को ब्लॉक करवाना पड़ा क्योंकि किसी भी तरह का सहयोग और चंदा लेना हमारी नीति के अनुकूल नहीं है। उन्होंने बताया कि इस मिशन का प्रारंभ तब हुआ जब गीता मर्मज्ञ जयदयाल गोयन्दका ने देखा कि गीता की शुद्ध प्रति मिलना मुश्किल है इसलिये गीता प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया। उस समय अंग्रेजों का शासन था और तत्कालीन अंग्रेजों के अधीनस्थ प्रिंटिग प्रेस जानबूझकर प्रकाशन में गलती कर देते थे।

जब गोयनका जी ने इसकी शिकायत की तो उन्हें कहा गया कि ऐसा है तो आप अपनी मशीन स्वयं लगा लीजिये, बस फिर क्या था गोयनका जी ने पहली विदेशी प्रिंटिंग मशीन खरीदी जिसे आज भी लोगों के दर्शनार्थ गीता प्रेस की चित्र के लीला चित्र मंदिर में रखा गया है। लीला चित्र मंदिर अपने आप में किसी म्यूजियम से कम नहीं। इस विशाल स्थान में श्रीकृष्ण और श्रीराम के जीवन को प्रदर्शित करते हस्त निर्मित चित्रों को फ्रेम करके लगाया गया है। भगवान के इतने सुंदर चित्र एक स्थान पर आप शायद ही कहीं देख सकेंगे।

700 से अधिक चित्र

यहां लगभग 700 से अधिक चित्र हैं और यहां फोटोग्राफी की इजाजत नहीं है लेकिन हमें अपने पाठकों के लिये चित्र चाहिये थे इसलिये विशेष रूप से हमें इसकी इजाजत दी गई। इस लीला चित्र मंदिर को भी देखने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता। इस स्थान पर रिकार्ड प्लेयर की आकार में प्राचीन हस्त लिखित श्रीमद्भागवत गीता की ओरिजिनल प्रति भी रखी गई है जिसे मैग्नीफाइंग ग्लास से पढ़ा जा सकता है। यहां गीता प्रवेशिका के लिये महात्मा गांधी द्वारा हस्तलिखित भूमिका को भी प्रदर्शित किया गया है जो 1933 में लिखी गई थी. यहां प्रदर्शित चित्र अद्भुत हैं और हम उनमें से कुछ हमारे पाठकों के लिये प्रकाशित कर रहे हैं।

500 टन कागज का प्रकाशन रोज

राजेश शर्मा के अनुसार वर्तमान में यहां 500 टन कागज का प्रकाशन रोज होता है और कल्याण के वार्षिक सदस्य ही ढाई लाख से अधिक हैं। गीता और रामचरित मानस हर साल करोड़ों की संख्या में छपती हैं। हनुमान चालीसा और अन्य चालीसाओं की गिनती बताना ही मुश्किल है। यदि आप अगली बार गोरखपुर जाये तो अपने बच्चों को गीता प्रेस के दर्शन अवश्य करायें और लीला चित्र मंदिर के भी।

जनजागरण के लिये नि:स्वार्थ रूप से काम

गीता प्रेस से वापस लौटते वक्त मुझे बहुत गर्व और सुकून की अनुभूति हुई कि मेरे देश में ऐसी भी संस्था है जो धर्महित में जनजागरण के लिये नि:स्वार्थ रूप से लगी हैं। अगली बार जब रेल्वे स्टेशन के गीता प्रेस के स्टॉल में जाएं तो यह विचार बिल्कुल त्याग दें कि आप किताब खरीदकर गीता प्रेस का भला कर रहे हैं या कोई दान कर रहे हैं, अपितु अनुग्रहित हों कि गीता प्रेस आपका और जनता का कल्याण कर रही है। जयदयाल गोयन्दका जी कितना सही कहते थे कि यदि मेरे द्वारा किया जाने वाला काम अच्छा होगा तो भगवान उसकी देखरेख स्वयं करेंगे और बुरा होगा तो हमें चलाना ही नहीं है।

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