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प्रमोद भार्गव का लेख : जीन के कोड में बदलाव हुआ संभव

दो महिला वैज्ञानिकों ने जीनोम एडिटिंग अर्थात डीएनए की संरचना में बदलाव के लिए क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिनड्रोमिक रिपीट्स (सीआरआईएसपीआर) सीएएस-9 (क्रिस्पर-कैस-9) पद्धति विकसित की है। वंशाणु परिवर्धन की इस तकनीक को जेनेटिक सीजर्स नाम दिया गया है। इसे हम हिंदी में अणु-कैंची कह सकते हैं। इस तकनीक का उपयोग कर कुछ हफ्तों में ही जीन के कोड में बदलाव संभव हो जाता है। फ्रांस की इमैनुएल और अमेरिका की जेनिफर डाउडना को अणु-कैंची बना लेने के लिए सम्मानित किया गया है।

प्रमोद भार्गव का लेख : जीन के कोड में बदलाव हुआ संभव
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प्रमोद भार्गव

रसायन विज्ञान के क्षेत्र में वर्ष-2020 के लिए नोबेल पुरस्कार दो महिला वैज्ञानिकों को मिला है। इमैनुएल शार्पेजी और जेनिफर डाउडना नाम की इन वैज्ञानिकों ने जीनोम एडिटिंग अर्थात डीएनए की संरचना में बदलाव के लिए क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिनड्रोमिक रिपीट्स (सीआरआईएसपीआर) सीएएस-9 (क्रिस्पर-कैस-9) पद्धति विकसित की है। वंशाणु परिवर्धन की इस तकनीक को जेनेटिक सीजर्स नाम दिया गया है। इसे हम हिंदी में अणु-कैंची कह सकते है। यदि कोई शोधकर्ता मनुष्यों, जानवरों, पौधों और सूक्ष्मजीवों की आंतरिक कार्य प्रणाली को जानकर उसमें बदलाव करना चाहता है, तो यह क्रिस्पर-कैस-9 अर्थात अणु-कैंची के बिना संभव नहीं है। इसका उपयोग कर कुछ हफ्तों में ही जीन के कोड में बदलाव संभव हो जाता है। हालांकि इस तकनीक के जरिए जीन एडिटिंग का सिलसिला पहले ही शुरू हो गया है। चीन ने इसी तकनीक के जरिए चूहों और बंदरों के अलावा कई अन्य प्राणियों के क्लोन तैयार करने में 2018 में ही सफलता प्राप्त कर ली थी। इस तकनीक पर पेटेंट को लेकर हार्वर्ड के ब्रॉड इंस्टीट्यूट और एमआईटी लंबी अदालती लड़ाई में उलझे हैं, क्योंकि इस पद्धति पर कई अन्य वैज्ञानिकों ने भी काम किया है। इन दोनों महिला वैज्ञानिकों को अणु-कैंची बना लेने के लिए सम्मानित किया गया है।

प्रत्येक नूतन प्राणी पुरातन का नवीनतम संस्करण होता है। इसका अपना नया रंग-रूप और मौलिक विलक्षणताएं होती हैं। बावजूद इनमें कई मनुष्य वंशानुगत बीमारियां लेकर पैदा होते हैं। ऐसी बीमारियों को कोशिका के स्तर पर ही दूर करने के चमत्कार का नाम ही जीन एडिटिंग है। इस तकनीक का विज्ञान पर क्रांतिकारी प्रभाव पड़ा है। यह न केवल कैंसर के उपचार में योगदान दे रही है, बल्कि विरासत में मिली बीमारियों के इलाज के सपने को भी साकार कर रही है। नोबेल पुरस्कार न्यायमंडल के अध्यक्ष क्लेस गुस्ताफसन ने इसे मानव जाति के लिए एक महान उपहार बताया है। हालांकि उन्होंने इसे सावधानी से इस्तेमाल करने की नसीहत भी दी है। फ्रांस की इमैनुएल ने नोबेल पुरस्कार मिलने पर खुशी जताते हुए कहा कि यह उन महिलाओं को प्रेरित करेगा, जो विज्ञान के क्षेत्र में काम करना चाहती हैं। वहीं, अमेरिका की जेनिफर डाउडना ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि इसका उपयोग जीव-विज्ञान में नए रहस्यों को उजागर करने और मानव जाति के कल्याण में होगा। इन दोनों वैज्ञानिकों समेत अब तक पांच महिलाओं को रसायन शास्त्र में नोबेल मिल चुके हैं।

इस तकनीक के माध्यम से एक जीनोम से आनुवंशिक तत्व निकालकर उसे दूसरे जीनोम में डाला जाता है। डीएनए में यह परिवर्धन कोशिका के स्तर पर ही कर लिया जाता है। इस बदलाव की विशेषता यह है कि यदि संतान के माता-पिता में कोई बीमारी है तो वह इस परिवर्तन से दूर हो जाती है। चीन के वैज्ञानिक जियानकुई एचआईवी (एड्स) संक्रमित पिता की जीन कुंडली में बदलाव करके जुड़वां बच्चियां पैदा कर चुके हैं। चीन इससे पहले जीन संसोधन के जरिए चूहे पैदा करने और क्लोन पद्धति से दो बंदरों के निर्माण का दावा भी कर चुका है। इस नाते मानना होगा कि वह कृत्रिम-मानव निर्माण की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है। कोशिका से एड्स का विषाणु अलग करने के लिए जीन संशोधन के इस प्रयोग में विशिष्ठ तकनीक क्रिस्पर-कैस-9 अपनाई गई थी। डीएनए में प्रवाहित विषाणु को इसी कैंची से काटकर अलग किया जाता है। यह तकनीक कैस-9 नामक एंजाइम के प्रयोग से काम करती है। यह डीएनए के किनारे पर जमा रहता है। इस प्रक्रिया को पूरी करने के लिए आरएनए अणु की भूमिका दिशा-निदेशक के रूप में रहती है। जीन में इस तरह से किए बदलाव से इच्छा के अनुसार बच्चे पैदा करना संभव है। इस प्रयोग की सफलता से यह उम्मीद जगी है कि वैज्ञानिक निकट भविष्य में भ्रूण में इतने परिवर्तन करने में सक्षम हो जाएंगे कि लाइलाज बीमारियां बच्चे के जन्म से पहले ही समाप्त हो जाएंगी। साथ ही भ्रूण के स्तर पर ही बच्चों में जीन के मार्फत अतिरिक्त बुद्धि डालना भी मुमकिन हो जाएगा।

जीन एडिटिंग को समझने से पहले मानव-जीनोम को समझना होगा। इनमें जीवन के रहस्य छिपे हुए हैं, इसीलिए इसे जीन कुंडली भी कहा जाता है। मानव-जीनोम तीन अरब रासायनिक रेखाओं का तंतु है। अमेरिका के क्रेग वेंटर एवं फ्रांसिस कोलिंस ने मानव-जीनोम की संरचना को वर्ष 2000 में ही पढ़ लिया था। इसमें डीएनए (डिआक्सीरिबोन्यूक्लिक एसिड) जो जीवन की आधारभूत संजीवनी है, असंख्य अणुओं की प्रक्रिया को समझा और दुनिया के वैज्ञानिक समूहों के सामने डीएनए की रहस्यमयी संरचना प्रकट की। इसके पहले यह अवधारणा थी कि मनुष्य की जटिलतम जीवन-संरचना में एक लाख से अधिक जीन गतिशील हैं। यही शरीर की प्रत्येक क्रिया व प्रक्रिया के लिए दिमाग में संकेतों का डंका पीटते हैं। लेकिन इन वैज्ञानिकों ने अपने शोध के निष्कर्ष में दावा किया कि मानव शरीर में केवल तीस हजार जीन हैं। चूहे के शरीर में भी लगभग इतने ही जीन होते हैं। कुछ विशेष जीनों को छोड़कर मनुष्य और चूहे में एक जैसे जीन होते हैं, इसीलिए मनुष्य की आंतरिक संरचना को समझने के लिए सबसे ज्यादा प्रयोग चूहे पर ही किए गए हैं। इन जीनों के व्यवहार और प्रभाव की पड़ताल जैसे-जैसे गति पकड़ती जाएगी, बीमारियों पर नियंत्रण का सिलसिला कोशिका के स्तर पर ही दूर होता जाएगा। इसीलिए इसके जरिए चिकित्सा क्षेत्र में क्रांति आने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। इसी अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि दुनिया के सभी मनुष्यों में जितने भी वंशानुगत जीन हैं, वे आश्चर्यजनक रूप में 99.99 प्रतिशत समान हैं, इसीलिए वैज्ञानिक यह दावा करते रहे हैं कि हम-सब एक माता-पिता की संतानें हैं।

इस प्रयोग के सामने आते ही इससे नैतिकता और प्रकृति की संरचना में अनैतिक छेड़छाड़ के प्रश्न भी उठ खड़े हुए हैं। दरअसल 2018 में ही क्रिस्पर-कैस-9 के बारे में ज्यादातर चिकित्सा विज्ञानियों ने जानकारी हासिल कर ली थी, इसीलिए जब चीनी वैज्ञानिक डॉक्टर ही जियानकुई ने दुनिया को बताया कि उन्होंने दुनिया के पहले जीन-एडिटेड शिशुओं को बनाने में सफलता प्राप्त की है। तब दुनिया को आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि इससे पहले भेड़ों का जन्म स्तंभ कोशिका और जीन संवर्धन पद्धति से हो चुका था, लेकिन इन उपलब्धियों को कभी मानव सभ्यता के लिए उपयुक्त नहीं माना गया। इसीलिए जीन विशेषज्ञों ने एक रिपोर्ट जारी करके चेतावनी दी थी कि फिलहाल इस पद्धति से शिशुओं का निर्माण जल्दबाजी होगा। दरअसल चीन से निकले कोरोना वायरस को इसी तकनीक से निर्मित कोविड-19 वायरस बताया जा रहा है। यह चीन से निकलकर फैल तो पूरी दुनिया में गया, लेकिन उपचार की कोई दवा नहीं होने की वजह से इस पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। ऐसे ही खतरों को भांपकर वैज्ञानिकों ने कहा था कि विज्ञान अभी संपूर्ण रूप से उन्नत नहीं है। (ये लेखक के अपने विचार हैं )

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