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योगेश कुमार सोनी का लेख : सुरक्षा के साथ हो गणेश मूर्ति विसर्जन

यदि थोड़ी सी समझदारी के साथ अपने त्योहार व प्रथाओं को मनाया जाए और किसी काम को सुगमता के साथ किया जाए तो उसकी अपनी आस्था पर चोट नहीं समझनी चाहिए, चूंकि जब खुशी का माहौल गम में बदलता है तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता। श्रद्धालुओं की संख्या के आधार पर प्रशासन अपने स्तर पर हर वो सुविधा देता है जो संभव है, लेकिन कुछ हुड़दंगियों की वजह से स्थिति बेकाबू हो जाती है और मौतें हो जाती हैं। यहां प्रशासन को इस तरह की नीति बनानी चाहिए कि एक बारी में अधिक लोग न जा सकें तो यह बेहतर होगा। कोरोना को लेकर सुरक्षा बनी रहेगी व भीड़ भी नियंत्रित होने से हादसा नही होगा।

योगेश कुमार सोनी का लेख : सुरक्षा के साथ हो गणेश मूर्ति विसर्जन
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योगेश कुमार सोनी 

योगेश कुमार सोनी

देश में चारों ओर गणेश पूजा व विसर्जन की धूम है। जैसा कि हमारे देश में हर पर्व को बहुत उत्साह से मनाया जाता है, क्योंकि हमारे यहां हर धर्म, रंग व जाति का समावेश है। पूरे विश्व की अपेक्षा हमारे यहां सबसे ज्यादा त्योहार मनाए जाते हैं। सभी लोग हर छोटे-बड़े पर्व को अपनी प्रथाओं के साथ जीते व मनाते हैं, लेकिन दु:ख तब होता है जब खुशी वाला माहौल मातम में बदल जाता है। बीते कई वर्षों से पूरे देश में गणेश विसर्जन के दौरान लोगों के डूबने व मरने की तमाम खबरें आई। बीते शनिवार दिल्ली के सोनिया विहार के दूसरे पुश्ते पर विसर्जन के दौरान तीन बच्चों की मौत हो गई। इसके अलावा भी देशभर से ऐसी कई खबरें आ रही हैं। जैसा कि गणेश चतुर्थी पर लोग अपने घरों में गणेश जी को तीन या पांच या हर कोई अपनी श्रद्धा के अनुसार स्थापित कर फिर उनका विसर्जन कर देता है। मन में सवाल सवाल यही है कि इन मौतों का जिम्मेदार आखिर कौन है। हम इसमें शासन-प्रशासन को फेल बताएं तो भी काम नहीं चलेगा, क्योंकि लोग भी इसके सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। जहां भी मूर्ति का विसर्जन होता है वहां लोग अधिक संख्या में पहुचंते हैं और इस दौरान नाच-गाना बहुत होता है व साथ में एक दूसरे पर गुलाल लगाते हैं। ज्यादा मस्ती करने व धक्का मुक्की के कारण वह गलती कर देते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है और ऐसा नहीं कि वहां बंदोबस्त की कोई कमी होती है लेकिन ज्यादा भीड़ व लापरवाही भारी पड़ जाती है।

ऐसी स्थिति छठ पूजा, होली व अन्य कई तरह के उत्सवों पर देखने को मिलती है। यह हमेशा से तकलीफ का विषय रहा है जब कोई भी इंसान लापरवाही की वजह से मौत के आगोश में चला जाता है। अचानक व अल्प आयु में मौत से पूरा घर बर्बाद हो जाता है। ऐसी घटनाओं से बहुत ज्यादा आश्चर्य इसलिए भी होता है, क्योंकि हर बार इस तरह के हादसे होते हैं जिससे हम आज भी सबक सीखने को तैयार नही हैं। यदि इस मामले में कोई सलाह या ज्ञान देना भी चाहे तो लोगों यह लगता है मानों उनके धर्म या आस्था पर वार कर दिया हो। आप अपने त्योहार अपनी प्रथा के अनुसार मनाएं, लेकिन अपनी सुरक्षा का जिम्मा तो स्वयं आपको ही लेना पड़ेगा।

कुछ वर्षों पुरानी बात है विसर्जन के समय एक व्यक्ति की मौत हो गई थी जो अपने घर का जीविका चलाने वाला एक मात्र इंसान था। उसकी मौत के चंद दिनों बाद ही गम में उसके माता-पिता की मौत हो गई थी। उसकी पत्नी भारी डिप्रेशन में चली गई थी, जिससे वह पूर्ण रूप से पागल हो चुकी थी और दोनों बच्चों की जिंदगी वीरान हो गई। यह सिर्फ एक ही व्यक्ति की कहानी से समझाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा तमाम ऐसे उदाहरण जिससे आपका दिल और रूह कांप सकती है।

आज से करीब तीन दशक पूर्व देश की तस्वीर अलग ही हुआ करती थी। जनसंख्या बढ़ने के कारण आज जगह कम होती जा रही है, लेकिन हम त्योहार या प्रथाएं आज भी उसी तरीके से निभाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि पहले नदी, तालाब व गंगा, यमुना व अन्य जल स्थल तमाम जगह मिल जाते थे और लोग भी कम होते थे, जिससे कोई भी काम करने में परेशानी नहीं होती थी। अब दोनों चीजें विपरीत स्थिति में चली गई हैं। पहला तो पानी वाली जगह कम हो गई दूसरा जनसंख्या अधिक हो गई जिससे हादसों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यदि महानगरों के परिवेश की बात करें तो यहां हादसों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि जल स्थल बेहद कम होते चले गए और जनसंख्या में बेहद वृद्धि को चुकी है और लोगों में समय को लेकर गुंजाइश भी नहीं है। हर कोई जल्दी में रहता है। काम भी सारे करने हैं और धैर्य नाम की चीज बिल्कुल गायब है।

हालांकि तीज त्योहार आस्था का विषय हैं, लेकिन महानगरों में मूर्ति विसर्जन से अब नदियों में फैलता प्रदूषण मानव जीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है जिससे हमारी मौजूदा व आने वाली पीढ़ी भारी संकट में पढ़ने वाली है। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के मुताबिक यमुना में अमोनिया का जलस्तर 0.5 होना चाहिए, लेकिन विसर्जन या नदी के अधिक प्रयोग के बाद 1.5 से ज्यादा हो जाता है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। यमुना में कई चरणों में करोड़ो रुपये लगाकर सफाई का काम किया जाता है, लेकिन गंदगी के अलावा प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों से इतनी गंदगी हो जाती है जिससे वह पानी किसी भी योग्य नही रह जाता। एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक अब लोग नदियों को नाले की तरह प्रयोग करते हैं, क्योंकि अब प्लास्टिक, पूजा सामग्री, खाद्य सामग्री, कॉस्मेटिक्स सामान के अलावा महिलाओं द्वारा माहवारी के दिनों प्रयोग किए पैड्स तक मिलने लगे। वैसे तो हम गंगा, जमुना मैया कहकर इनको पूजते हैं वहीं दूसरी ओर ऐसी हरकतों को अंजाम दे रहे हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि हम आस्था के साथ खुद से कितना बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

कुछ लोगों ने बदलते परिवेश में इस मामले को लेकर एक अच्छी तरकीब निकाली है। एक मोहल्ले के लिए कई लोग मिलकर मंदिर में मिट्टी के गणेश जी को स्थापित करके फिर विसर्जन के समय पूरे एरिया का चक्कर लगाकर जिस प्रक्रिया को 'नगर फेरी' बोलते हैं इसके बाद एक पानी भरी बॉल्टी में उनको डूबाकर पानी में मिला देते हैं इसके बाद उस पानी को सभी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बांट लेते हैं और सभी अपने पेड़-पौधे या गमले में डाल लेते हैं। कुछ पंडित, बुजुर्गों या धर्मगुरुओं द्वारा बदलाव की नई प्रकिया लोगों को बहुत भा रही है, क्योंकि इससे न तो पदूषण होता है और न किसी की जान जाती है। यदि आज हम परिस्थितियों के हिसाब से नहीं बदले तो आने वाले कल में उस स्थिति में आ जाएंगे, जिससे निकलना बेहद कठिन हो जाएगा। अपने लिए न सही कम से कम आने वाली पीढ़ी को यदि कम आज के युग की तकनीकी या सुझाव समझा गए तो भविष्य अच्छा आने की उम्मीद बनी रह सकती है।

यदि थोड़ी सी समझदारी के साथ अपने त्योहार व प्रथाओं को मनाया जाए और किसी काम को सुगमता के साथ किया जाए तो उसकी अपनी आस्था पर चोट नहीं समझनी चाहिए, चूंकि जब खुशी का माहौल गम में बदलता है तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता। श्रद्धालुओं की संख्या के आधार पर प्रशासन अपने स्तर पर हर वो सुविधा देता है जो संभव है, लेकिन कुछ हुड़दंगियों की वजह से स्थिति बेकाबू हो जाती है और मौतें हो जाती हैं। यहां प्रशासन को इस तरह की नीति बनानी चाहिए कि एक बारी में अधिक लोग न जा सकें। कोरोना काल में जिस तरह शादियों, मृत्यु व अन्य कार्यक्रमों में लोगों के एकत्रित होने की संख्या सीमित हो गई है वैसे ही विसर्जन पर भी ऐसे ही व्यवस्था बने तो बेहतर है। कोरोना को लेकर सुरक्षा बनी रहेगी व भीड़ भी नियंत्रित होने से हादसा नही होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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