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सुरेश पचौरी का लेख : गांधी के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक

गांधीजी ने जो विराटता अर्जित की थी वह अपने चरित्र और कर्म से, त्याग और बलिदान से, राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण से और समाजसेवा के भाव से अर्जित की थी। गांधी आदर्श यथार्थवादी थे। उन्होंने जिन आदर्शों की बात की उन पर शत-प्रतिशत अमल किया। कथनी और करनी की एकरूपता ने उनके व्यक्तित्व, उनकी वाणी और उनके कार्यों में एक प्रभावशाली चमक पैदा की। गांधीजी जैसा लोकव्यापी और बहुआयामी व्यक्ति 20वीं सदी में पूरी दुनिया में नहीं हुआ। बापू महामानव हैं, उपदेशक नहीं हैं, कर्मण्य महापुरुष हैं। उनकी विराटता की असली कसौटी उनकी सर्वकालिक प्रासंगिकता है।

सुरेश पचौरी का लेख : गांधी के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक
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सुरेश पचौरी

महात्मा गांधी ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने अपने कार्यों, विचारों और आदर्शों से एक नए युग का सूत्रपात किया। उन्हें गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने महात्मा की उपाधि दी तथा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने राष्ट्रपिता का संबोधन दिया। गांधीजी ने जो विराटता अर्जित की थी वह अपने चरित्र और कर्म से, त्याग और बलिदान से, राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण से और समाजसेवा के भाव से अर्जित की थी। गांधी जैसा लोकव्यापी और बहुआयामी व्यक्ति 20वीं सदी में पूरी दुनिया में नहीं हुआ।

बापू महामानव हैं, उपदेशक नहीं हैं, कर्मण्य महापुरुष हैं। उनकी विराटता की असली कसौटी उनकी सर्वकालिक प्रासंगिकता है। 19वीं सदी गांधी के जन्म की एवं 20वीं सदी उनके विलक्षण कर्म की है। मोहनदास करमचंद गांधी से लेकर महात्मा गांधी तक का जो लंबा सफर है, उसमें गांधीजी ने कई परेशानियों का सामना किया, अपमान सहा, लेकिन वे अपने कर्तव्यपथ से नहीं डिगे। बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने अफ्रीका की रंगभेदी हुकूमत के अमानवीय बर्ताव के विरुद्ध सत्याग्रह के माध्यम से अहिंसक संग्राम छेड़ा। फिर वे 1915 में भारत आए और अपने गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के परामर्श से भारत के समाज और उसके मिजाज, भारत की समस्याएं और चिंताएं जानने समझने के लिए देश-भ्रमण पर निकले। उन्होंने रेल के तीसरे दर्जे में सफर किया, साधारण वेशभूषा और शाकाहारी भोजन अपनाया। इसी सुदीर्ध यात्राक्रम में गांधीजी ने भारत की आत्मा से साक्षात्कार किया और यहीं से बापू की प्रासंगिकता का पाठ शुरू होता है, जिसका मूलमंत्र यह है कि त्याग-भरी सादी जिंदगी जियोगे तो आदर और श्रद्धा पाओगे।

महात्मा गांधी अप्रैल, 1917 में फिरंगियों के जुल्म से त्रस्त किसानों की समस्याओं को जानने-समझने बिहार के चम्पारन पहुंचे। उन्होंने किसानों की तकलीफों को गांव-गांव जाकर समझा। महात्मा गांधी हालात का परीक्षण किए बिना हस्तक्षेप करने अथवा कोई मुद्दा उठाने में विश्वास नहीं करते थे। गांधीजी की यह सीख सदैव प्रासंगिक है कि बिना किसी मुद्दे के तह में जाए कोई आंदोलन न छेड़ो। चम्पारन में अंग्रेजी हुकूमत ने सत्याग्रह शुरू होने के पहले ही उन्हें जिले से बाहर जाने का हुक्म थमा दिया। गांधीजी के साथ मौजूद वकीलों ने कहा कि इस मामले में जो धाराएं बताई जा रही हैं उनमें जमानत हो सकती है, परंतु गांधीजी ने जमानत लेने से इनकार कर दिया। गांधीजी ने चंपारन के लोगों के बीच में रहना तय किया, वे वहां से वापस लौटने को तैयार नहीं हुए। मजबूरन मजिस्ट्रेट ने आरोप हटा लिए और इस प्रकार गांधीजी ने जनता के मन से पुलिस और कचहरी का भय मिटाने की शरुआत की। गांधीजी ने आह्वान किया कि भारतवासी अपनी गिरफ्तारी और जेल जाने के मामले में बेखौफ हो जाएं। लोकतंत्र की सार्थकता के लिए गांधीजी के इस कदम की सदा-सर्वदा प्रासंगिकता है कि सत्य के मार्ग पर अडिग रहो। गांधीजी ने भारतीयों को उन पर होने वाले अत्याचारों और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना सिखाया। गांधीजी ने जनसाधारण को, युवाओं को एवं महिलाओं को आजादी के आंदोलन से जोड़ा। इस तरह आजादी की लड़ाई को जमीनी ताकत और व्यापकता मिली। कांग्रेस का अभियान गांधीजी के नेतृत्व में विषाल जनआंदोलन में रूपांतरित हो गया।

महात्मा गांधी की अविभाजित मध्यप्रदेश में हुई दस यात्राएं मध्यप्रदेश के इतिहास क्रम पर पड़े दस अमिट पदचिह्न हैं। 1 दिसम्बर 1935 को गांधीजी नरसिंहपुर जिले के करेली से अंनतपुरा (देवरी) जाने के लिए पहुंचे। तब नाव से नर्मदा पार करनी पड़ती थी। मल्लाहों ने गांधीजी को नाव से नर्मदा पार उतारने के लिए पांव पखारने की शर्त रखी। नर्मदाजी के बरमान घाट पर रामायण काल का केवट प्रसंग सजीव हो उठा। गांधीजी परम वैष्णव थे, मां नर्मदा के जल से कैसे पांव पखरवाते। एक बुजुर्ग सन्यासी ने सुझाव दिया कि पहले गांधीजी नर्मदा पूजन कर लें फिर मल्लाहों का भी मान रख लें। यह दृष्टांत बताता है कि गांधीजी को सामान्य जनमानस ने लोक देवता मान लिया था। यह उनकी चिरकालिक मान्यता-महत्ता और लोक स्वीकृति का अनुपम उदाहरण है। प्रश्न यही है कि आखिर क्यों हमारे देश के लोग गांधी के पीछे चल पड़े? उत्तर यह है कि भारत के कोटि-कोटि जनों ने उनमें अपनी अपेक्षाओं और आशाओं का अहसास देखा। जीवन के मूल्यों-मर्यादाओं और संस्कृति का साकार रूप अनुभव किया। लोगों को गांधी में वर्तमान समस्याओं का समाधान तथा भविष्य का संकेत मिला। वे उन्हें अपने लगे और तभी लोगों ने उन पर अटूट भरोसा किया। भारत के महान शिक्षाविद् कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी ने गांधीजी का कितना सटीक विष्लेषण किया, 'उन्होंने दासों को मनुष्य बनाया। उन्होंने भारतीय नारी समाज को स्वतंत्र किया। उन्होंने समाज से अस्पृश्यता का विनाश किया। उन्होंने उन फौलादी दीवारों को तोड़ दिया जिनमें हमारा समाज जकड़ा हुआ था। उन्होंने हीन भावना के शाप को, जो हमारी सामूहिक चेतना पर गत 900 वर्ष के विदेशी आधिपत्य से हावी हो गया था, समाप्त किया। उन्होंने भारतीयों का अपनी संस्कृति में अभिमान और अपनी शक्ति में विष्वास पुनः जाग्रत किया। उन्होंने भारत की अविनाशी संस्कृति को पुनः प्रतिष्ठित किया और उसे विश्व-विजय के पथ पर फिर से आरूढ़ किया। वे नव-जीवन के दूत थे।

महात्मा गांधी आदर्श यथार्थवादी थे। उन्होंने जिन आदर्शों की बात की उन पर शत-प्रतिशत अमल किया। कथनी और करनी की एकरूपता ने उनके व्यक्तित्व, उनकी वाणी और उनके कार्यों में एक प्रभावशाली चमक पैदा की। जब-जब भी मानवता के सामने कोई संकट उठ खड़ा होगा, तब-तब बापू के विचार उसे राह दिखाएंगे। गांधीजी की प्रासंगिकता की पड़ताल करते हुए हम समझ सकते हैं कि सच्चा, जन-नेतृत्व वहीं होता है जो मनसा-वाचा-कर्मणा अपने आचरण से जन मानस को उद्वेलित-उत्प्रेरित कर पाता है।

गांधीजी ऐसे ही जननायक थे। महात्मा गांधी का महत्व इसलिए भी सार्वकालिक है क्योंकि समाज के सामने जो समस्याएं तब थीं, कामोबेश आज भी हैं। उदाहरण के लिए अस्पृश्यता, गरीबी, अशिक्षा, स्वावलंबन की आवश्यकता, सादगी, महिलाओं को बराबरी का दर्जा, अपनी संस्कृति व जीवनशैली पर अभिमान और सबसे बड़ी बात है सत्य वचन। बापू सच बोलने में विश्वास करते थे। आजादी के बाद हालांकि समाज का मानस पहले की तुलना में बदला है और इसका कारण भी बापू की सीख ही है, लेकिन एक आधुनिक प्रगत समाज के लिए जो अमूल बदलाव अपेक्षित है, उसके लिए काफी कुछ करना बाकी है। इसके लिए गांधी के विचार ही हमारे लिए प्रकाश स्तम्भ की तरह हैं और हमेशा रहेंगे।

(लेखक केंद्रीय मंत्री रहे हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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