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विष्णुगुप्त का लेख : गेमचेंजर होगी स्वामित्व योजना

स्वामित्व योजना भी मील का पत्थर साबित होगी और देश में करोड़ों लोगों काे अपनी जमीन और घर का स्वामित्व मिलेगा। हर योजना का अर्थ परोपकार होता है। जाहिर तौर पर इस योजना का अभी अर्थ और लक्ष्य वैसे व्यक्ति को स्वामित्व देने का कार्य करना है जिनके पास जमीन तो, घर तो है पर उस पर उनका कानूनी अधिकार नहीं है। स्वामित्व योजना के बड़े फायदे भी गिनाए जा रहे हैं। फायदे होंगे भी। जिन लोगों को स्वामित्व कार्ड मिलेगा उन लोगों के लिए जीवन भी आसान हो जाएगा, उन्हें वंचित श्रेणी से बाहर रखने वालों पर लगाम लगेगी, सरकारी योजनाओं का लाभ भी आसानी से उठा सकते हैं।

विष्णुगुप्त का लेख : गेमचेंजर होगी स्वामित्व योजना
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पीएम मोदी

विष्णुगुप्त

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्ती योजनाओं की श्रृखंला में एक और योजना शामिल हो गई। यह योजना है स्वामित्व योजना। मोदी काल में पहले से ही कई योजनाएं चल रही हैं जिनमें उज्जवला, स्वच्छ भारत और जन-धन योजना शामिल हैं। इस योजना की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि उनकी अन्य योजनाओं की तरह यह स्वामित्व योजना भी मील का पत्थर साबित होगी और देश में करोड़ों लोगों काे अपनी जमीन और घर का स्वामित्व मिलेगा। हर योजना का अर्थ परोपकार होता है। जाहिर तौर पर इस योजना का अभी अर्थ और लक्ष्य वैसे व्यक्ति को स्वामित्व देने का कार्य करना है जिनके पास जमीन तो, घर तो है पर उस पर उनका कानूनी अधिकार नहीं है।

कहने और देखने में यह स्पष्ट जरूर होता है कि यह योजना वंचित वर्ग को अधिकार देने वाली है, पर इस योजना को लागू करने के क्षेत्र में कितनी कठिनाइयां हैं, कितना दुरूह कार्य है, इस पर अभी तक कोई स्पष्ट राय सामने नहीं आई है। महत्वपूर्ण योजना लाना और योजना की घोषणा करना ही महत्वपूर्ण नहीं होता है, महत्वपूर्ण तो योजना को भ्रष्टाचारमुक्त और सहजता के साथ लागू करना होता है। देश में अब तक जितनी भी योजनाएं आई हैं सबके सब में बेईमानी हुई, भ्रष्टाचार हुआ, आमजन को योजनाओं का लाभ उठाने के रास्ते कठिन बनाए गए, पात्र लोगों वंचित ही रखा गया, अपात्र और पहुंच वाले येन-केन-प्रकारेण योजनाओं का लाभ उठाने में सफल हो गए। अपनी किसी भी योजना के पक्ष में प्रशंसा करना और उसे जनकल्याणकारी बताना हर सत्ता का प्रिय कार्य होता है, इसलिए योजनाओं की घोषणा के तुरंत बाद ही इसकी सफलता की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

फिर भी इस योजना को लेकर नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में कोई हर्ज नहीं है। सत्ता चाहे किसी भी व्यक्ति की है, सत्ता चाहे किसी भी विचारधारा की क्यों न हों, अगर वह कोई वंचित समाज को लाभ-अधिकार देने वाली योजनाओं का श्रीगणेश करती है तो फिर उसका स्वागत किया जाना चाहिए। निश्चित तौर पर सूचना के अधिकार से भ्रष्टाचार पीड़ितांे को न्याय मिला है। अब यहां एक प्रश्न यह उठता है कि स्वामित्व योजना को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा क्यों होनी चाहिए? इसका उत्तर यह है कि वेे एक ऐसे प्रश्न का हल करने के लिए आगे आए हैं जिसके बोझ से करोड़ों लोग दबे हुए थे।

वास्तव में स्वामित्व के अधिकार का प्रश्न हल करने में हमने बहुत ही देरी कर दी है, इस देरी की कीमत कितनी चुकाई गई है उसका अब तक कोई हिसाब-किताब नहीं है, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों ने जान देकर कीमत चुकाई है, कानूनी झंगड़ों में अपनी कमाई भस्म की है। आजादी की प्राप्ति के बाद ही इस प्रश्न का हल खोज लेना चाहिए था। यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण था। आजादी के बाद हमारे जिन शासकों ने भी शासन किया उनके राजनीतिक एजेंडे से यह प्रश्न दूर था। भारत गांवों का देश है, इसीलिए यह कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यह भी सही है कि गांवों की जनता शिक्षा से दूर थी, शिक्षा के वंचित होने के कारण गांव के लोग सरकारी कागजों या फिर स्वामित्व के अधिकार के अर्थ से अनभिज्ञ थे। उनकी सोच यह थी कि उन्हें कोई भी उनके घर और उनकी जमीन से वचित नहीं कर सकता है। जिस जमीन को वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जोतते-आए हैं और जिस घर में वे रहते आये हैं उस पर तो उनका परंपरागत अधिकार है और उनके इस अधिकार से कोई भी वंचित नहीं कर सकता है। यह भी सही है कि आज से बीस-तीस साल पूर्व तक गांवों में जमीन की कोई किल्लत नहीं थी, गांव के लोगों के पास जीविका चलाने के लिए पर्याप्त भूमि थी, इसलिए जमीन या घर के लिए कोई मारा-मारी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे विकास की जरूरतें बढ़ीं, जनसंख्या बढ़ी। इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे। विकास के लिए जमीन कम पड़ने लगी। खेती की महत्ता भी बढ़ गई, परंपरागत खेती की जगह व्यावासायिक खेती ने ले ली, इसलिए जमीन पर कब्जे के लिए कानूनी अहर्ताएं जरूरी हो गईं।

जमीन पर स्वामित्व के लिए कानूनी अहर्ताएं वैसे लोग ही पूरी कर सके जो आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर मजबूत थे और जिनकी पहुंच सत्ता तथा प्रशासनिक स्तर पर अति मजबूत थीं। ऐसे वर्ग के लोगों ने जैसे-तैसे कर स्वामित्व के कागजात हासिल कर लिए, पर वैसे लोग पीड़ित बन गए, जो स्वामित्व के कागज हासिल नहीं कर सकें। खासकर आदिवासी संवर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुए। जंगलों में रहने वाले आदिवासी कभी भी सरकारी कागजों के पीछे नहीं भागे। उनका कहना साफ था कि जल, जंगल और जमीन पर उनका परंपरागत अधिकार है। यह सही है कि आदिवासियों का पूरा जीवन ही जंगलों पर निर्भर था। वे समूह में रहते थे जहां पर कभी सरकारी कर्मचारी भी नहीं पहुंच पाते थे। जब से जंगलों का राष्ट्रीयकरण हुआ और टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई तब से आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया गया। जंगलों से उन्हें बाहर खदेड़ने की कोशिश हुई, उनकी पुश्तैनी जमीन को वन क्षेत्र की जमीन घोषित कर दिया गया। आज भी जंगलों के आस पास रहने वाले लाखों आदिवासियों के पास उनकी सम्पत्ति के कागजात नहीं है, उनके पास जमीन भी है और घर भी है पर उसके कानूनी कागजात नहीं है। आदिवासी संवर्ग स्वामित्व के कागजात के लिए अथक दौड़-धूप भी लगाते हैं पर नाकाम ही साबित होते हैं। स्वामित्व योजना आदिवासियों को कितना लाभ देगी, यह नहीं कहा जा सकता है?

स्वामित्व योजना के बड़े फायदे भी गिनाए जा रहे हैं। फायदे होंगे भी। जिन लोगों को स्वामित्व कार्ड मिलेगा उन लोगों के लिए जीवन भी आसान हो जाएगा, उन्हें हर जगह वंचित श्रेणी से बाहर रखने वालों पर लगाम लगेगी, सरकारी योजनाओं का लाभ भी आसानी से उठा सकते हैं। खासकर कर्ज के क्षेत्र मे लाभ की उम्मीद से इनकार नहीं कहा किया जा सकता है।

स्वामित्य योजना का एक खतरा भी है और इस खतरे पर केंद्र सरकार को ध्यान देना चाहिए। स्वामित्व योजना लाभ आतकवादी संगठन और विदेशी घुसपैठिए भी उठा सकते हैं। देश के अंदर में आतंकवादी संगठन जगह-जगह पर कब्जा कर बैठे है, खासकर सरकारी भूमि पर आतंकवादी मानसिकता के लोग अवैध कब्जा कर बैठे हुए हैं, इसके अलावा विदेशी घुसपैठिये भी सरकारी जमीन पर कब्जा कर बैठे हुए हैं। दिल्ली, मुबंई और अन्य सभी बडे शहरों के पास विदेशी घुसपैठिये कब्जा जमाये बैठे हैं। इनके पास अवैध तौर पर एक नागरिक के अवैध कागजात भी हैं। आतंकवादी संगठनों और विदेशी घुसपैठियों की मानसिकता इस योजना से पुष्ट न हों, यह व्यवस्था होनी चाहिए। इस संबंध में संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए। यह योजन गेम चेंजर तभी साबित होगी जब यह योजना ईमानदारी से भ्रष्टाचारमुक्त लागू होगी और इनकी सरकारी कार्यवाहियां आसान होंगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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