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जी-7 शिखर सम्मेलन : वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए क्यों है महत्वपूर्ण

सबसे पहले फ्रांस ने 1975 में अन्य विकसित देश- जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका के साथ जी-6 की स्थापना की थी। 1976 में इसमें कनाडा को शामिल कर लिया गया और मंच का नाम बदलकर जी-7 कर दिया गया।

जी-7 शिखर सम्मेलन : वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए क्यों है महत्वपूर्ण
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विकसित देशों के संगठन जी-7 के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रण निश्चित रूप से विश्व में भारत के बढ़ते कद का परिचायक है। यह दुनिया में भारत का प्रमुख आर्थिक शक्ति के तौर पर स्वीकृत होना भी दिखाता है। हाल के वर्षों में जिस तरह से वैश्विक मुद्दों पर एक तरफ जहां अमेरिका ने संरक्षणवादी रुख अपनाते हुए अपने हाथ खींचे, वहीं भारत विश्व समुदाय के साथ खड़ा दिखा। चाहे क्लाइमेट करार का मसला हो, सोलर एलायंस का मुद्दा हो, आतंकवाद के वैश्विक खतरे की बात हो या शांति सैनिक के रूप में भागीदारी की बात हो, भारत विश्व के साथ रहा।

संकट में फंसे दूसरे देशों की भी भारत ने अपने संसाधनों से मदद की। दूसरे देशों के लिए उपग्रह छोड़कर भी भारत ने विश्व में अपनी धाक जमाई है, इसलिए आज विश्व भारत की अहमियत को समझ रहा है। इस बार फ्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन हो रहा है।

हालांकि यह अब जी-8 हो गया है। सबसे पहले फ्रांस ने 1975 में अन्य विकसित देश- जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका के साथ जी-6 की स्थापना की थी। 1976 में इसमें कनाडा को शामिल कर लिया गया और मंच का नाम बदलकर जी-7 कर दिया गया।

1997 में इसमें रूस को भी शामिल किया गया और मंच का नाम जी-8 हो गया। हालांकि यह समूह जी-7 के नाम से ही प्रसिद्ध है। यह समूह विश्व की आठ उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधत्व करता है। इस समूह की आर्थिक शक्ति वैश्विक अर्थव्यवस्था की 62 फीसदी है।

विश्व के जीडीपी में इनका योगदान 50 फीसदी से अधिक है। क्रय शक्ति के आधार पर यह समूह ग्लोबल जीडीपी का 35 फीसदी से अधिक का प्रतिनिधत्व करता है। अच्छी बात यह है कि इस समूह के सभी सदस्य देशों से भारत के रिश्ते मजबूत हैं।

सम्मेलन के मेजबान फ्रांस ने भारत को न्योता दिया है, यह दोनों देशों के बीच बढ़ती करीबी को दर्शाता है। मोदी के पहले कार्यकाल में फ्रांस के साथ भारत के आर्थिक व कूटनीतिक रिश्ते मजबूत हुए हैं।

फ्रांस के साथ राफेल डील को लेकर भारत में जरूर राजनीति हुई व कांग्रेस ने जरूर इसे मुद्दा बनाया, भारत व फ्रांस की सरकारें इस डील को लेकर अडिग रहीं। अब फ्रांस भारत के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाना चाहता है और इसी का सबूत है कि उसने भारत को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है।

फ्रांस के साथ अपनी दोस्ती का भारत को अपने हित में लाभ उठाना चाहिए। खास कर रक्षा, रेल व अन्य अन्य क्षेत्र की उच्च तकनीक हासिल करने की दिशा में। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जी-7 की कनाडा में हुई बैठक को बीच में छोड़ वाशिंगटन लौट आए थे।

पर्यावरण व अन्य ग्लोबल संगठनों में आर्थिक सहयोग में कमी के अमेरिकी फैसले के विरोध के बाद ट्रंप ने बैठक छोड़ दी थी। रूस के साथ मतभेद भी एक वजह थी। उम्मीद है कि इस बार यह बैठक अपने मकसद में कामयाब होगी। भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विस्तार व सुधार की मांग करता रहा है।

जी-8 के सदस्य जापान व जर्मनी भी भारत के साथ स्थाई सदस्यता की मांग लंबे समय से कर रहे हैं। जी-8 देशों के साथ भारत की उपस्थति से संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्य की दावेदारी और मजबूत होगी। अब तक भारत जी़-20, जी-77, जी-4, ब्रिक्स, एससीओ, सार्क, बिम्सटेक आदि संगठनों में सदस्य है।

भारत, अमेरिका, जापान व आस्ट्रेलिया मिलकर एक ग्रुप बनाने पर विचार कर रहे हैं, जिसमें फ्रांस भी जुड़ने की इच्छा जताई है। विशेष अतिथि के रूप में जी-7 के साथ जुड़ाव होने से आर्थिक शक्ति के तौर पर भारत का वैश्विक महत्व और बढ़ेगा।

जी-7 सम्मेलन में चीन को अब तक आमंत्रित नहीं किया गया है। इससे भारत के महत्व को समझा जा सकता है। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को विकासशील से विकसित बनाने के लिए जी-8 देशों की उच्च तकनीक क्षमता का लाभ लेना चाहिए। ताकतवर समूह जी-7 से जुड़ने से वैश्विक मुद्दों पर भारत की आवाज और महत्वपूर्ण होगी।

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