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कठिन पनघट की डगर पर अकेले खड़े अखिलेश

आने वाले हफ़्तों में सपा के भीतर से और भी आवाजें उठेंगी और अखिलेश अपने को सवालों से घिरा हुआ पाएंगे।

कठिन पनघट की डगर पर अकेले खड़े अखिलेश
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भाजपा से मिली करारी हार के बाद अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रहीं हैं। समाजवादी पार्टी के पूरे जोशोखरोश और गठबंधन के साथ उतरने के बावजूद परिणाम ऐसे आये, जिसकी अपेक्षा उन्हें पटखनी देने वाले भाजपा तक को नहीं थी। अखिलेश का चुनावी नारा 'काम बोलता है' सलीके से अपना मुंह तक नहीं खोल पाया लेकिन पार्टी के भीतर नेता और कार्यकर्ता अब मुखर होकर पार्टी मुखिया के खिलाफ बोलने लगे हैं।
समाजवादी पार्टी के भीतर से ही बगावत की बू सामने आने लगी है। एक सपा नेता ने अखिलेश को लिखी चिट्ठी में उनपर तीखा हमला करते हुए लिखा है कि जब उनके पिता और चाचा को गालियां दी जा रहीं थीं तो वो मुस्कुरा रहे थे। सपा के पूर्व सदस्य प्रदेश कार्यकारिणी सुधीर सिंह की लिखी यह चिट्ठी एक हलकी सी झांकी भर है। आने वाले हफ़्तों में सपा के भीतर से और भी आवाजें उठेंगी और अखिलेश अपने को सवालों से घिरा हुआ पाएंगे।
यह सही है कि चुनाव से पहले अखिलेश और उनके काम की तारीफ़ हो रही थी। कोई भी राजनीतिक पंडित यह नहीं कह पा रहा था कि अखिलेश बिना चुनौती दिए मैदान से बाहर हो जाएंगे। यह कह देना भी जरूरी है कि कोई पत्रकार या सियासी पंडित भाजपा के इस कदर प्रचंड बहुमत की अपेक्षा भी नहीं कर रहा था, लेकिन चुनावी राजनीति के नियम और निर्णय कई बार ऐसे ही सामने आते हैं और पिछली तमाम समझदारियों को धता बता जाते हैं।
कांग्रेस से गठबंधन कर अखिलेश ने यह भी साबित करने की कोशिश की कि भाजपा को हराने के लिए वो अपना नुक्सान तक झेलने को तैयार हैं। हालांकि गठबंधन से पहले अखिलेश ने कहा कि अगर सपा और कांग्रेस साथ आ जाते हैं तो यह गठबंधन तीन सौ से भी अधिक सीटें जीतने में कामयाब रहेगा।
लेकिन हुआ इसके ठीक उलट! भाजपा तीन चौथाई से भी ज्यादा सीटें लाकर देश के सबसे बड़े सूबे में कायम हो गई। इस उलटफेर की पृष्ठभूमि में मुलायम और शिवपाल की नापसंदगी को याद करिए, जो उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन को लेकर ज़ाहिर की थी। इससे यह साबित हुआ कि अखिलेश में भले ही युवाओं वाली ऊर्जा और तकीनीकी हुनर हो, उनमे मुलायम जैसी सियासी समझ और शिवपाल जैसी सांगठनिक पकड़ नहीं है। संभव है कि उन्हें अब ये बात समझ में आ रही हो। सवाल यह भी उठाये जा रहे हैं कि क्या यह एक बार फिर से सपा के टूटने की शुरुआत होगी या गलतियों से सबक लेकर पार्टी 2019 के महासमर की तैयारी में जुट जाएगी।
बहरहाल, समाजवादी पार्टी ने इस हार की व्याख्या के लिए हर मंडल में बैठकें शुरू की हैं। इन्हीं बैठकों से 'ग्रासरूट लेवल' पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं का गुस्सा रिस-रिस कर बाहर आ रहा है लेकिन उम्मीद यह भी कि जानी चाहिए कि अखिलेश अपनी पार्टी भीतर पल रहे असंतोष को ना सिर्फ समझेंगे बल्कि उसे दुरुस्त करने का काम भी शुरू करेंगे। हालांकि उन्हें इस काम के लिए भी अपने पिता और चाचा की जरूरत होगी। उन्हें मुलायम के चार दशकों का राजनीतिक अनुभव और शिवपाल के सांगठनिक कौशल को मिलाकर एक ऐसा रास्ता तैयार करना होगा जहां ऐसी शिकस्त की गुंजाइश कम हो।

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