Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

अवधेश कुमार का लेख : भविष्य के दृश्यों का ट्रेलर

अमेरिका की राजनीति में ट्रंपवाद के एक नए दौर की शुरुआत हो गई है। एक ऐसे दौर की जिसमें एक नेता आने वाले समय में ऐसी राजनीति को अंजाम देगा जिसका हम आप पहले से अनुमान नहीं लगा सकते। इस तरह अमेरिकी संसद के घेराव को आप भविष्य की घटनाओं का ट्रेलर मान सकते हैं।

अवधेश कुमार का लेख : भविष्य के दृश्यों का ट्रेलर
X

डोनाल्ड ट्रंप

अवधेश कुमार

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में जो कुछ हुआ उसकी निंदा के साथ विरोध भी होना चाहिए और हो रहा है। वास्तव में इसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में घोषित चुनाव परिणामों को कोई राष्ट्रपति खारिज कर दे तो मानना पड़ेगा कि लोकतांत्रिक ढांचे में बहुत कुछ ऐसा हो गया है जिसे समझने में ज्यादातर नाकाम हैं। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि इतिहास राजधानी में हुए आज की हिंसक वारदात को याद रखेगा जो हमारे देश के लिए महान अपमान और शर्म की बात है। उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी इसे देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन कह दिया। इस तरह की प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक हैं। हालांकि अब ट्रंप ने कह दिया है कि जो बिडेन को सत्ता हस्तांतरित हो जाएगा, किंतु इससे यह नहीं मानना चाहिए कि ट्रंप और उनके समर्थकों ने गलती मान ली है। चुनाव में धांधली के बारे में अपने दावों को दोहराते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए यह हमारे संघर्ष की शुरुआत है। तो क्यों? आप दूसरे पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

ट्रंप समर्थकों में रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों की ही बड़ी संख्या है। रिपब्लिकन नेताओं में भी ऐसे हैं जो मानते हैं कि बिडेन की विजय धांधली के द्वारा हुई है। कैपिटल हिल में नीले कुर्ते और लाल टोपी लगाए इतने बड़े समूह को देखने के बावजूद अगर हम नहीं समझ रहे तो मान लीजिए आपने ट्रंप के आविर्भाव के साथ वहां की राजनीति तथा स्वयं रिपब्लिकन की वैचारिकता, व्यवहार तथा सदस्यों में आए बदलाव का गहराई से विश्लेषण नहीं किया है। नीला और लाल रिपब्लिकन पार्टी के झंडे का रंग है। यह सामान्य बात नहीं है कि लोग चुनाव में पराजित घोषित किए गए एक राष्ट्रपति को बनाए रखने के लिए इस सीमा तक जा रहे हैं। चुनाव परिणाम के बाद एक समाचार पत्र पॉलीटिको मॉर्निंग कंसल के सर्वे में बताया गया था कि निष्पक्ष चुनाव पर विश्वास न करने वाले रिपब्लिकन समर्थकों की संख्या चुनाव के दिन 35 प्रतिशत थी जो परिणाम के बाद 70 प्रतिशत हो गई। यह असाधारण स्थिति है।

अगर हम 3 नवंबर को हुए चुनाव के बाद से अब तक ट्रंप और उनके समर्थकों की गतिविधियों, उनके बयानों का सतही तौर पर भी विश्लेषण करें तो निष्कर्ष एक ही आएगा कि जो बिडेन के शपथ लेने के बावजूद वे हार नहीं मानेंगे। संसद का घेराव या हमले का मुख्य कारण यह था कि अमेरिकी संसद द्वारा जो बिडेन की जीत पर संवैधानिक मुहर लगनी थी, ट्रंप नहीं चाहते थे कि ऐसा हो पाए। हालांकि उनके समर्थकों के हिंसक विरोध के बावजूद संसद ने अपना काम किया और जो बिडेन निर्वाचित घोषित कर दिए गए। तत्काल उनके पास यही रास्ता था कि शपथ लेने दो। ट्रंप के बयानों को देखिए, उनके अब तक सामने आए चरित्र का विश्लेषण करिए। उनके कारण अमेरिका में आए वैचारिक बदलाव को पढ़िए तो आपको यह सब अजूबा नहीं लगेगा।

निस्संदेह, लोकतंत्र में विश्वास करने वाले ट्रंप और उनके समर्थकों की निंदा करेंगे। निंदा करते हुए हमें यह भी विचार करना होगा कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई है? अगर ट्रंप पूरी तरह गलत हैं तो इतनी भारी संख्या में लोग उनके लिए मरने-मारने तक पर क्यों उतारू हैं? वे क्यों चाहते हैं कि चाहे जो करना पड़े ट्रंप ही राष्ट्रपति रहें? वास्तव में ट्रंप ने चुनाव प्रचार से लेकर राष्ट्रपति के पूरे कार्यकाल में अपनी भूमिका से अमेरिका के राजनीतिक-सामाजिक मनोविज्ञान को व्यापक पैमाने पर बदल दिया है। अमेरिका फर्स्ट का नारा देते हुए उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही यह भावना पैदा की कि हमारे देश में नेताओं, पत्रकारों व बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग ऐसा है जो दुनिया में अपने को शांति का मसीहा, मानवाधिकारवादी आदि साबित करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाता है। उन्होंने जिस तरह मुखर होकर इस्लामिक आतंकवाद पर हमला बोला उसने अमेरिकी जनता को व्यापक पैमाने पर आकर्षित किया। इन सबसे रिपब्लिकन पार्टी ही नहीं, पूरी राजनीति और अमेरिकी समाज में जो आलोड़न हुआ, उन्हीं की परिणति चुनाव परिणामों के बाद से संसद पर हमले तक दिख रही है। आप ट्रप को पसंद करें या नापसंद उन्होंने 4 साल के कार्यकाल में अमेरिका को आर्थिक रूप से संभाला है, विदेश नीति को अमेरिकी हितों के अनुरूप पटरी पर लाया है, रक्षा ढांचे और नीतियों को पहले के कई राष्ट्रपतियों से बेहतर किया है तथा आंतरिक सुरक्षा को पहले से ज्यादा सशक्त किया है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश इजराइल के साथ संबंध विकसित करेंगे इसकी भी कल्पना नहीं की जा सकती थी। ट्रंप की कुशल विदेश नीति के कारण ही यह असंभव संभव हुआ। वे जिस ढंग से मुखर होकर अमेरिका विरोधी देशों पर हमला करते रहे, चीन को लगातार कटघरे में खड़ा किया, उस पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाए.. उन सबका व्यापक समर्थन अमेरिका में है। अगर कोरोना अमेरिका में भयावह रूप नहीं लेता तो ट्रंप को कोई पराजित नहीं कर सकता था, तो फिर?

तो अमेरिका की राजनीति में ट्रंपवाद के एक नए दौर की शुरुआत हो गई है। एक ऐसे दौर की जिसमें एक नेता आने वाले समय में ऐसी राजनीति को अंजाम देगा जिसका हम आप पहले से अनुमान नहीं लगा सकते। वह अमेरिकी शासन के उन कदमों का विरोध करेगा, अपने समर्थकों को उनके खिलाफ सड़क पर उतारेगा जो उसे स्वीकार नहीं होगा। इस तरह अमेरिकी संसद के घेराव को आप भविष्य की घटनाओं का ट्रेलर मान सकते हैं। ट्रंप निवर्तमान राष्ट्रपतियों के विपरीत राजनीति में सक्रिय रहेंगे और अगला चुनाव लड़ने की कोशिश करेंगे। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद पर आधारित अपने विचारों तथा भविष्य की नीतियों की घोषणाओं से समर्थकों का जितना व्यापक समूह खड़ा कर दिया है वह आसानी से लुप्त नहीं हो सकता। लंबे समय तक ट्रंपवाद अमेरिकी राजनीति में गूंजित होगा। इससे निपटने के लिए वहां प्रशासन को तो नए सिरे से तैयारी ही होगी, राजनीति को भी नए तरीके विकसित करने होंगे।

Next Story