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मेजर जनरल अश्वनी सिवाच का लेख: मित्रवत सुलझे भारत और चीन का विवाद

भारत नेपाल को दक्षिण एशिया में अपना सबसे भरोसेमंद पड़ोसी मानता है। दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्‍कृतिक सामाजिक संबंध प्राचीन काल से प्रगाढ़ रहे हैं। सीमा विवाद शांति से सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्‍तर की वार्ता होनी चाहिए। दोनों देशों को अपनी दोस्‍ती के ऐतिहासिक बंधन को ध्‍यान में रखते हुए प्राथमिकता के आधार पर सीमा विवाद का हल करना चाहिए। इसमें इस बात का ख्‍याल रखा जाना चाहिए कि दोनों पक्ष संतुष्‍ट हों।

मेजर जनरल अश्वनी सिवाच का लेख: मित्रवत सुलझे भारत और चीन का विवाद

रणनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण और चीन की सीमा से सटे 17,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपूलेख दर्रे तक उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले स्थित तवाघाट-धारचूला से 80 किलोमीटर सड़क का उद्घाटन 7 मई को केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के माध्यम से किया था। इस सड़क से तिब्बत में कैलाश-मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्री अब तीन सप्ताह के स्थान पर एक सप्ताह में यात्रा पूरी कर सकेंगे। यह तीर्थ लिपूलेख दर्रे से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर है। भारत ने इस सड़क का निर्माण यात्रियों, स्थानीय लोगों, व्यापारियों व सैन्‍य जरूरतों की सहूलियत के लिए किया है। पहले केवल तवाघाट तक ही सड़क थी, जो धरचूला से 15 किलोमीटर पहले है। उस वक्‍त काली नदी के पश्चिम स्थित लिपुलेख दर्रे तक पैदल या खच्‍चर से ही जाया जा सकता था। रास्‍ता बहुत कठिन था। तीर्थयात्रियों को बहुत कष्‍ट उठाना पड़ता था। लिपुलेख से आगे चीन की सीमा में कैलाश मानसरोवर तक मोटे तौर पर कच्‍चे-पक्‍के रास्‍ते बने हुए थे। अभी तवाघाट से लिपुलेख तक पक्‍की सड़क उसी रास्‍ते पर बनी है, जो पहले से तीर्थयात्रा के लिए इस्‍तेमाल होते रहे हैं।

इस सड़क को सीमा सड़क संगठन ने बनाया है, इसे पांच साल में 2013 में ही पूरा किया जाना था, लेकिन 6000 फीट से 17000 फीट की उंचाई पर दुरुह निर्माण कार्य होने के चलते इसका निर्माण बहुत धीमी गति से चल रहा था। 2019 से भारी मशीनरी व सामान पहुंचाने में चिनूक हेलीकॉप्‍टर की मदद ली गई, जिससे सड़क निर्माण में तेजी आई। यह सड़क न केवल कैलाश मानसरोवर तक तीर्थयात्री, पर्यटन व ट्रेड के लिए अहम है, बल्कि रणनीतिक रूप से चीन सीमा तक सैन्‍य साजो सामान व जवानों को कम समय में पहुंचाने की दृष्टि से भी महत्‍वपूर्ण है। अब नेपाल ने धारचूला से लिपुलेख तक की सड़क पर आपत्ति जताई है। नेपाल कहना है कि यह क्षेत्र उसके भूभाग में है। हो सकता है की नेपाल का यह विरोध चीन के इशारे पर हो और अपने घरेलू नागरिकों के उग्र राष्‍ट्रवाद की तुष्टि के लिए हो। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने कहा है की तिब्बत, चीन और भारत से सटे कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा को किसी भी कीमत पर वापस लाया जाएगा। नेपाल ने लिपूलेख दर्रे को उत्तराखंड के धारचूला से जोड़ने वाली रणनीति दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण सर्कुलर लिंक रोड का भारत द्वारा उद्घाटन किए जाने पर सवाल उठाया। नेपाल ने कहा ्की यह एकतरफा कदम दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दों को सुलझाने के लिए बनी सहमति के खिलाफ है। दरअसल जब-जब नेपाल में कम्‍युनिस्‍ट दलों की सरकार रही है, उसका रुख भारत से दूरी का रहा है। यह जानते हुए कि नेपाल के अनेक क्षेत्र सामरिक रूप से भारत के लिए अहम है, इसके बादवूद कम्‍युनिस्‍ट सरकार ने चीन की पहुंच आसान की है। नेपाल ने आनन-फानन में अपना राजनीतिक नक्‍शा जारी कर दिया, जिसमें उसने सुगौली संधि से पहले ही भारतीय क्षेत्र रहे कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा को अपने भूभाग में दिखा दिया है। नेपाल ने भारत पर यह आरोप भी लगाया है कि भारत सरकार ने पिछले वर्ष गुप्‍त तरीके से नेपाली क्षेत्र को अपने राजनीतिक नक्‍शे में दिखाया है।

जबकि भारत ने नेपाल की आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि ये तीनों क्षेत्र पूरी तरह भारतीय सीमा के भीतर हैं। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में उद्घाटित सड़क मार्ग पूरी तरह भारतीय सीमा में है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत ने कालापानी, लिपुलेख इलाके में कुछ भी नया निर्माण नहीं किया है। नेपाल ने इससे पहले कभी इस मार्ग पर सवाल नहीं उठाया था। वर्षों से भारत इस मार्ग का इस्‍तेमाल कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रा के लिए करता रहा है। अब जब सड़क का उद्घाटन किया गया है तो नेपाल की आपत्ति चीनी दबाव में उठाई गई लगती है और नेपाल की सत्‍ताधारी कम्‍युनस्टि पार्टी के अंदर चल रहे विरोध के स्‍वर को दबाने के लिए राष्‍ट्रवाद की तरफ ध्‍यान भटकाने की मंशा है। भारत सरकार ने राजनीतिक नक्‍शा पिछले साल इसलिए जारी किया था कि भारत ने जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 व धारा 35ए के अधिकांश प्रावधानों को खत्‍म किया था और जम्‍मू-कश्‍मीर का प्रशासनिक दर्जा बदलते हुए इसे पूर्ण राज्‍य से दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्‍मू-कश्‍मीर व लद्दाख में विभाजित किया था। भारत ने अपने इस राजनीतिक नक्‍शे में नेपाल सीमा से लगते किसी क्षेत्र की स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया था।

भारत ने दो टूक कहा है कि ऐतिहासिक तथ्‍यों की दृष्टि से नेपाल का भारतीय क्षेत्र पर दावा कहीं नहीं ठहरता है और नई दिल्‍ली ने नेपाल सरकार को सलाह दी है कि वह भारत की भौगोलिक संप्रभुता का सम्‍मान करे। पूर्व में भारत और नेपाल ने अपने सीमा विवादों का निपटारा मित्रतावत व शांतिपूर्ण माहौल में किया है। सुगौली संधि इसका प्रमाण है। दोनों देश काली नदी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा के अपने भूभाग में होने का दावा कर रहे हैं। नेपाल कहता है कि ये तीनों क्षेत्र उसके धारचूला जिले में हैं और इसका उसके पास ऐतिहासिक 1816 की सुगौली संधि का प्रमाण है, जिसमें इन क्षेत्रों के बारे में ब्रिटिश भारत व नेपाल के बीच समझौता हुआ था जबकि भारत का कहना है कि लिपुलेख भारत, नेपाल व चीन की त्रिकोणीय सीमा के मिलन बिंदु पर स्थित भूभाग है और सड़क काली नदी के पश्चिम में है, जो कि उत्‍तराखंड के पिथैरागढ़ जिले में है। भारत नेपाल को दक्षिण एशिया में अपना सबसे भरोसेमंद पड़ोसी मानता है। दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्‍कृतिक सामाजिक संबंध प्राचीन काल से प्रगाढ़ रहे हैं। भारत के विभिन्‍न रेजिमेंट में हर वक्‍त 15000 गोरखा सैनिक सेवारत रहते हैं, जो कि भारतीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील मुद्दा है। ये गोरखा नेपाल के नागरिक होते हैं व सुगौली संधि‍ के वक्‍त से वे भारतीय सेना में सेवा देते रहे हैं। भारत व नेपाल के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए कूटनीतिक व राजनीतिक रूप से वर्षों से स्‍थापित प्रोटोकॉल व मैकेनिज्‍म हैं। इसलिए दोनों दोस्‍त मुल्‍कों के बीच रिश्‍ते में किसी भी कारण से खटास नहीं आनी चाहिए। सीमा विवाद शांति से सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्‍तर की वार्ता पहले ही होनी चाहिए थी। इस वार्ता में आपसी मसलों के सभी पहलुओं पर बराबरी, परस्‍पर सम्‍मान व मित्रवत भाव से विचार किया जाना चाहिए था। लेकिन अब भी देर नहीं हुई है। दोनों देशों को अपनी दोस्‍ती के ऐतिहासिक बंधन को ध्‍यान में रखते हुए प्राथमिकता के आधार पर सीमा विवाद का हल करना चाहिए। इसमें इस बात का ख्‍याल रखा जाना चाहिए कि दोनों पक्ष संतुष्‍ट हों। उम्‍मीद है कि भारम व नेपाल किसी बाहरी दबाव में अपनी प्रगाढ़ दोस्‍ती पर आंच नहीं आने देंगे और नेपाल सामरिक व राजनीतिक रूप से अपने चिर पड़ोसी भारत के महत्‍व को समझेगा।

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