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कटघरे में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह

डॉ. मनमोहन सिंह की साफ और ईमानदार छवि रही है, लेकिन जिस समय देश में 1.86 लाख करोड़ रुपये का कोयला घोटाला हुआ था उस समय डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

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ऐतिहासिक कोयला खदान आवंटन घोटाले में आखिरकार पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी अभियुक्त बनाते हुए विशेष अदालत ने समन जारी किया है, लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि कांग्रेस के नेता अब भी निचली अदालत और ऊंची अदालतों की बातें करके मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

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डॉ. मनमोहन सिंह की साफ और ईमानदार छवि रही है, लेकिन जिस समय देश में 1.86 लाख करोड़ रुपये (कैग ने यह अनुमान लगाया था) का कोयला घोटाला हुआ था उस समय डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

प्रधानमंत्री पद की गरिमा को देखते हुए इस पर बैठे व्यक्ति से अतिरिक्त सतर्कता की उम्मीद देश करता है। दरअसल, मौजूदा मामला वर्ष 2005 में कुमार मंगलम बिड़ला की कंपनी हिंडाल्को को ओडिशा के तालाबीरा में कोयला ब्लॉक आवंटित किए जाने संबंधी है। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह के पास कोयला मंत्रालय का भी प्रभार था।

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आरोप है कि यह कोयला खदान पहले एक सरकारी कंपनी को दिया गया था, लेकिन बिड़ला द्वारा बारी-बारी से पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात किए जाने के बाद वह खदान हिंडाल्को को दे दिया गया था। इसकी सिफारिश पीसी पारेख ने की थी, जिसका अनुमोदन डॉ. मनमोहन सिंह ने किया। आरोप है कि नियम कायदों को ताक पर रख हिंडाल्को के हित में फैसला लिया गया। ऐसे में आरोपों के दायरे में उनका नाम आना स्वाभाविक है, परंतु इस घोटाले में उनका नाम नहीं आने देने के लिए कांग्रेस की तरफ से हरसंभव कोशिश की गई थी।

कोयला आवंटन से संबंधित सौ से अधिक अहम फाइलों की मंत्रालय से चोरी का मामला सामने आया। वहीं मामले को बंद करने के लिए सीबीआई पर दबाव बनाया गया, लेकिन विशेष अदालत ने इस मामले में उसकी क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि जांच के दौरान मिले सबूत उन पर आरोपों की पुष्टि नहीं करते। अदालत ने सीबीआई को डॉ. मनमोहन सिंह के बयान दर्ज करने का निर्देश दिया था।

जाहिर है, घोटाले की पूरी तस्वीर साफ करने के लिए ऐसा करना जरूरी भी था। हालांकि सिर्फ समन जारी होने से ही उन्हें दोषी नहीं मान लिया जाना चाहिए। दरअसल, इससे कोयला घोटाले का पूरा सच देश के सामने लाने में कोर्ट को आसानी होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वर्ष1993-2010 के बीच आवंटित सभी 204 कोयला खदानों को रद्द कर दिया था। और केंद्र सरकार को पारदर्शी तरीके से नए सिरे से खदानों को आवंटित करने का निर्देश दिया था। अब मोदी सरकार कोयला खदानों का आवंटन ई-नीलामी के जरिए कर रही है।

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पहले चरण में 32 खदानों की नीलामी में ही सरकार को एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व मिल चुका है। इससे साफ है कि कैग ने रिकॉर्ड घोटाला होने का अनुमान ऐसे ही नहीं लगाया था। जो कपिल सिब्बल कोयला खदान आवंटन में जीरो लोस की थ्योरी चला रहे थे, वे अब चुप्पी साधे हुए हैं। उनकी दलील गलत हो चुकी है। अभी दूसरे दौर की नीलामी होनी शेष है। तब राजस्व कैग द्वारा अनुमानित राशि से कहीं ज्यादा आगे निकल जाएगा। कहा जा सकता है कि कांग्रेस के सभी पाप रह रहकर सामने आ रहे हैं।

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