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प्रभात कुमार रॉय का लेख : कसौटी पर खरी उतरी विदेश नीति

भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति वस्तुतः समय की कसौटी पर एकदम खरी उतरी है। चीन और पाक के संयुक्त मोर्चे के विरुद्ध पश्चिमी देशों और पूरबी देशों के जबरदस्त समर्थन की भारत को प्रबल आवश्यकता है। पश्चिम देशों में सबसे प्रबल शक्ति अमेरिका है और पूरब देशों में रूस और जापान प्रबल शक्ति हैं। दुनिया के पटल पर पाक को अब केवल चीन और टर्की की हिमायत हासिल रह गई है। यहां तक कि मलेशिया ने भी पाकिस्तान का साथ छोड़ दिया है। इस्लामिक देशों का संगठन भी पाकिस्तान से दामन छुड़ा चुका है। विश्व पटल पर पाक को अलग-थलग करने में भारतीय विदेश नीति अत्यंत कामयाब सिद्ध हो रही है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

प्रभात कुमार रॉय

वर्ष 2020 पर एक विहंगम दृष्टिपात करें तो अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नजरिए से यह वर्ष वस्तुतः भारतीय विदेश नीति के लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण रहा है। चीन से साथ भारत के कूटनीतिक संबध में अत्यंत कटुता आ गई। लद्दाख की गलवान घाटी और पैंगोंग झील के इलाके से आरंभ हुआ सैन्य तनाव रक्तरंजित सैन्य झड़प में परिवर्तित हो गया और शनैः शनैः 3500 किलोमीटर लंबी संपूर्ण भारत-चीन सरहद (एलएसी) पर फैल गया है। भारत और चीन के मध्य सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं के अभी तक नौ दौर हो चुके हैं, किंतु सरहद पर सैन्य तनाव में किंचित मात्र भी शिथिलता नहीं आ सकी है। स्टिंग ऑफ पर्ल्स कूटनीति के तहत चीन भारत को चारों तरफ से घेर लेने की कुटिल रणनीति को अंजाम दे रहा है।

नेपाल सदियों से भारत का परम मित्र देश रहा, नेपाल भी चीन द्वारा संचालित स्टिंग ऑफ पर्ल्स कूटनीति का शिकार बना है। भारत के साथ भाई सरीखे देश नेपाल के साथ रिश्तों में कुछ कटुता आ गई है। भारतीय विदेश नीति की नाकामी ही निरूपित की जा सकती है कि नेपाल अब तो चीन के पक्ष में खड़ा हुआ दिखाई देता है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने लुक टुवर्ड ईस्ट की विदेश नीति के तहत भारत द्वारा पूरब के देशों के संबंध प्रगाढ़ बनाने पर जोर दिया था। नरेंद्र मोदी हुकूमत ने फिर से लुक टुवर्ड ईस्ट की कूटनीति पर अमल किया। अत्यंत कामयाबी के साथ जापान और भारत के मध्य निकटता स्थापित हो गई है और दक्षिण चीन सागर और हिंद-प्रशांत महासागर में चीन को प्रबल चुनौती देने के लिए भारत और जापान द्वारा क्वाडिलेटरल स्ट्रैटेजिक डॉयलॉग (क्वाड) को पुनर्जीवित किया गया, जिसमें अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और भारत सक्रिय हुए। भारत के निमंत्रण पर रूस द्वारा क्वाड में शामिल होने स्पष्ट इनकार कर दिया गया और क्वाड को चीन के विरुद्ध अमेरिका और पश्चिमी देशों की पहल पर कायम किया गया, एक रणनीतिक मोर्चा करार दिया गया। क्वाड के कारण भारत और रशिया के मध्य एक कूटनीतिक तक़रार का खतरा उत्पन्न हो गया है।

वर्ष 2020 में भारत के लिए अहम चुनौती उत्पन्न हुई है कि वह रूस के साथ अपनी भरोसेमंद दोस्ती में किंचित दरार नहीं आने देगा, क्योंकि वक्त की प्रत्येक कसौटी पर भारत और रुस की दोस्ती बेहद खरी सिद्ध हो चुकी है। पश्चिम की तरफ अधिक कूटनीतिक झुकाव हो जाने से भारत का परम्परागत कूटनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। वस्तुतः प्रधानमंत्री द्वारा अमेरिका के चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप का खुला समर्थन करना, यकीनन भारत के लिए एक कूटनीतिक गलती सिद्ध हुई है। ऐसा प्रतीत हुआ कि भारत द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप की कुटिल नीतियों का अंधसमर्थन किया गया है। क्रिमिया जंग के तत्पश्चात अमेरिका और यूरोप के पश्चिम के देश वस्तुतः रूस के शत्रु देश बन चुके हैं। विश्व एक दफ़ा फिर से दो बड़े शक्तिशाली गुटों में विभाजित होता हुआ नज़र आ रहा है। शीतयुद्ध की कटु स्मृतियां अभी दुनिया के जेहन में बाकायदा विद्यमान हैं। वर्ष 1991 में सोवियत रूस के पराभव के पश्चात शीतयुद्ध का समापन हुआ और विश्व एक ध्रुवीय बन गया, जिसका केंद्र अमेरिका बना। विश्वपटल पर चीन के एक ताकतवर शक्ति के तौर पर उभर कर आने के बाद और क्रिमिया जंग के दौर में स्थापित हुई रूस और चीन की प्रगाढ़ दोस्ती ने विश्व को दो बड़े गुटों के मध्य विभाजित करके रख दिया है। एक तरफ हैं अमेरिका और यूरोप के नाटो राष्ट्र और दूसरी तरफ हैं चीन और रूस। भारत द्वारा शीत युद्ध के दौर में अत्यंत कामयाबी के साथ गुटनिरपेक्ष विदेश नीति का अनुसरण किया गया।

1962 के भारत-चीन युद्ध के दौर में सोवियत रूस और अमेरिका भारत के पक्ष में खुलकर खड़े हो गए थे। भारत-पाक के मध्य लड़े गए चार बड़े युद्धों को दौरान सोवियत रूस तो सदैव ही भारत के पक्ष में खुलकर खड़ा हुआ और अमेरिका भी कभी पाकिस्तान का साथ देने के लिए मैदान-ए-जंग में कदापि नहीं उतरा। भारत की गुटनिरपेक्ष नीति की शानदार कामयाबी रही कि शीत युद्ध के दौर में अमेरिका की कयादत में नाटो राष्ट्रों और सोवियत रूस के नेतृत्व में वारसा संधि के कम्युनिस्ट देशों का भारत के साथ मित्रतापूर्ण संबंध कायम बना रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इतिहास अब स्वयं को दोहरा रहा और शीतयुद्ध के तनावपूर्ण तल्ख दौर का फिर से आग़ाज हो चुका है। भारत को चीन और पाकिस्तान द्वारा संयुक्त तौर पर पेश की जा रही प्रबल सैन्य चुनौतियों का सामना करना है। ऐसे विकट दौर में बहुत संभलकर गहन गंभीर कूटनीतिक कौशल के साथ भारत को अपनी विदेश नीति को अंजाम देना होगा। भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति वस्तुतः समय की कसौटी पर एकदम खरी उतरी है। चीन और पाकिस्तान के संयुक्त मोर्चे के विरुद्ध पश्चिमी देशों और पूरबी देशों के जबरदस्त समर्थन की भारत को प्रबल आवश्यकता है। पश्चिम देशों में सबसे प्रबल शक्ति अमेरिका है और पूरब देशों में रूस और जापान प्रबल शक्ति हैं। दुनिया के पटल पर पाकिस्तान को अब केवल चीन और टर्की की हिमायत हासिल रह गई है। यहां तक कि मलेशिया ने भी पाकिस्तान का साथ छोड़ दिया है। सऊदी अरब की कयादत में इस्लामिक देशों का संगठन (ओआईसी) भी पाकिस्तान से अपना दामन छुड़ा चुका है। विश्वपटल पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने में भारतीय विदेश नीति अत्यंत कामयाब सिद्ध हो रही है। ग्रे लिस्ट में पड़े हुए पाकिस्तान के सिर पर फाईनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) द्वारा ब्लैक लिस्ट में डालने खतरा निरंतर मंडरा रहा है। जेहादी आतंकवाद के दुर्ग बने हुए पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बचाने में चीन एकदम विफल साबित हुआ है।

भारत को 21वीं सदी के शीतयुद्ध में एक गुटनिरपेक्ष और अत्यंत संतुलित कूटनीति को बड़ी कुशलता के साथ अंजाम देना होगा, जिससे कि रूस सरीखे आजमए हुए मित्र देश को भी चीन की कुटिल कूटनीति कहीं हमारा शत्रु देश न बना दे। अमेरिका और पश्चिमी देशों से दोस्ताना संबंध भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए परम आवश्यक है, किंतु अमेरिका के किसी सैन्य गुट शामिल होने का सीधा अर्थ होगा कि रूस हमारा साथ छोड़कर पूरी तरह से चीन का पक्षधर बन जाएगा। यह स्थिति भारत के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने में रूस हमारी कूटनीतिक मदद कर सकता है, बशर्ते उसे यकीन हो कि भारत की विदेश नीति में अमेरिका का स्थान सर्वोपरि न हो जाए, जैसा कि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में दृष्टिगोचर हुआ।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।

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