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राजकोषीय प्रोत्साहन जरूरी

हम आशा करें कि कोरोना प्रकोप की वजह से निर्मित हुई आर्थिक और वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहे देश के करोड़ों लोगों और उद्योग कारोबार को आर्थिक राहत देने तथा रोजगार के तेजी से कम होते हुए मौकों को बचाने के लिए सरकार राजकोषीय प्रोत्साहन की उपयुक्त नीति पर आगे बढ़ेगी। राजकोषीय प्रोत्साहन की ऐसी नीति ही यह निर्धारित करेगी कि भारत कितनी जल्दी कोरोना की चुनौतियों को रोकने में कामयाब होगा और कितनी जल्दी अर्थव्यवस्था पटरी पर आती दिखेगी।

डॉ. जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा लॉकडाउन और कोरोना प्रकोप की चुनौतियों से निपटने के परिप्रेक्ष्य में राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंस आयोजित की गई| इसमें कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने राजकोषीय घाटे के आकार में उपयुक्त वृद्धि करने की अपील की| कहा गया कि राजकोषीय दायित्व एवं प्रबंधन कानून के प्रावधानों में ढील दी जानी चाहिए। कहा गया कि नए वित्तीय वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी के 3.5 प्रतिशत निर्धारित है, इसे बढ़ाकर 4 प्रतिशत किया जाना उपयुक्त होगा। कहा गया कि वर्ष 2009-10 में वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान भी इसे बढ़ाकर 4 फीसदी किया गया था।

जहां देश के विभिन्न मुख्यमंत्रियों ने सरकार से व्यापक राजकोषीय प्रोत्साहन की मांग की है वहीं भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के द्वारा उद्योग कारोबार से संबंधित करीब 200 सीईओ के बीच किए गए जिस ऑनलाइन सर्वे का प्रकाशन 5 अप्रैल को किया गया है, उसमें उद्योग कारोबार को बचाने के लिए सरकार से राजकोषीय प्रोत्साहन के व्यापक पैकेज की जरूरत बताई गई है। वास्तव में सरकार ने अभी जो राहत दी है वह सराहनीय है लेकिन उद्योग कारोबार तथा कृषि व सर्विस सेक्टर में रोजगार बचाने के लिए वित्त मंत्री को और अधिक खुले हाथों से राहत देनी होगी।

नि:संदेह देश में लॉकडाउन के कारण व्यावसायिक और वित्तीय गतिविधियों से चमकने वाले केंद्रों में निराशा का सन्नाटा दिखाई दे रहा है। ऐसे में दुनिया की प्रसिद्ध ब्रिटिश ब्रोकरेज फर्म बार्कलेज ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोरोना प्रकोप से वर्ष 2020 में भारत की अर्थव्यवस्था को करीब नौ लाख करोड़ रुपये नुकसान होगा|यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि लॉकडाउन ने देश के उद्योग-कारोबार को सबसे अधिक प्रभावित किया है। देश में सबसे अधिक रोजगार सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के द्वारा दिया जाता है, देश के करीब साढ़े सात करोड़ ऐसे छोटे उद्योगों में करीब 18 करोड़ लोगों को नौकरी मिली हुई है। लॉकडाउन के कारण उद्योग-कारोबार के ठप होने के कारण देश के कोने-कोने में दैनिक मजदूरी करने वालों को काम की मुश्किलें बढ़ गई हैं। देश के कुल कार्यबल में गैर संगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी 90 फीसदी है। साथ ही देश के कुल कार्यबल में 20 फीसदी लोग रोजाना मजदूरी प्राप्त करने वाले हैं। इस कारण देश में रोजगार संबंधी चिंताएं और अधिक उभरकर दिखाई दे रही हैं। निश्चित रूप से लॉकडाउन देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है| यदि हम अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव का अध्ययन करें तो पाते हैं कि पिछले मार्च महीने में देश में वाहनों की बिक्री में 50 फीसदी की कमी आई। जीएसटी की प्राप्ति में 20 फ़ीसदी की गिरावट आई। पेट्रोल और डीजल की खपत में 20 प्रतिशत की कमी आई। बिजली खपत में 30 प्रतिशत की कमी आई। साफ दिखाई दे रहा है कि लॉकडाउन के कम होने के बाद भी संकुचित हुई अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ने में एक वर्ष का समय भी लग सकता है| बंद पड़ी कंपनियों को दोबारा काम शुरू करने में समय लगेगा। उद्योग कारोबार के अनुकूल वातावरण के लिए भी लंबा समय लगेगा। रोजगार खोने वाले लोगों के परिवारों की क्रय शक्ति बढ़ने में समय लगेगा। निवेश को बढ़ाने में भी समय लगेगा। बैंकों के ऋण वितरण में रुकावटें दूर करने और बैंकों की सामान्य कार्यप्रणाली बहाल करने में भी बड़ा समय लगेगा। इन सब के कारण वित्त वर्ष 2020-21 में कई उद्योग कारोबार और बड़ी कंपनियां यह अनुभव करते हुए दिखाई देंगे कि यह उनके लिए एक खोया हुआ वर्ष बनकर रह गया है।

नि:संदेह देशव्यापी लॉकडाउन के बीच उद्योग और कारोबार क्षेत्र में हाहाकार मच गया है। वर्ष 2020 में सरकार की आमदनी में कमी के कारण राजस्व के आंकड़े कमजोर पढ़ते दिखाई देंगे और साथ ही कोरोना प्रकोप से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर खर्चों के कारण राजकोषीय तनाव बढ़ेगा| यह तनाव इतना अधिक होगा कि हम तीन दशक पुरानी राजकोषीय संकट की स्थिति में पहुंचते हुए दिखाई देंगे। अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न राजकोषीय और मौद्रिक नीति का समर्थन प्रदान किया जाना जरूरी होगा| सचमुच यह समय राजकोषीय अनुशासन की चिंता करने का नहीं है। दुनिया के कई देश अपनी-अपनी जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर राजकोषीय सहयोग के पैकेज देते दिखाई दे रहे हैं, जबकि अभी तक हमारे देश में राहत पैकेजों का आकार बहुत कम 5 प्रतिशत के करीब दिखाई दे रहा है। ऐसे में देश में छोटे उद्योग कारोबार कृषि क्षेत्र और सर्विस सेक्टर को चुनौतियों से राहत देने तथा देश में रोजगार को बचाने और रोजगार को बढ़ावा देने के लिए सरकार से साहसिक कदम उठाने की अपेक्षा की जा रही है। देश की अर्थव्यवस्था पर कोरोना के आर्थिक प्रभाव और देश के करोड़ों लोगों के लिए राहत की जरूरतों के मद्देनजर देश-दुनिया के अर्थ विशेषज्ञों ने राजकोषीय प्रोत्साहन बढ़ाए जाने की सिफारिश की है। यद्यपि कोरोना का प्रभाव मार्च 2020 से दिखाई दे रहा है, लेकिन पिछले वर्ष 2019 में भी देश में आर्थिक सुस्ती का माहौल रहा है| ऐसे में 2020 की शुरुआत से ही दुनिया के आर्थिक संगठन भारत में आर्थिक सुस्ती को रोकने और अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए बार-बार राजकोषीय प्रोत्साहन की रिपोर्ट देते रहे हैं|

संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा प्रकाशित विश्व की आर्थिक स्थिति और संभावना रिपोर्ट 2020 में कहा जा चुका है कि भारत में राजकोषीय प्रोत्साहन की जरूरत है| ऐसे में अब जब कोरोना वायरस भारतीय अर्थव्यवस्था को बुरी तरह क्षतिग्रस्त करते हुए दिखाई दे रहा है तब राजकोषीय अनुशासन को कुछ दरकिनार करते हुए राजकोषीय खर्च बढ़ाना समय की जरूरत है।

हम आशा करें कि कोरोना प्रकोप की वजह से निर्मित हुई आर्थिक और वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहे देश के करोड़ों लोगों और उद्योग कारोबार को आर्थिक राहत देने तथा रोजगार के तेजी से कम होते हुए मौकों को बचाने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण राजकोषीय प्रोत्साहन की डगर पर साहसिक कदमों के साथ आगे बढ़ेंगी। सरकार राजकोषीय प्रोत्साहन की उपयुक्त नीति पर आगे बढ़ेगी। राजकोषीय प्रोत्साहन की ऐसी नीति ही यह निर्धारित करेगी कि भारत कितनी जल्दी कोरोना प्रकोप की चुनौतियों को रोकने में कामयाब होगा और कितनी जल्दी भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर आते हुए दिखाई देगी।

हम आशा करें कि वित्त मंत्री ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में जो राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 प्रतिशत निर्धारित किया है, उसे वे विस्तारित करके 4 प्रतिशत तक ले जाने में पीछे नहीं हटेंगी। ऐसा किए जाने पर ही देश इस वर्ष 2020 के अंत में इतिहास की सबसे बुरी आर्थिक, सामाजिक और मानवीय त्रासदी से बाहर आते हुए दिखाई दे सकेगा।

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