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आर्थिक आजादी के लिए वित्तीय समावेशन जरूरी

उन्होंने गरीबों को बिना गारंटी कर्ज देकर बैंकिंग क्रांति का सूत्रपात किया, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला। भारतीय बैंकों को भी उनसे सीखने की जरूरत है।

आर्थिक आजादी के लिए वित्तीय समावेशन जरूरी

आजादी के छह दशक पूरे होने के बाद भी देश की एक बड़ी आबादी का बैंकिंग जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर से बाहर रहना ही कई आर्थिक-सामाजिक समस्याओं की वजह है। देश का केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया को अपनी स्थापना के 80 साल पूरे होने पर यह पड़ताल करनी चाहिए कि आखिर इसमें कहां कमी रह गई? इस मौके पर आयोजित देश में वित्तीय समावेशन कार्यक्रम के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह सुझाव बेहद अहम है कि आने वाले बीस वर्षों में, यानी 2035 तक जब आरबीआई सौ साल का हो जाएगा, उसे सुनिश्चित करना चाहिए कि देश का हर परिवार बैंकिंग सेक्टर से जुड़ जाए, क्योंकि इसके बिना गरीबों-वंचितों का आर्थिक सशक्तिकरण और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का सपना दूर की कौड़ी है।

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प्रधानमंत्री जनधन योजना की सफलता ने दिखा दिया हैकि यह काम ज्यादा मुश्किल नहीं है। एक साल के अंदर ही केंद्र सरकार, आरबीआई और वाणिज्यिक बैंकों के सहयोग से देश में चौदह करोड़ नए बैंक खाते खुल गए हैं। यही नहीं जीरो बैलेंस के खातों में लोगों ने 14 हजार करोड़ रुपए जमा भी करा दिए हैं। किसी भी देश के विकास में बैंक का अहम योगदान होता है।

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देश में 1969 में बैंकों का राष्ट्रीय करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि ये ज्यादा कारगर तरीके से ग्रामीणों, गरीबों, किसानों, युवाओं, महिलाओं, मजदूरों की वित्तीय जरूरतों को ऋण के जरिए पूरा करेंगे और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में मददगार साबित होेंगे। आज देश का आम शहरी, पढ़ा-लिखा वर्ग व उद्योग जगत इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं, लेकिन एक बड़ा वर्ग जानकारी के अभावों में बैंकिंग सेक्टर से नहीं जुड़ पाया है और इसके विभिन्न फायदों से वंचित रह गया है।

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हालांकि उनमें जागरूकता की कमी भी इसकी एक वजह है, लेकिन ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में बैंकिंग सेवा की अनुपस्थिति तथा बैंकरों के मन में गरीबों-वंचितों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण भी इसका एक कारण है। इसलिए प्रधानमंत्री की सार्वजनिक मंच से उनको यह नसीहत महत्वपूर्ण है कि गरीबों के प्रति सामूहिक नजरिया बदलने की जरूरत है, क्योंकि यह नजरिया वित्तीय समावेशन के लक्ष्य में बाधक है। दुनिया के किसी भी देश के लिए वित्तीय समावेशन बांग्लादेश के मोहम्मद यूनुस का ग्रामीण बैंक बेहतरीन नजीर है।

उन्होंने गरीबों को बिना गारंटी कर्ज देकर बैंकिंग क्रांति का सूत्रपात किया, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला। भारतीय बैंकों को भी उनसे सीखने की जरूरत है। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां बैंकों की कम मौजूदगी है और वे पिछड़ गए हैं। बैंकों को बडे किसानों के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा छोटे किसानों को कर्ज देना चाहिए, क्योंकि इसके अभाव में वे साहूकारों के जाल में फंस जाते हैं। और जब निकल नहीं पाते तो जान देने पर विवश हो जाते हैं।

वहीं आज शिक्षा के क्षेत्र को बढ़ावा देने में बैंकों की अहम भूमिका हो सकती है। बैंकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश का कोई भी युवा पैसे के अभाव में ज्ञान व शिक्षा के क्षेत्र में पीछे नहीं रहे। बैंक लघु व कुटीर धंधों व नए उद्यमियों को ज्यादा कर्ज देकर रोजगार और उत्पादन में कई गुना बढ़ोतरी कर सकते हैं। बैंक यदि प्रधानमंत्री के सुझावों को अमल में लाते हैं तो सबका साथ सबका विकास की भावना सार्थक होगी और देश में एक पारदर्शी शासन व्यवस्था कायम करने में मदद मिलेगी।

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