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विकेश कुमार बड़ोला का लेख : थाली नहीं है फिल्म उद्योग

राजनीतिक रूप में मृतप्रायः हो चुकी समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने संसद कंगना रनौत के विरुद्ध महाराष्ट्र शासन के पक्षपात का संरक्षण करते हुए भाजपा के सांसद रवि किशन को इंगित करते हुए कहा कि ये लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। सांसद का यह वक्तव्य कहीं से भी विचारणीय और प्रशंसनीय नहीं हो सकता।

इशारों-इशारों में जया बच्चन का कंगना रनौत को जवाब, जो खुद उसी इंडस्ट्री से है, वो इसके विरोध में बोल रहा है, ये शर्मनाक है
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जया बच्चन

विकेश कुमार बड़ोला

आक्रोशपूर्वक कहा जाए तो यही है कि मुम्बई का फिल्मी जीवन क्या इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि इसके आधार पर राष्ट्र का जीवन आंका जा रहा है? आखिर जरूरत क्या है ऐसे फिल्म उद्योग की जो फिल्मों और वास्तविक जीवन में भारतीय शासन की शासकीय विधियों, क्रियाविधियों और नियमों के प्रतिकूल मादक पदार्थों के क्रय-विक्रय से लेकर भारतीय संस्कृति, भाषा और मूल धर्म के लिए बहुविध समस्याएं खड़ी कर रहा हो। जब भारत कोरोना से लड़ रहा है और कुटिल-कपटी शत्रु देश चीन के साथ लद्दाख सीमा पर चिंतनीय तनातनी में भी उलझा हुआ है, क्या उस समयावधि में फिल्म उद्योग से संबंधित घटिया राजनीति को लेकर संसद में वाद-विवाद करना किसी भी दृष्टि से उचित है?

राजनीतिक रूप में मृतप्रायः हो चुकी समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने संसद कंगना रनौत के विरुद्ध महाराष्ट्र शासन के पक्षपात का संरक्षण करते हुए भाजपा के सांसद रवि किशन को इंगित करते हुए कहा कि ये लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। सांसद का यह वक्तव्य कहीं से भी विचारणीय और प्रशंसनीय नहीं हो सकता। इस वक्तव्य के आलोक में राष्ट्र, इसके शासन और विषयगत राज्य मुम्बई के शासन की लोकतांत्रिक धारणा का किसी भी दृष्टि से सशक्तिकरण नहीं होता। सांसद का उक्त वक्तव्य राष्ट्र के सम्मुख उत्पन्न अन्य विशाल समस्याओं को ध्यान में रखते हुए किंचित व्यर्थ प्रतीत होता है। इस संदर्भ में जया को आत्मविश्लेषण करने की अति आवश्यकता है। जया बच्चन की टिप्पणी में मुंबई फिल्म उद्योग को थाली कहा गया है। चलो मान लिया कि इस थाली ने अनेक लोगों को अभिनय के क्षेत्र में प्रतिष्ठित, प्रसिद्ध किया है और उन्हें धन, समृद्धि व वैभव प्रदान किया है। परन्तु क्या जया फिल्म उद्योग के राजस्व के स्रोत से परिचित नहीं है? क्या फिल्म उद्योग नामक थाली केवल मुंबई महानगर और महाराष्ट्र राज्य की अर्थव्यवस्था से बनती है? क्या इसमें अखिल भारत के उन करोड़ों लोगों के आर्थिक योगदान को भुला दिया जाना चाहिए, जो मनोरंजन के लिए इस थाली में अपना धन लगाते हैं? सांसद को यह बात याद रखनी चाहिए कि यदि भारतवर्ष के करोड़ों लोग किसी घड़ी स्वेच्छापूर्वक मुंबई फिल्म उद्योग के मनोरंजन को त्याग देंगे, तो सारा उद्योग धरा का धरा रह जाएगा।

उक्त सांसद के अतिरिक्त अनेक सांसद, विधायक और तथाकथित प्रतिष्ठित लोग हैं जो इस भ्रम में रहते हैं कि मुंबई फिल्म उद्योग मुंबई और महाराष्ट्र द्वारा परिचालित है। शिवसेना के गृहमंत्री संजय राउत भी ऐसी ही एक निरर्थक टिप्पणी कर चुके हैं। कंगना रनौत के साथ ट्विटर वाकयुद्ध में संलिप्त रहे संजय के विचार भी जया के समान ही हैं। इन्हें भी यही लगता है कि फिल्म आधारित प्रतिष्ठा, वैभव, समृद्धि और प्रसिद्धि दिलाने वाला केवल मुंबई है। यदि ऐसा है तो फिल्मों का प्रसारण केवल मुंबई तक ही सीमित हो जाना चाहिए। यदि ऐसा है तो कुकुरमुत्तों जैसे उग आए निजी चैनलों पर प्रसारित होने वाले अनेक धारावाहिक भी मुंबई और महाराष्ट्र तक ही सिमट जाने चाहिए। तब देख लें जया, संजय या इन जैसे दूसरे लोग कि तुम्हारा फिल्म उद्योग कितना धनार्जन करता है।

ऐसे लोगों द्वारा ये वक्तव्य देना कि मुंबई फिल्म उद्योग केवल मुंबई और महाराष्ट्र द्वारा ही परिचालित और समृद्ध है, इस बात का द्योतक है कि इस उद्योग के प्रति इनके एकाधिकार की दुर्भावना कितनी गहरी है। वस्तुतः सुशान्त, कंगना जैसे मानुषों के कंधों पर बंदूक रखकर मुंबई से दिल्ली तक जो भी राजनीति हो रही है, उसका मुख्य तार भाजपा और कांग्रेस की पारंपरिक राजनीतिक शत्रुता से ही जुड़ा हुआ है। देश में हुए, हो रहे प्रत्येक अनैतिक और अवैध कार्य से लेकर मुंबई फिल्म उद्योग में व्याप्त मादक पदार्थों की माफियागिरी व डॉनगिरी तक के सभी खटकर्मों को कांग्रेस के केन्द्रीय व राज्य स्तरीय शासनकाल में हमेशा से स्वच्छंद विचरण का अवसर मिलता रहा। फिल्मी माफियाओं को इसकी बुरी आदत लग चुकी है। अब भी उनकी यह आदत उन्हें इस सत्य का सामना नहीं करने देती कि विगत छह वर्षों से केन्द्र से कई राज्यों तक कांग्रेसी राजनीतिक शक्ति का क्षरण हो चुका है। छह वर्षों से और महाराष्ट्र में गठबंधनाधारित उद्धव शासन के आने से पूर्व तक फिल्मी माफियाओं को इस आदत से गुप्त हो जाना पड़ा था, परन्तु कांग्रेस परिचालित मुखौटा उद्धव शासन में ये माफिया पुनः बिलों से बाहर निकल आए हैं।

फिल्मों की आड़ में राष्ट्रीय राजनीति, समाज नीति, परिवार नीति, संस्कृति और भारतीय जनजीवन की अन्य समृद्ध परंपराओं को अपनी विरोधी कुंठा की पूर्ति के लिए खंडित करती कुछ लोगों की मानसिकता का स्थायी उपचार अब करना ही होगा। इसके लिए चाहे फिल्मों की विलासी आवश्यकता को लोगों के जीवन से दूर ही क्यों न करना पड़े। दूसरी ओर लोगों को भी अपनी बुद्धि-विवेक का उपयोग करते हुए मनोरंजन के लिए प्रेरणाप्रद पुस्तकों, खेल-क्रीड़ाओं की ओर ध्यान लगाना चाहिए और राष्ट्रविरोधी मानसिकता पर आरूढ़ होकर बनाई गई फिल्मों को देखकर राष्ट्र के विरोधियों को आर्थिक-राजनीतिक रूप में मजबूत होने का अवसर नहीं देना चाहिए।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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