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पंद्रहवीं लोकसभा सिखा गई कई सबक

पंद्रहवीं लोकसभा सिखा गई कई सबक

पंद्रहवीं लोकसभा सिखा गई कई सबक

नई दिल्‍ली.पंद्रहवीं लोकसभा अपना पांच वर्ष का कार्यकाल तो पूरा कर रहा है, लेकिन इसमें संसदीय परंपरा का सर्वाधिक क्षरण भी हुआ है। लोकतंत्र की गरिमा भी निम्नतम स्तर पर स्वयं माननीयों ने पहुंचा दी। इसे भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए अच्छी बात नहीं कही जा सकती। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक पांच वर्ष के कार्यकाल में विचार और पारित करने के लिए सूचीबद्ध 326 विधेयकों में से इस लोकसभा ने 177 विधेयक पारित किए। यह पांच वर्ष के पूर्ण कार्यकाल में पारित किए गए विधेयकों की सबसे कम संख्या है। इसके मुकाबले 13वीं लोकसभा ने 297 और 14वीं ने 248 विधेयक पारित किए थे।

संसद में अभी कुल 128 विधेयक लंबित हैं। इनमें से 60 राज्यसभा में और 68 लोकसभा में हैं। लोकसभा में समाप्त हुए विधेयकों की यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। इस दौरान कई संसदीय सत्र ऐसे रहे जिनमें लगातार प्रश्नकाल तक नहीं हो सका। हालांकि इस लोकसभा में कई महत्वपूर्ण बिल पास हुए हैं जैसे शिक्षा का अधिकार, रेप निरोधक कानून, लोकपाल कानून, तेलंगाना के गठन को मंजूरी, भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की सुरक्षा के लिए कानून, खाद्य सुरक्षा कानून आदि पर इसमें से अधिकांश को सरकार अंतिम वर्ष में लेकर आई जब देश लोकसभा चुनावों की ओर बढ़ चुका था।

इस लोकसभा को सरकार के भ्रष्टाचार टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम घोटाला, कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला, रेलवे में प्रमोशन को लेकर घूस, टाट्रा ट्रकों का घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला के लिए भी याद रखा जाएगा। तेलंगाना गठन के विरोधियों ने संसद में मिर्च स्प्रे कर लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया। वह दिन भारतीय संसदीय इतिहास में एक काला अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। वहीं कांग्रेस नीत यूपीए सरकार आंध्रप्रदेश पुनर्गठन बिल पारित कराने के लिए दो कदम आगे बढ़ गई। संसद के दरवाजे बंद कर दिए, कई सांसदों को बोलने नहीं दिया गया और लोकसभा टीवी प्रसारण बंद हो गया।

यूपीए दो सरकार गर्मियों में गठित होने वाली 16वीं लोकसभा के लिए चुनौतियों का अंबार छोड़कर जा रही है। गत वर्ष राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि लोकतंत्र का महत्व तीन डी से होता है, डिबेट (फैसला), डिस्कशन (चर्चा), डिसेंट (विरोध) और फिर आखिर में डिसीजन, लेकिन आज एक दीगर ‘डी’ डिसरप्शन (सदन की कार्यवाही में बाधा) सबसे ज्यादा हावी है, जिसका कि लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। उन्होंने चिंता जताई थी कि संसद को विधायी कार्यों के लिए निर्धारित समय में भी तेजी से कमी आ रही है। और इसकी मुख्य वजह हंगामा है।

केवल पांच वर्षों के अंतराल पर ही चुनाव करा लेना लोकतंत्र नहीं है, बल्कि सदनों में देशहित के मुद्दों पर सारगर्भित चर्चा हो तभी उसका उद्देश्य पूरा होता है। संसद के साठ वर्षपूरे होने पर सभी दलों ने आश्वासन दिया था कि हंगामा नहीं करेंगे और सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलने देंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। यह स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर आत्ममंथन की जरूरत है। यदि जनप्रतिनिधि सदन के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे तो लोकतांत्रिक प्रणाली मजबूत नहीं होगी।

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