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FIFA World Cup : फीफा पर फना होते फुटबॉल प्रेमी

क्रिकेट को ‘धर्म‘ और हाॅकी को ‘राष्ट्रीय खेल‘ का दर्जा देने वाले हमारे मुल्क में फुटबाल के रोमांच पर फिदा होते खेलप्रेमियों की बानगी देखते ही बनती है, पर यह भी निर्विवाद सत्य है कि समूची दुनिया में फुटबाॅल को ही खेलों के धर्म और ईमान का दर्जा प्राप्त है।

FIFA World Cup : फीफा पर फना होते फुटबॉल प्रेमी

क्रिकेट को ‘धर्म‘ और हाॅकी को ‘राष्ट्रीय खेल‘ का दर्जा देने वाले हमारे मुल्क में फुटबाल के रोमांच पर फिदा होते खेलप्रेमियों की बानगी देखते ही बनती है, पर यह भी निर्विवाद सत्य है कि समूची दुनिया में फुटबाॅल को ही खेलों के धर्म और ईमान का दर्जा प्राप्त है। इसके प्रति दीवानगी और जूनून विश्व के हर कोने में देखा जा सकता है।

विशेषकर चार साल में एक बार आयोजित होने वाले फीफा वर्ल्ड कप के दौरान जब फुटबाल का जादू पूरी दुनिया को अपनी आगोश में लेता है तो एक तरह से ‘सब कुछ छोड़-छाड़ के‘ भारतीयों का ‘खेल-प्रेम‘ भी फुटबाल की तान पर हिलोरे मारने लगता है। और तो और सच्चाई यह भी है कि क्रिकेट और दीगर खेलों के हमारे धुरंधर भी ‘फुटबाल‘ और दुनिया में इसके बड़े सितारों की प्रशंसा में मशगूल हो खुद को उपकृत महसूस करते हैं।

रूस में आगामी 14 जून से आरंभ होने जा रहे फीफा विश्व कप के 21वें संस्करण में हम एक बार फिर ऐसी ही परिस्थितियों से दो-चार होने जा रहे हैं। जहां तक भारत का सवाल है, यह बड़ा कटु और अनवरत सालने वाला सच है कि दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय खेल फुटबाल की सर्वोच्च स्पर्धा फीफा विश्व कप के फाइनल में खेलने के गौरव से हमारी टीम अभी तक महरूम है।

फिर भी फुटबाल वर्ल्ड कप को लेकर दुनिया के देशों में करोड़ों प्रशंसकों के दिल में बसने वाली दीवानगी में बराबर के साझीदार बनने के लिए भारतीय खेलप्रेमी सदैव बेताब रहते हैं। फुटबाल के रोमांच को आत्मसात कर इसे रूह की गहराइयों से लगाव करने वाले भारतीय फुटबाल फैंस जब फीफा वर्ल्ड कप के प्रत्येक पल को एन्जाॅय करते हैं तो अक्सर उन पर ‘बेगानी शादी में अब्दुला दीवाना‘ वाला तंज कस, उनकी चाहत पर तोहमत मढ़ दी जाती है।

लंबे अरसे से ऐसे फिकरों की परवाह किए बगैर निश्चल भाव से फुटबाल पर फना होने की हद तक प्यार न्यौछावर करने वाले भारतीय प्रशंसक इस विश्व कप में भी हर बार की तरह करीब 32 दिनों तक कई रातें अपने टीवी सेट्स के आगे गुजारने की तैयारियों में मशगूल हैं। देश के इस फुटबाल प्रेम पर तंज और फिकरे कसे जाते हैं, क्योंकि आलमी फुटबाल में न तो भारत की कोई खास हैसियत है

और न ही हम कभी प्रतिष्ठित ‘जूल्स रिमे ट्राफी‘ के लिए खेले जाने वाले विश्व कप की शीर्ष 32 टीमों में कभी बाकायदा क्वालीफाई कर पाए हैं। भारत को 1950 में ब्राजील में आयोजित हुए चौथे विश्व कप टूर्नामेंट में कई देशों के भाग नहीं लेने से उत्पन्न परिस्थितियों के बीच अपनी टीम भेजने का आमंत्रण मिला था। उस समय आॅल इंडिया फुटबाॅल फेडरेशन ने इसकी अहमियत नहीं समझी और टीम को इस स्पर्धा में नहीं भेजा।

इसका कारण करीब एक माह की समुद्री मार्ग से यात्रा और इस पर होने वाले खर्च को वहन न कर पाने की स्थितियों के रूप में गिनाया जाता रहा है। कहा यह भी जाता है कि उस वर्ल्ड कप के आयोजक भारत के भाग लेने की सूरत में खर्च को भी वहन करने को तैयार हो गए थे, इसके बावजूद टीम को वहां नहीं भेजा गया। एक अन्य बात यह भी अक्सर चर्चाओं में रहती है कि उस समय भारतीय खिलाड़ी नंगे पांवों से फुटबाॅल खेला करते थे,

इस वजह से उनको विश्व कप में जूते पहनकर खेलने में परेशानी थी, इस कारण टीम वहां नहीं भेजी गई। खैर, विश्व फुटबाल में देश की पहुंच और प्रदर्शन के इस परिदृश्य के बीच फीफा विश्व कप का नूतन संस्करण भारतीय खेलप्रेमियों के लिए किसी की परवाह किए बगैर केवल और केवल फुटबाल के जूनून में फना हो जाने का फिर एक अवसर है।

हम इसी ‘स्पिरिट‘ के साथ दुनिया के इस सर्वाधिक लोकप्रिय खेल में विश्व कप की फिजाओं के रंग में खुद को रंगते आए हैं। यह सही है कि क्रिकेट, हाॅकी, रैकेट खेल, कुश्ती, भारोतोलन, एथलेटिक्स, मोटर स्पोर्ट्स और नौकायान आदि से लेकर स्नूकर, बिलियर्ड्स, निशानेबाजी और तीरंदाजी तक में भारत के खेल सितारों ने अपनी सफलताओं के झंडे गाड़े हैं।

इसके बावजूद अरसे से फुटबाल में बुलंदियां तय करने की हूक ईस्ट बंगाल, मोहन बागान, मोहम्डन स्पोर्ट्स, जेसीटी फगवाड़ा, सालगांवकर क्लब, महिन्द्रा एंड महिन्द्रा के अलावा अब फुटबाल हब बनते जा रहे नार्थ-इस्टर्न स्टेट और लीग फुटबाल के नए स्वरूप के दम पर मुखरित रही है।

पीके बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, सैयद अब्दुल रहीम, शैलेन मन्ना, मेवालाल, अब्दुल गफूर, मगन सिंह राजवी से लेकर के. विजयन, वाइचुंग भूटिया और सुनील छेत्री जैसे फुटबाल खिलाड़ियों की पीढ़ियों ने भी तमाम तरह की विषमताओं और विपरीत परिस्थितियों के बाद भी भारतीय फुटबाल की शान में अपना सर्वस्व न्योछावर किया है।

दुनिया के महानतम खिलाड़ियों में से एक ब्राजील के पेले, अर्जेंटीना के मैराडोना, इटली के सर्गियो बेजियो, इंग्लैंड के डेविड बैकहम, जर्मनी के क्लिंसमैन से लेकर फ्रांसिसी जिनेडिन जिडान तथा मौजूदा समय में अर्जेंटीना के लियोनल मैसी से पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो तक की पीढ़ी के कई लोकप्रिय फुटबाल सितारों के प्रति देश में दीवानगी की कई नजीर है।

फीफा वर्ल्ड कप के समय देश के हिस्सों को कहीं ब्राजील तो कहीं अर्जेंटीना के फालोअर्स में बांटकर देखा जाता है। जर्मनी, फ्रांस, स्पेन या फिर पुर्तगाल की टीमों के समर्थन में इस देश के खेलप्रमी खुले तौर पर अपनी भावनाओं का इजहार करते आए हैं। आप इस दीवानगी का दोष केवल खेलप्रेमियों के माथे भी नहीं मढ़ सकते, जरा इतिहास के पन्ने पलटकर देखिए बेजियो,

बैकहम या मैसी सरीखे दुनिया के लोकप्रिय फुटबाल सितारों जैसी हेयर स्टाइल को अपनाने का फैशन तो हमारे क्रिकेटरों और अन्य खिलाड़ियों का भी शगल रहा है। सचिन तेंदुलकर को भारतीय क्रिकेट में भगवान का दर्जा दिया गया है, वे दस नम्बर की जर्सी पहनकर खेलते थे। उनके संन्यास के बाद भारतीय क्रिकेट ने दस नम्बर की जर्सी को भी रिटायर कर उनके प्रति अगाध श्रद्धाभाव दिखाया गया,

मगर हकीकत यह भी है कि क्रिकेट में ‘दस नम्बरी‘ होने के गौरव के जिन क्षणों को सचिन और भारतीय फैंस ने भोगा, वे विश्व फुटबाॅल के दिग्गजों पेले, मैराडोना, गैरी लिनेकर और लियोनल मैसी जैसे सितारों की जर्सी पर सजे ‘10 नम्बर‘ से ही आयातित रहे हैं। यह इस बात का साफ प्रतीक है कि भले ही फुटबाल में भारत के विश्व पटल पर शक्ति के रूप में उभरने की बात दूर की कौड़ी है,

बावजूद इसके फुटबाल के प्रति अथाह प्रेम और श्रद्धा इस मुल्क की रग-रग में रची बसी है। गत वर्ष गुवाहाटी, गोआ, नई दिल्ली, कोच्चि, नवीं मुंबई और देश की फुटबाल राजधानी कोलकाता के मैदानों पर आयोजित अंडर-17 वर्ल्ड कप में भारत की टीम भले ही अमेरिका, कोलम्बिया और घाना की टीमों से संघर्ष के बाद कागजों पर कोई उपलब्धि नहीं हासिल कर पाई हो, फिर भी इस प्रतिष्ठित स्पर्धा की मेजबानी के बाद हो रहा 21वां फीफा विश्व कप देश में फुटबाल के फीवर को नए मुकाम पर ले जाएगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।

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