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''फरवरी जैसे बुरे दिन तो परमात्मा दुश्मन को भी न दे''

लाख कोई अच्छे दिनों की बात करे, पर साहब फरवरी जैसे बुरे दिन तो परमात्मा दुश्मन को भी न दे।

साहब, लाख घोटाले राजनीति में भारी धमाका कर दे, लाख भारत, दक्षिण अफ्रीका को वन डे सीरिज में रौंद डाले। लाख कोई अच्छे दिनों की बात करे, पर साहब फरवरी जैसे बुरे दिन तो परमात्मा दुश्मन को भी न दे। आप कहोगे कि दिन तो साल भर एक जैसे ही रहते हैं, बस थोड़ा मौसम ही तो बदलता है। बस जरा कपड़े पहनकर ही काम चला लेते हैं।

यहां कोई रोने-धोने की तो बात ही नहीं है। मुझे लगता है कि आपको कुछ समझ में नहीं आ रहा है। भई क्या हुआ, नहीं समझे। अरे साहब, जरा अपनी पे-स्लिप तो उठाकर देखो। तुम्हें मिलने वाले गुजारे भत्ते जैसे वेतन पर यह इन्कमटैक्स की कैसी बेदर्द कैंची चल रही है। सारा का सारा वेतन इन्कमटैक्स में चला गया है। पे स्लिप की कटौतियां तुम्हारा मुंह चिढ़ा रही हैं।

अब तुम्हें यह चिंता सता रही है कि तुम पत्नी को क्या मुंह दिखाओगे। अब बीवी को कैसे समझाओगे कि साल भर इन्कम तो तुमने दिखलाई नहीं, यह मुआ टैक्स कहां से आ गया। स्वाभवतः हर बात को नासमझने वाली उस अबोध प्राणी को इतनी गूढ़ बात कैसे समझा पाओगे। सचमुच फरवरी का महीना तो बड़ा बेदर्द होता है। कवि इसकी महत्ता समझने में असमर्थ रहे हैं।

कवि महोदय ने भले ही सावन के महीने के लिए विरह के गीत लिख दिए। सावन की ऋतु में नायिका के बिछोह को सह न पाने के संदर्भ में नायक न जाने क्या-क्या लिख देता है। नायिका वहां तो इमोशनल हो जाती है। विरह रस से प्रेम रस का प्रार्दुभाव हो जाता है। पर यहां ऐसा नहीं है। कोई नायिका यदि नायक की फरवरी माह की पे-स्लिप देख ले तो वो जीवन भर नायक का मुंह ही न देखे।

वो जीवन भर विरह रस से पीिड़त ही रहे। फरवरी का महीना बड़ा अधार्मिक होता है। सभी भिखारी इसमें डिप्रेशन में चले जाते हैं। उनकी आय का ग्राफ गर्त में चल जाता है। अब वे भी क्या बिचारें। आदमी उनको क्या खाकर दे। आदमी की स्वंय की हालत भी भिखारी से कम थोड़े ही होती है। वो स्वंय लेने वाली हालत में आ जाता है। भिखारी स्वयं ही घबराकर उनसे नहीं मांगते उन्हें यह डर रहता है कि कहीं यह इन्कमटैक्स पीिड़त उनसे ही कुछ मांग न बैठे।

एक भिखारी दूसरे भिखारी से भला क्या मांग सकता है। और बिचारा, पहले तो अगले साल की सोचकर किसी तरह दिन निकाल लेता था। क्योंकि पहले फरवरी के अंत में बजट आता था। सोच लेता था कि शायद वित्त मंत्री अगले बजट में थोड़ी दया कर दे। पर अब तो बजट पहले आ ही गया है, जिसमें उसके हाथ कुछ नहीं लगा है। सो बस आजकल तो उसके वर्तमान और भविष्य दोनों की चिंता में बीत रहे हैं। बार-बार मन में बस यही उम्मीद उठ रही है कि चलो इस बार ना सही अगली बार बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री जरूर इस ओर ध्यान देंगे।

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