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अवधेश कुमार का लेख : फिर विश्वयुद्ध की आशंका

एक समय ऐसा लगता था कि रुस की पूर्व सोवियत संघ की तरह महाशक्ति होने की महत्वाकांक्षा से विश्व में टकराव बढ़ेगा। किंतु अब दुनिया को समझ आ गया है कि चीन सबसे खतरनाक तरीके से अपना विस्तार कर रहा है। अमेरिका और चीन के बीच टकराव यूं ही नहीं था। ताइवान पर चीनी हमले की आशंका देखते हुए अमेरिका ने जहाजों और नाभिकीय पनडुब्बियों को प्रशांत महासागर में सक्रिय कर दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने कहा है कि भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपीन जैसे देशों के लिए चीन से बढ़ रहे खतरे का मुकाबला करने के लिए अमेरिका अपने बलों की वैश्विक तैनाती की समीक्षा कर रहा है।

भारत और चीन में कौन है बेहतर, यहां जानेंभारत-चीन

अवधेश कुमार

अनेक विश्लेषक काफी समय पहले से चीन के राष्ट्रपति शि जिनपिंग के पहले शि को निकालकर शिटलर कहते आ रहे हैं। उनका मानना है कि यह व्यक्ति कम्युनिस्ट होते हुए भी हिटलर जैसी उन्मादी राष्ट्रवाद और नस्लवाद की मिश्रित साम्राज्यवादी मानसिकता रखता है। बहुत विस्तार और गहराई में न जाएं तो भी कुछ समानताएं दोनों के कदमों में हैं। हिटलर ने सत्ता में आने के साथ धीरे-धीरे लोकतंत्र को खत्म कर सर्वसत्तावाद की स्थापना कर दी जिसमें उसे चुनौती देने वाला कोई न रहे। उसने जर्मनी को सैनिक एवं आर्थिक दृष्टि से मजबूत कर विस्तारवादी रवैया अपनाया। सैन्य शक्ति के बल पर उसने उन क्षेत्रों को जर्मनी का भाग बनाने का मंसूबा प्रकट करना आरंभ किया जो उसके लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे तथा जिनके बारे में उसकी धारणा थी कि वे जर्मन नस्ल के हैं। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद संपन्न वर्सायी की संधि में जर्मनी के साथ अन्याय हुआ था। उसे आर्थिक और सैनिक ही नहीं राजनीतिक और भौगोलिक रुप से भी पंगु बना देने की पूरी कोशिश की गई थी। इस कारण जर्मनी में असंतोष था और हिटलर उसका लाभ उठाकर सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हुआ। उसने यह कहकर ऑस्ट्रिया को हड़पा कि ये सारे जर्मन हैं। उसके बाद उसने चेकोस्लोवाकिया के एक बड़े भाग को जर्मन नस्ल बताकर अधिकार जताया। ब्रिटेन और फ्रांस बातचीत से रास्ता निकालने का राग अलापते रहे, उसने चेकोस्लोवाकिया के सुडटेनलैंड पर कब्जा कर लिया। अब उसकी नजर पोलैंड पर थी। अंततः उसने पोलैंड पर हमला कर ही दिया। इसके बाद दुनिया के प्रमुख देशों को लगा कि अब हिटलर से युद्ध करने के अलावा कोई उपाय नहीं है तो द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ।

अगर आरंभ से ही जर्मनी में हिटलरवाद को चुनौती दी जाती तो नौबत यहां तक नहीं आती। इटली, जापान और स्पेन में भी सर्वसत्तावाद का उदय हो चुका था तथा वे भी जर्मनी की देखा देखी सैन्य शक्ति से विस्तारवाद की नीति पर चलने लगे थे। आप अगर चीन को देखिए तो 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति से वहां के शासक बदलते गए और बीच के काल में जब देंग शियाओ पिंग कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एवं राष्ट्रपति थे तो थोड़ी नीति बदलती भी दिखाई दी, किंतु कम्युनिस्ट विस्तारवादी या साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद से चीन पीछे कभी हटा नहीं। आज शिंकिंयांग और तिब्बत में मानवाधिकारों के हनन की बात दुनिया अवश्य कर रही है पर अभी तक औपचारिक रुप से विश्व समुदाय ने किसी समूह में एक प्रस्ताव पारित नहीं किया है। शि ने सत्ता में आने के बाद से कम्युनिस्ट साम्राज्यावदी राष्ट्रवाद की धार को ज्यादा आक्रामकता दी है। उन्होंने हिटलर की ही तरह चीनी संसद द्वारा स्वयं को पहले से ज्यादा शक्तिमान बनाया तथा पूरे जीवन भर शासक रहने की व्यवस्था कर ली। उसके साथ उन्होंने उन सारे क्षेत्रों को चीन का भाग कहना आरंभ किया जहां उनके अनुसार चीन के किसी शासक का इतिहास में कभी शासन था। कुछ उदाहरण लीजिए। चीन मानता है कि वियतनाम उसका भाग है, क्योंकि चीन के मिंग राजवंश का यहां शासन रहा था। इसी तरह बर्मा पर भी उसकी नजर है, क्योंकि उसके अनुसार 1271 से 1368 के बीच चीन के युआन राजवंश के समय यह उसका हिस्सा हुआ करता था। कंबोडिया पर उसकी नजर लंबे समय से रही है।

इस तरह की उन्मादित राष्ट्रवादी साम्राज्यवादी मंसूबे का अंत कहां हो सकता है? पूर्वी चीन सागर और दक्षिणी चीन सागर पर पहले लगता था कि कोई विवाद ही नहीं है। जापान के सिनकाकू द्वीप पर वह इसी आधार पर कब्जा चाहता है, क्योंकि चीन के इतिहास मंें वहां तक उसके नावों के होने का विवरण है। 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला दक्षिण चीन सागर इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और ब्रुनेई से घिरा है। पूरे क्षेत्र पर अपना दावा करते हुए उसने वहां अपना सैन्य जमावड़ा स्थायी कर लिया है। उसकी एक चीन नीति में ताइवान भी शामिल है। भारत से तनाव की बीच ताइवान की सीमा में उसके लड़ाकू विमान घुसते दिखे। ताइवान को भी अपने लड़ाकू जहाज को आसमान में उतारना पड़ रहा है। 1997 में जब ब्रिटेन ने चीन को हांगकांग सौंपा तो उसमें शर्त थी कि वहां लोकतंत्र होगा तथा अगले 50 साल तक चीन वहां राजनीतिक बदलाव नहीं करेगा। चीन अब उसे भी उपनिवेश के तौर पर शक्ति से बदलना चाहता है। यही स्थिति मकाउ की है जिसे पुर्तगालियों ने 1999 में चीन को स्थानांतरित किया। हो सकता है शी की पीपुल्स लिबरेश आर्मी किसी दिन हांगकांग और मकाउ की तरह लील लें।

अपने आपसे यह प्रश्न पूछिए कि चीन अगर हर हाल में अपना कम्युनिस्ट राष्ट्रवादी साम्राज्यावादी विस्तार करने पर तुला है तो फिर उसे कैसे रोका जा सकता है? चीन दुनिया का एकमात्र देश है जिसकी सीमा 12 देशों से लगती और उसका सीमा विवाद 24 देशों के साथ है। तिब्बत को हड़पने के साथ उसने अपनी सोच के तहत ही 1962 में भारत पर हमला किया और जब सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्ष़्ोत्रों पर कब्जा कर लेने के बाद स्वयं ही युद्ध बंद कर दिया। जिस देश की नजर लद्दाख के बड़े हिस्से पर हो, जो पूरे अरुणाचल को कहता हो कि वहां तो हमारा दलाई लामा ने तवांग मठ बनाया इसलिए वह हमारे तिब्बत का अंग है उससे बातचीत के द्वारा समाधान की कल्पना करना ही व्यर्थ है।

एक समय ऐसा लगता था कि रुस की पूर्व सोवियत संघ की तरह महाशक्ति होने की महत्वाकांक्षा से विश्व में टकराव बढ़ेगा। किंतु अब दुनिया को समझ आ गया है कि चीन सबसे खतरनाक तरीके से अपना विस्तार कर रहा है। अमेरिका और चीन के बीच टकराव यूं ही नहीं था। ताइवान पर चीनी हमले की आशंका देखते हुए अमेरिका ने जहाजों और नाभिकीय पनडुब्बियों को प्रशांत महासागर में सक्रिय कर दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने कहा है कि भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपीन जैसे देशों के लिए चीन से बढ़ रहे खतरे का मुकाबला करने के लिए अमेरिका अपने बलों की वैश्विक तैनाती की समीक्षा कर रहा है। चीन को जवाब देने के लिए इन जहाजों को कभी भी मलक्का जलडमरूमध्य और

बंगाल की खाड़ी में तैनात किया जा सकता है। हालांकि ये कदम पर्याप्त नहीं हैं, फिर भी माना जा सकता है कि अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व जो गलती यूरोपीय देशों ने की उसे दोहराना नहीं चाहता। वस्तुतः समय की मांग है कि भारत भी चीन के संदर्भ में अपनी पूरी सामरिक तैयारी इसी बात को ध्यान में रखकर करे कि सैन्य टकराव काफी विस्तारित होगा।

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