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आलोक पुराणिक का लेख : कृषि सुधार पर वोट की खेती

एक बात बार-बार आंदोलनकारी कह रहे हैं कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को खत्म (Over) करना चाहती है। सरकार इस बारे में स्पष्टीकरण दे चुकी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म नहीं होगा। पर विपक्ष को मुद्दा मिल गया है। वो कृषि सुधार पर अपने वोटबैंक की खेती करने में जुटा हुआ है। केंद्र सरकार घोषणा करके विपक्ष की उन अफवाहों को ध्वस्त कर सकती है, जिनके मुताबिक सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को खत्म करने जा रही है।

आलोक पुराणिक का लेख : कृषि सुधार पर वोट की खेती
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कृषि बाजार के सुधारों को लेकर विकट राजनीतिक गहमागहमी है। राज्यसभा में उठापटक के अलावा तमाम राजनीतिक (Political) दल किसानों के हित चिंतक दिखना चाहते हैं। किसानों की हित चिंता भारतीय राजनीति के केंद्र में रही है, कम से कम बातों के स्तर पर तो ऐसा ही दिखा है।

यह अलग बात है कि किसानों की हित चिंता अर्थव्यवस्था में ठोस तरीके से नहीं हो पाई है। समूची अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान करीब 15 प्रतिशत का है। यह अलग बात है कि कोरोना से ग्रस्त अर्थव्यवस्था में जिस सेक्टर में उम्मीद की किरणें देखी जा रही हैं, वह कृषि क्षेत्र ही है।

2020-21 में जिस क्षेत्र में सकारात्मक विकास की उम्मीद है वह कृषि क्षेत्र ही है, बाकी सारे क्षेत्रों में तो सिकुड़ाव की आशंकाएं हैं। पंजाब और हरियाणा में खास तौर पर उन सुधारों का विरोध दिखाई पड़ रहा है, जो केंद्र सरकार ने कृषि बाजारों के सुधारों के लिए किए हैं। मोटे तौर पर हाल के सुधारों के बाद किसानों (Farmers) के ऊपर यह बंदिश नहीं रहेगी कि उन्हे अपनी उपज को कृषि मंडियों में ही बेचना पड़ेगा।

यानी किसान चाहे तो अपनी फसल को किसी कंपनी को भी बेच सकता है। मोटे तौर पर किसानों को ज्यादा ग्राहक उपलब्ध होंगे और दूसरी तरफ कृषि मंडियों के लिए जो किसान एक तरह से बंधक विक्रेता होता था, अब वह बंधक नहीं रहेगा। किसान मंडियों में तब ही आएगा, जब उसे मंडी से बाहर के भावों के मुकाबले मंडी के अंदर भाव बेहतर मिलेंगे। जाहिर है, इससे मंडियों के कारोबार पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

मंडी शुल्क में कमी आएगी और मंडी में कार्यरत कारोबारियों की आय पर भी असर पड़ेगा। मंडियों के कारोबारी जो उद्वेलित हैं, उसके पीछे एक बड़ी वजह है कि वह कानूनी छत्रछाया हट गई है, जिसके तहत किसान मंडी में ही अपना माल बेचने को बाध्य हुआ करता था।

यह जानने के लिए अर्थशास्त्री होना जरुरी नहीं है कि किसान को उसकी फसल के बेहतरीन भाव तभी मिलेंगे, जब उसके खरीदारों की तादाद में बढ़ोत्तरी होगी और मंडी में मिलें तो मंडी में बेचो, मंडी के बाहर मिलें, तो मंडी के बाहर बेचो। किसानों के एक नेता स्वर्गीय शरद जोशी ने एक बार कहा था कि भारतीय किसान को मार्क्स और एंजेल्स नहीं मार्क्स और स्पेंसर चाहिए। इस बात का आशय यह था कि भारतीय किसान को बेहतर बाजार चाहिए, जहां ग्राहक बहुत हों और जहां पर उसे अपने माल बेचने की छूट हो।

कृषि विपणन से जुड़े सुध़ारों को लेकर राजनीतिक विवाद गहरे हो गए हैं, नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस एनडीएन में भाजपा के पुराने सहयोगी दल-शिरोमणि अकाली दल की प्रतिनिधि मंत्री हर सिमरत कौर ने इस्तीफा दिया है। कांग्रेस ने भी इस आशय के वादे किए थे कि कृषि मंडियों से जुड़े कानून को खत्म किया जाएगा। मंडी शुल्क एक प्रतिशत से लेकर 6 प्रतिशत तक रहता है।

यह कमाई का बड़ा माध्यम है। मंडियां कमाती हैं, मंडी में बैठे कारोबारी कमाते हैं। दिसंबर 2010 में जब प्याज के भाव आसमान पर पहुंच गए थे, तब प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा करवाई गई जांच में साफ हुआ था कि देश के सबसे बड़े प्याज बाजार नासिक की लसनगांव मंडी की एक फर्म के पास ही देश के कुल प्याज कारोबार का बीस फीसदी था। यह स्थिति बदलेगी, अगर दूसरी बड़ी कंपनियां और बड़े कारोबारी मैदान में उतरेंगे।

प्रतिस्पर्धा की बात तो कारोबारी करते हैं, प्रतिस्पर्धा से डर भी लगता है कई कारोबारियों को। किसानों को कहीं और बेचने की छूट मिलने का एक मतलब तो यह है कि किसानों के पास ग्राहक ज्यादा होंगे, पर किसानों को कहीं भी बेचने की छूट मिलने का एक मतलब यह भी है कि वे कृषि मंडियों की तरफ आएं, यह जरुरी नहीं रहेगा। गौरतलब है कि जिस मंत्रिमंडल ने कृषि सुधारों को मंजूर किया, उसका हिस्सा अकाली दल की प्रतिनिधि भी थीं, तो कुल मिलाकर अकाली दल की प्रतिक्रिया प्रहसन ही प्रतीत होती है।

पंजाब और हरियाणा में कृषि विपणन से जुड़े सुधारों का गहरा विरोध हो रहा है। इन सुधारों से कृषि मंडियों की एकाधिकार खत्म होता है, यानी किसान कृषि मंडियों के बाहर अपनी मर्जी से किसी को भी अपने आइटम बेच सकता है, यह बात राजनीतिक और आर्थिक तौर पर प्रभावशाली कृषि मंडियों को नागवार गुजर रही है। आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में एक साल में करीब 1800 करोड़ रुपये का मंडी शुल्क वसूला जाता है और करीब 1500 करोड़ रुपये मध्यस्थ आढ़तियों को मिलता है।

हरियाणा में मंडियों और आढ़तियों की मोटी कमाई होती है। एकाधिकारी स्थिति होने के चलते मंडी के बाहर किसान अपने उत्पाद नहीं बेच सकते, अब जब किसान अपनी मर्जी से किसी को भी अपनी उपज बेच सकेगा, तो इस कमाई पर चोट लगनी है। यह चोट परेशान करती है, पंजाब और हरियाणा में मंडी से जुड़ी लाबी बहुत मजबूत है। इसलिए विरोध पंजाब और हरियाणा में ही जोरदार दिख रहा है।

एक बात बार-बार आंदोलनकारी कह रहे हैं कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को खत्म करना चाहती है। सरकार इस बारे में स्पष्टीकरण दे चुकी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म नहीं होगा। पर विपक्ष को मुद्दा मिल गया है। आदर्श स्थिति यह है कि किसान को यह हक हासिल होना चाहिए कि वह जहां चाहे अपना माल बेच ले, मंडी में या मंडी के बाहर। मंडी को एकमात्र एकाधिकारी बाजार नहीं होना चाहिए।

एकाधिकार एक हद अकुशलता और शोषण को जन्म देता है। संकटग्रस्त किसानों की कहानियां आम हैं, आढ़तियों और मध्यस्थों के संकट में होने की खबरें कम ही आती हैं। यानी किसानों को अगर बेचने के लिए दूसरे मौके और साधन मिल रहे हैं, तो यह बात किसानों के हक की है। चाहे इससे किसी एकाधिकारी को भले ही चोट पहुंच रही हो। कृषि विपणन को लेकर सुधार लंबे समय से लटके हुए थे।

अब ये हो रहे हैं, तो इन्हे मौका मिलना चाहिए। पर केंद्र सरकार को यह समझना चाहिए कि आखिर ऐसा क्या है कि वह अपने सहयोगी दल अकाली दल को भी भरोसे में नहीं ले पाई। सरकारें सिर्फ बहुमत नहीं है, संवाद से और समझ भी चलती है। नीतियां चाहे जितनी अच्छी हैं, अगर उनकी स्वीकार्यता को लेकर संवाद नहीं किया जाएगा, तो गलतफहमियां ही पैदा होंगी। केंद्र सरकार को चाहिए कि तमाम पक्षों से सार्थक संवाद करे और तमाम गलतफहमियों को दूर करे।

किसानों के हित की नीतियों को अगर किसान ही नहीं समझ पा रहे हों, तो सरकार को अपनी नीतियों और रणनीतियों पर गौर करना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर केंद्र सरकार घोषणा करके विपक्ष की उन अफवाहों को ध्वस्त कर सकती है, जिनके मुताबिक सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को खत्म करने जा रही है।

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