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संपादकीय लेख : कोरोना से मौत होने पर परिजन राहत के हकदार

शीर्ष अदालत ने तीन अहम निर्देश देकर सरकार के किसी प्रकार के बहाने की संभावना को भी खारिज कर दिया है। पहला, कोरोना से मौत होने पर डेथ सर्टिफिकेट जारी करने की व्यवस्था सरल हो। अधिकारी इसके लिए गाइडलाइन जारी करें। दूसरा, जैसा कि वित्त आयोग ने प्रस्ताव दिया था, उसके आधार पर केंद्र उस व्यक्ति के परिवार के लिए इंश्योरेंस स्कीम बनाए, जिसकी जान आपदा में चली गई। तीसरा, एनडीएमए राहत के न्यूनतम मानकों को ध्यान में रखते हुए कोविड मृतकों के परिवारों के लिए गाइडलाइन 6 हफ्तों के भीतर जारी करे।

संपादकीय लेख : कोरोना से मौत होने पर परिजन राहत के हकदार
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : प्रवासी मजदूरों का राष्ट्रीय डाटा व वन नेशन वन राशन स्कीम पर 31 जुलाई तक समय सीमा तय करने के अगले ही दिन उच्चतम न्यायालय ने कोरोना से हुई मौतों पर मुआवजा को लेकर सरकार को 'स्टेट' होने की जिम्मेदारी का एहसास कराया है। संविधान में नागरिकों की हर प्रकार से सुरक्षा, आपदा व विपदा में मदद 'स्टेट' (सरकार) का दायित्व है। भारतीय संविधान में लोक कल्याणकारी 'स्टेट' की अवधारणा है। इस 'स्टेट' का मतलब प्रांत नहीं है। कोरोना काल में संवैधानिक रूप से स्टेट की भूमिका निभाने में केंद्र व राज्य की सरकारें स्वास्थ्य के स्तर पर, न्यूनतम रोजगार के अवसर पर, जीवनयापन के लिए राहत के स्तर पर और मुआवजे के स्तर पर सफल नहीं रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के दो दिन के निर्देश इसी ओर इशारे करते हैं। 29 जून मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने केंद्र व राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि 31 जुलाई तक असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का राष्ट्रीय डाटा तैयार करें। इसी दिन वन नेशन वन राशन स्कीम के लिए भी यही समय सीमा दी। 30 जून बुधवार को शीर्ष कोर्ट ने कहा कि 'कोरोना से मौत होने पर परिजन मुआवजे के हकदार हैं। सरकार उन्हें मुआवजा दे। मुआवजे की रकम कितनी होगी, ये केंद्र सरकार तय करे। मुआवजे की रूपरेखा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) पर सख्त टिप्पणी की है कि 'आपका कर्तव्य है कि आप राहत के न्यूनतम पैमाने बताएं। ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है जिससे पता चले कि कोविड पीड़ितों के लिए आपने ऐसी राहत या मुआवजे की कोई गाइडलाइन जारी की हो। आप अपना वैधानिक कर्तव्य निभाने में विफल रहे हैं।' कोर्ट ने एनडीएमए एक्ट की धारा-12 का जिक्र करते हुए कहा कि आपदा में मृत्यु पर मुआवजा दिए जाने का प्रावधान किया गया है जिसे पूरा करना सरकार का दायित्व है।

शीर्ष अदालत ने तीन अहम निर्देश देकर सरकार के किसी प्रकार के बहाने की संभावना को भी खारिज कर दिया है। पहला, कोरोना से मौत होने पर डेथ सर्टिफिकेट जारी करने की व्यवस्था सरल हो। अधिकारी इसके लिए गाइडलाइन जारी करें। दूसरा, जैसा कि वित्त आयोग ने प्रस्ताव दिया था, उसके आधार पर केंद्र उस व्यक्ति के परिवार के लिए इंश्योरेंस स्कीम बनाए, जिसकी जान आपदा में चली गई। तीसरा, एनडीएमए राहत के न्यूनतम मानकों को ध्यान में रखते हुए कोविड मृतकों के परिवारों के लिए गाइडलाइन 6 हफ्तों के भीतर जारी करे। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें कोरोना से हुई मौत से प्रभावित परिवार को चार लाख रुपये मुआवजा देने के लिए केंद्र सरकार को आदेश देने की अपील की गई थी। इस पर केंद्र ने पहले संसाधन के अभाव का रोना रोया था और बाद में केंद्र ने कोरोना पीड़ितों के परिवारों को चार लाख रुपये मुआवजा संबंधी याचिकाओं का विरोध किया था।

केंद्र सरकार ने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उसके साथ 'राजकोषीय सामर्थ्य का कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन राष्ट्र के संसाधनों का तर्कसंगत, विवेकपूर्ण और सर्वोत्तम उपयोग करने के मद्देनजर कोविड से जान गंवाने वालों के परिवारों को चार लाख की अनुग्रह राशि प्रदान नहीं की जा सकती।' सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार के लिए लचीला रुख भी अपनाया है। कोर्ट ने कहा 'किसी भी देश के पास अपार संसाधन नहीं होते। मुआवजे जैसी चीज हालात और तथ्यों पर आधारित होती है। ऐसे में ये सही नहीं है कि हम केंद्र को निर्देश दें कि मुआवजे के लिए इतनी रकम तय कर दी जाए। ये रकम केंद्र को ही तय करनी होगी। आखिरकार प्राथमिकताएं केंद्र ही तय करता है।' दरअसल, संवैधानिक दायित्व के तहत केंद्र सरकार अपनी जन कल्याणकारी भूमिका से भाग नहीं सकती।

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