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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : आपदा में मजबूत आधार बना परिवार

कोरोना संकट ने परिवार की अहमियत को और रेखांकित किया है। बीते कुछ बरसों से नई पीढ़ी भी परिवार का महत्व समझने लगी है, पर इस आपदा ने तो हर आयु वर्ग के लोगों को अपनों से गहराई से जोड़ दिया है। देखने में आया है कि कोरोना काल में अपने परिवार के साथ रहने वालों के बीच संबंधों में दूरियां नहीं बल्कि नजदीकियां बढ़ी हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट इंदौर के अध्ययन के अनुसार भी कोरोना आपदा के दौर में परिवारजनों द्वारा एक साथ समय बिताने और हंसने-मुस्कुराने से कोविड का तनाव तो कम हुआ ही, परिवार में एक-दूसरे के प्रति विश्वास भी और बढ़ा है।

डॉ. मोनिका शर्मा  का लेख : आपदा में मजबूत आधार बना परिवार
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डॉ. मोनिका शर्मा

डॉ. मोनिका शर्मा

बात चाहे कोरोना संक्रमण पर जीत हासिल करने वालों के मनोबल की हो या इस त्रासदी से मोर्चा लेने फ्रंटलाइन कोरोना वॉरियर्स की हिम्मत के आधार की। सजगता और स्वास्थ्य की उचित देखभाल से अब तक संक्रमण के खतरे से सुरक्षित लोगों की हो या मानवीय आपदा की जंग लड़ रहे सकारात्मक परिवेश बनाये रखने की। अनिश्चितता, भय और भ्रम से भरे बीते डेढ़ वर्ष में हमारी पारिवारिक व्यवस्था ऐसे हर विचार, हर व्यवहार का आधार बनी, जो संकटकाल में संकटमोचक बन सका। सामाजिक सुरक्षा, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संबल, हर पहलू पर परिवार की भूमिका अहम साबित हुई। जीवन सहेजने से लेकर मन की ऊर्जा बनाए रखने तक, परिवार हमें थामने वाली मजबूत बुनियाद बना। यही वजह है कि कोरोना संकट के दौर में परिवार का महत्व मन से समझा गया| यूं भी 'वसुधैव कुटम्बकम' की संस्कृति वाले हमारे देश में परिवार को वैश्विक समुदाय का लघु रूप ही कहा जाता है। एक ऐसी इकाई जो स्नेह और सहभागिता की मानवीय समझ को पोषित करने वाला परिवेश बनाती है। सामुदायिक जुड़ाव की नींव पुख्ता करती है। ऐसे में कोविड-19 की विपत्ति ने हमारे देश को नहीं पूरी दुनिया को इसी मानवीय समझ और सामुदायिक सरोकारों की सोच की ओर मोड़ा है |

भारत की सामाजिक व्यवस्था में परिवार की जगह हमेशा से ही अहम रही है। यही वजह है कि संसार भर को अपना परिवार मानने का विचार भी भारतीय संस्कृति के मूल संस्कारों में शामिल है, जिसमें जुड़ाव और मेल जोल का भाव सबसे ऊपर है। हालांकि कोरोना काल में फिजिकल डिस्टेंसिंग के चलते सामाजिक मेलजोल से दूरी जीवन बचाने के लिए जरूरी रही पर तकनीक और मन के मेल ने अपनेपन की संवेदनाओं को सूखने नहीं दिया। आज की डिजिटल जीवन शैली पारिवारिक रिश्तों के तानेबाने को सहेजने में बहुत मददगार बनी। गौरतलब है कि इस साल अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस का विषय भी 'परिवार और नई तकनीकें' ही है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा हर साल तय किए जाने वाले विषय के अंतर्गत आगामी वर्ष में इस विशेष दिन से जुड़ीं समस्याओं पर प्रकाश डाला जाएगा जो पारिवारिक व्यवस्था से जुड़े कई पहलुओं को पारिभाषित करने में मददगार साबित होगा। गौरतलब है कि नई चुनौतियों और परिस्थितियों के आधार पर हर वर्ष परिवार दिवस का विषय बदलता है। इस संबंध में वर्ष 2021 में संयुक्त राष्ट्र ने हमारे परिवारों के महत्व को रेखांकित करने के लिए विशेष रूप से नई प्रौद्योगिकियों और कोरोना महामारी के दौर में सहायक बनी प्रौद्योगिकी के विभिन्न पहलुओं पर विमर्श को प्राथमिकता दी है। इस विषय के जरिये संयुक्त राष्ट्र ने परिवारों के विकास में आये ठहराव की फिर से कल्पना कर यह रेखांकित करने का प्रयास किया है कि ऐसी स्थिति पूरी सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करती है। हमें समझना होगा कि परिवार ही है, जो पीड़ा के दौर में सहायक बनता है। हमारे दर्द को शांत करता है। तकलीफदेह दौर में हमें कमजोर नहीं पड़ने देता, जिसका सीधा सा अर्थ है कि परिवार सामाजिक, और व्यक्तिगत आशंकाओं को दूर करने वाली व्यवस्था है। आर्थिक समस्या का साथी और सुख ही नहीं नहीं संकट में सहयोग करने वाला आधार है।

व्यापक रूप से देखें तो कोरोना विपदा के दौर में परिवार के साथ ने कई मुश्किलों को आसान किया। आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परेशानियों के माहौल में जहां प्रवासी श्रमिक परिवार के पास गांव-कस्बे लौटे, वहीं विदेशों में बसे भारतीयों ने भी अपनों के पास, अपने वतन आने की राह पकड़ी। कुछ वर्ष पहले हुए हेल्प एज इंडिया के एक सर्वे के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत भारतीय परिवार संयुक्त परिवार की तरह रह रहे हैं और संस्कृति और संबंध दोनों को सहेजने का काम कर रहे हैं। तमाम दुनियावी बदलावों के बावजूद यह वह कड़ी है, जो नई पीढ़ी को भी समाज से जोड़े रख रही है| इसी जुड़ाव का असर कोरोना काल में भी उन युवाओं के व्यवहार में दिखा जो सामुदायिक सेवाओं के लिए आगे आये। अपनों का ही नहीं परायों का भी सहारा बने। इतना ही नहीं परिवार के साथ ने इस त्रासद समय में भी लोगों को अवसाद, अकेलेपन और तनाव से बचाया। जामिया मिलिया इस्लामिया की राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई द्वारा बीते साल 'कोरोना वायरस का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव' विषय पर किए गए अध्ययन में लॉकडाउन में परिवार और अपनों के साथ रहने को लेकर 52 फीसदी लोगों ने खुशी जताई थी। यकीनन, आइसोलेशन और सोशल डिस्टेंसिंग के बावजूद देश भर के परिवारों के छोटे-बड़े सदस्य साथ और सहयोग के बल पर कोविड-19 की विपदा से पूरी हिम्मत से जूझे और जूझ रहे हैं। अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी के एक हालिया अधययन में 27 देशों से शामिल प्रतिभागियों ने बताया कि अपने परिवार की देखभाल करना और समय बिताना सबसे ज्यादा ख़ुशी देता है। दुनिया के हर हिस्से के बाशिंदों के साथ भारत में भी महामारी में अपनों के साथ और संबल ने जीवन सहेजने का काम किया है। यह बात फिर पुख्ता हुई है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, अपनों का साथ हर उम्र के लोगों को हिम्मत देता है।

निस्संदेह , कोरोना संकट ने परिवार की अहमियत को और रेखांकित किया है। बीते कुछ बरसों से नई पीढ़ी भी परिवार का महत्व समझने लगी है, पर इस आपदा ने तो हर आयु वर्ग के लोगों को अपनों से गहराई से जोड़ दिया है। एक मैट्रोमोनियल साइट के सर्वे की मानें, तो आज के युवा भी अपनों के साथ रहना और सबके साथ मिलकर अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं। न्यूयाॅर्क के कॉर्नेल विश्वविद्यालय में भारत में आधुनिकीकरण और घरेलू बदलावों पर हुए अध्ययन के अनुसार, हमारे देश में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा है। आज भी लोग संयुक्त परिवारों में रहना पसंद कर रहे हैं। देखने में आया है कि कोरोना काल में अपने परिवार के साथ रहने वालों के बीच संबंधों में दूरियां नहीं बल्कि नजदीकियां बढ़ी हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट इंदौर के अध्ययन के अनुसार भी कोरोना आपदा के दौर में परिवारजनों द्वारा एक साथ समय बिताने और हंसने-मुस्कुराने से कोविड का तनाव तो कम हुआ ही, परिवार में एक-दूसरे के प्रति विश्वास भी और बढ़ा है। कोरोना महामारी ने दुनिया के हर हिस्से में बसे हर उम्र, हर तबके के लोगों को एक साथ कई सकारात्मक सबक सिखाए हैं। इस फेहरिस्त में परिवार की अहमियत का पाठ सबसे ऊपर है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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