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तुर्की में तख्तापलट की नाकामी जनता की जीत

95 फीसदी शिक्षित आबादी वाले देश तुर्की की जनता ने दुनिया के सैन्य शासकों व सेना प्रमुखों को दिया कड़ा संदेश

तुर्की में तख्तापलट की नाकामी जनता की जीत

तुर्की की जनता ने बागी सैनिकों के तख्तापलट के मंसूबे को चकनाचूर कर लोकतंत्र को बचा लिया है। इस समय दुनिया में सबसे भरोसेमंद शासन प्रणाली लोकतंत्र को ही कहा जा सकता है। करीब आठ करोड़ की आबादी वाले देश तुर्की में जनता ने जिस अदम्य साहस से केवल पांच घंटे में ही हथियारों और तोपों से लैस सत्ता पर कब्जा करने के लिए आतुर 3000 से अधिक सैनिकों को धराशायी करते हुए सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया, वह निश्चित ही लोकतंत्र की बड़ी जीत है। 95 फीसदी शिक्षित आबादी वाले देश तुर्की की जनता ने दुनिया के सैन्य शासकों व सेना प्रमुखों को भी कड़ा संदेश दिया है कि केवल बंदूकों के बल पर कोई भी उन पर शासन नहीं थोप सकता है।

वहां की जनएकजुटता दुनिया के शेष भूभाग की जनता के लिए भी मिसाल बनी है कि यदि वह एक हो जाए तो अपने-अपने देश में बड़े बदलाव ला सकती है। पाकिस्तान में भी लोकतंत्र की हत्याकर सैन्य तख्तापलट की सुगबुगाहट है। पीएम नवाज शरीफ सरकार को भी सावधान रहने की जरूरत है। यूरोप महादेश के इस देश में पिछले 56 साल में तीन बार तख्तापलट की सफल कोशिश हो चुकी है। इस्लामिक एक्टिविटीज बढ़ने पर 27 मई 1960 को सेना प्रमुख कमाल गुर्शेल ने तख्तापलट कर दिया था। 1966 तक देश में आर्मी का रूल रहा। उसके बाद 12 मार्च 1970 को जब तुर्की के आर्थिक हालात बिगड़े, मिलिटरी जनरल ममदुल तगमाक ने पीएम सुलेमान दिमेरल को ऑर्डर देना शुरू कर दिया। 1971 में दिमेरल को इस्तीफा देना पड़ा था।
हालांकि सेना ने सीधे सत्ता हाथ में नहीं ली, लेकिन 1973 तक सरकार पर नजर रखती रही। इसके बाद भी जब आर्थिक हालात नहीं सुधरे तो 12 सितंबर 1980 को सेना ने सभी काम अपने हाथ में ले लिए। 1982 में जनमत संग्रह के बाद देश में नया संविधान बना। 27 फरवरी 1997 को भी सेना ने तुर्की की राजनीति में इस्लामी सोच के हावी होने पर बड़ी चिंता जताई थी। उस वक्त सुलेमान दिमेरल ही तुर्की के राष्ट्रपति थे। इस तरह देखें तो सेना ने सत्ता में तभी हस्तक्षेप किया है, जब देश में सरकार इस्लामिक कट्टर सोच को बढ़ावा देती नजर आई। दरअसल, मुस्लिम बहुल होते हुए भी तुर्की को राजनीतिक व सांस्कृतिक रूप से प्रगतिशील, सेकुलर और बहुलतावादी देश माना जाता है।
वहां की सेना पूरी तरह सेकुलर व डेमोक्रेसी को सर्मपित रही है और इस्लामिक सोच की विरोधी रही है। सेना के सेक्युलर होने के पीछे तुर्की के महान नेता रहे मोहम्मद कमाल पासा की अपने देश को लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील बनाने की दृष्टि है। पासा ने तुर्की को कट्टरपंथ और मजहबी सोच से बाहर निकाला था और वहां सेकुलर सोच से लैस लोकतंत्र की स्थापना की थी। वर्तमान में 2002 से सत्ताशीन एके पार्टी के राष्ट्रपति रैचेप तैयाप एदरेआन पर इस्लामिक सोच को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। उनके शासनकाल में आवाम का झुकाव इस्लाम की ओर अधिक बढ़ा है। 2002 से पहले तुर्की के मदरसों में तालिम लेने वाले छात्रों की संख्या 65 हजार थी, अब बढ़कर 10 लाख हो गई है।
एदरेआन ने तुर्की में फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशन पर भी बंदिशें लगा रखी हैं। इसके चलते सेना का एक बड़ा समूह अपने राष्ट्रपति से खुश नहीं है। राष्ट्रपति एदरेआन ने स्वनिर्वासित तुर्की धर्मगुरु फेतुल्लाह गुलेन पर तख्तापलट कराने का आरोप मढ़ा है, लेकिन गुलेन ने इससे इनकार किया है। गुलेन प्रगतिशील इस्लाम के साथ डेमोक्रेसी, शिक्षा व साइंस को सपोर्ट करते हैं। असल वजह जो भी हो, लेकिन लोकतंत्र में नाखुशी जाहिर करने का तरीका तख्तापलट नहीं हो सकता है। लोकतंत्रिक तरीके से ही देश व समाज में बदलाव लाए जा सकते हैं और विरोध भी लोकतंत्रिक तरीके से ही किया जाना चाहिए। तुर्की के असंतुष्ट सैनिकों को भी तख्तापलट की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। लोकतंत्र में यह जायज नहीं है और यह निंदनीय है।
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