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आलोक पुराणिक का लेख : आमने-सामने भी और साथ भी

चीन की आर्थिक शक्तियों के परिणाम यह भी हैं कि भारत में तमाम कोशिशों के बावजूद से दस में करीब सात स्मार्टफोन चीन के ही हैं और भारत के प्रतिष्ठित क्रिकेट टूर्नामेंट आईपीएल से भी चीन का फोन ब्रांड वाइवो अब भी जुड़ा ही हुआ है। यानी चीन की आर्थिक हैसियत उसके सस्ते उत्पादों की भारत में मांग को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है।

आलोक पुराणिक का लेख : आमने-सामने भी और साथ भी
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आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

हाल में आयोजित क्वाड सम्मेलन के बारे में मोटे तौर पर यही माना जा रहा है कि यह चीन की विस्तारवादी आकांक्षाओं के खिलाफ एक तरह से रोक का काम काम कर सकता है। विस्तारवादी चीन पर नियंत्रण सिर्फ भारत के ही हित में नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के हित में हैं। चीन ऐसी ताकत के तौर पर उभर चुका है, जहां सत्ता नियंत्रण लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं, तानाशाही तरीकों से होता है। छोटे देशों में तानाशाही चलती है, पर उसके उतने वैश्विक परिणाम नहीं होते। चीन जैसा बड़ा देश अब ग्लोबल ताकत है, इसलिए इससे जुड़े सत्ता विमर्श में पूरी दुनिया की दिलचस्पी होना स्वाभाविक है। क्वाड का फोकस तो मूलत राजनीतिक औऱ रणनीतिक रहा है, पर भारत और चीन का अंतर्संबंध बहुत सारे स्तरों पर है। यह बराबर साफ होता रहा है कि भारत और चीन के बीच संबंध एक तरफ से नकारात्मक नहीं माने जा सकते और न ही उन्हें पूरे तौर पर सामान्य माना जा सकता है। कुल मिलाकर भारत-चीन के बीच के संबंध विशिष्ट संबंध हैं। जिन्हें बहुत ही कुशलता से संचालित किए जाने की जरूरत है। क्योंकि चीन के साथ ऱहना भारत के हित में है कई मामलों में पर चीन का प्रखर विरोध भारत के हित में हैं, इसलिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्वाड के मोर्चे पर होते हैं तो उनके कहे का आशय हो सकता है कि चीन के खिलाफ लोकतांत्रिक पद्धति के देशों का मोर्चा है क्वाड, पर चीन की आर्थिक शक्तियों के परिणाम यह भी हैं कि भारत में तमाम कोशिशों के बावजूद से दस में करीब सात स्मार्टफोन चीन के ही हैं। यानी चीन की आर्थिक हैसियत उसके सस्ते उत्पादों की भारत में मांग को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। क्वाड के बाद ब्रिक्स सम्मेलन में भारत और चीन का रुख क्या रहता है, यह भी देखना होगा।

ब्रिक्स पेंच व चुनौतियां

ब्रिक्स के घटक राष्ट्र ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। इन्हीं देशों के अंग्रेज़ी में नाम के प्रथमाक्षरों से मिलकर इस समूह का ब्रिक्स नामकरण हुआ है। इसकी स्थापना 2009 में हुई,और इसके 5 सदस्य देश है। रूस को छोड़कर ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। ये राष्ट्र क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। पांचों ब्रिक्स राष्ट्र दुनिया की लगभग 42 % आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं ब्रिक्स देशों का वैश्विक जीडीपी में 20 प्रतिशत का योगदान है। विश्व व्यापार के लगभग 18% हिस्से में महत्वपूर्ण भूमि है ब्रिक्स की। 2021 के ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की भूमिका अगुआ की रहने वाली है। संभव है कि चीनी राष्ट्रपति शी इस सम्मेलन में भाग लेने भारत आएं।

चीन बनाम भारत

चीन और भारत के बीच कड़ी प्रतियोगिता है, विवाद हैं। 2020 में राष्ट्रीय सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में चीन के कई मोबाइल एप्लीकेशनों पर बंदिश लगाई गई थी। भारत में चीनी उत्पादों का प्रभुत्व कम करने की कोशिश चल रही है, पर चीन के सस्ते और भारत में लोकप्रिय उत्पादों को पीटना आसान साबित नहीं हो रहा है। हाल में भारत में चीनी कारें भी बहुत लोकप्रिय हो रही हैं। कोई न कोई चीनी कंपनी भारत में अपने नए मोबाइल फोन लांच करती हुई दिख ही जाती है। भारत में सस्ती कीमत वाले गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार करने की क्षमता अभी पूरे तौर पर विकसित नहीं है।

प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव यानी पीएलआई योजना ऐसी ही है। इसमें कई क्षेत्र हैं-आटोमोबाइल, बैट्री, फार्मा, टेलीकाॅम, फूड प्रोडक्ट, टैक्सटाइल, स्पेशलिटी स्टील, व्हाइट गुड्स-फ्रिज, वाशिंग मशीन आदि, इलेक्ट्रानिक साज-सामान, सोलर सेल। गौरतलब है कि उसंप्रो राशि बतौर नकदी दी जाती है। मोबाइल फोन निर्माण के लिए इस तरह की योजना सरकार पहले ही ला चुकी है, जिसकी स्वीकार्यता ने केंद्र सरकार को प्रेरित किया कि दूसरे क्षेत्रों तक इसे विस्तारित किया जाए। आटोमोबाइल उद्योग में घरेलू स्तर पर उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाना बहुत जरूरी है, क्योंकि भारत एक बड़ा घरेलू बाजार भी है आटोमोबाइल उद्योग के लिए और यहां निर्यात भी बहुत बड़ी तादाद में किया जा सकता है। कुल मिलाकर चीन के मुकाबले अगर भारत को मैन्युफेक्चरिंग हब या विनिर्माण केंद्र बनना है, तो इस तरह के प्रोत्साहन प्रयास बहुत जरूरी हैं, मेक इन इंडिया की दिशा में बढ़ने के लिए ये प्रयास जरूरी हैं, पर इतना भर करके रुक नहीं जाना है। प्रोत्साहन राशि का अपना महत्व है, पर महत्व इस बात का भी है कि किस तरह से जमीनी स्तर पर तमाम विदेशी और देशी निवेश के आवेदन मंजूर होते हैं। खासकर विदेशी निवेशकों के लिए भारत में कारोबार करना बहुत आसान नहीं रहा है। यूं विश्व बैंक द्वारा तैयार कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत लगातार प्रगति कर रहा है, पर भारत में ऐसी आसानी नहीं है कि कोई विदेशी निवेशक एकाध हफ्ते में ही कामकाज शुरू कर सके। गौरतलब है कि चीन ने ऐसी सुगमता बहुत पहले ही चीन में सुनिश्चित करा दी है, इसलिए चीन दुनियाभर में विनिर्माण का केंद्र बन गया है।

बड़े निवेशक खासतौर पर आटोमोबाइल उद्योग में निवेशक बड़ी निवेश राशि लेकर आते हैं, वह त्वरित कार्रवाई चाहते हैं। जमीनी स्तर पर मनोवांछित जगह जमीन मंजूरियां उन्हें हासिल हों, यह सुनिश्चित कराना सिर्फ केंद्र सरकार के हाथ में नहीं हैं, राज्य सरकारों की भी एक भूमिका है। उसंप्रो निश्चित तौर पर जरूरी योजना है, पर इतना भर काफी नहीं है। देश को विनिर्माण का केंद्र बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। यानी चीन से मुकाबले के लिए भी तैयारियां तो दिख रही हैं, पर उनका जमीनी स्तर पर परिणाम आने में समय लगेगा। मूल बात यह है कि चीन के आर्थिक क्षेत्र में सिर्फ बंदिशों से नहीं हराया जा सकता। ग्लोबल नियम कानूनों को मानते हुए ही चीन पर बंदिशें लगाई जा सकती हैं। चीन से आर्थिक क्षेत्र में तब ही मुकाबला संभव है जब कोई भारतीय कंपनी चीन की टक्कर के मोबाइल चीन से सस्ते भावों में पेश करे। इसके लिए सिर्फ भावनात्मक नारों की नहीं जमीनी होमवर्क की जरूरत होती है।

भारत चीन साथ-साथ

दो देशों के बीच के संबंध एक सीधी लाइन में नहीं चलते, इसलिए कई मंचों पर भारत-चीन को साथ-साथ होना पड़ता है। विश्व व्यापार संगठन में भारत कई मसलों पर भारत और चीन की चिंताएं एक जैसी हैं तो कुल मिलाकर चीन के साथ आर्थिक संबंध बहुत चुनौतीपूर्ण हैं। आमने सामने और साथ-साथ होना दोनों ही स्थितियों को साधना पड़ेगा।

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