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इच्छामृत्यु के सवाल पर व्यापक बहस शुरू

इच्छामृत्यु के सवाल पर व्यापक बहस शुरू

इच्छामृत्यु के सवाल पर व्यापक बहस शुरू
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नई दिल्‍ली. सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु (यूथेनेसिया) को कानूनी दर्जा दिए जाने की मांग के मुद्दे को संवैधानिक बेंच को सौंप है। इस मामले में कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई थी। जिसमें कहा गया है कि लाइलाज बीमारी से पीड़ित शख्स को मेडिकल उपकरणों की सहायता से जिंदा रखने की बजाय उसे इच्छामृत्यु दी जानी चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई है कि जब डॉक्टर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हों कि बीमार शख्स ऐसे स्टेज पर पहुंच चुका है कि उसके बचने की संभावना नहीं है तो उसको लाइफ सेविंग उपकरणों की मदद लेने से इनकार करने का अधिकार होना चाहिए।

हालांकि केंद्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि इच्छामृत्यु आत्महत्या के समान होगा और भारत में इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। हालांकि अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट किस निष्कर्ष पर पहुंचता है, लेकिन इसके साथ ही देश में इच्छामृत्यु के सवाल पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। यह अहम कानूनी मसला होने के साथ-साथ इससे मेडिकल और सामाजिक पहलू भी जुड़े हैं, इसलिए इस पर गहन विचार-विर्मश और स्पष्टता जरूरी है। भारत में इच्छामृत्यु और दया मृत्यु दोनों ही अवैधानिक हैं। सुप्रीम कोर्ट में पूर्व में यह दलील दी जा चुकी हैकि जीने का अधिकार है तो मरने का भी अधिकार होना चाहिए, लेकिन कोर्ट ने साफ किया है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में इच्छामृत्यु का अधिकार शामिल नहीं है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सालों से हॉस्पिटल में बेसुध पड़ी अरुणा रामचंद्र शानबाग की इच्छामृत्यु की याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन इस मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए कुछ शतरें के साथ पैसिव यूथेनेसिया यानी इच्छामृत्यु को मंजूरी दी है पर अभी भी इस पर व्यापक स्पष्टता की दरकार है। इससे जुड़े कानूनी और सामाजिक पहलुओं को नए सिरे परिभाषित करने की भी जरूरत है। वैसे मरणासन्न मरीज जिनकी हालत में सुधार की कोई गुंजाइश न हो और सिर्फ लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने भर से उनकी मौत हो जाए, पैसिव यूथेनेसिया की र्शेणी में आते हैं। दरअसल, इच्छामृत्यु पर अभी देश में कोई कानून नहीं है, इसलिए जब तक संसद कानून नहीं बनाती है तब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला मान्य रहेगा।

हालांकि भारतीय विधि आयोग ने संसद को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में दया मृत्यु को कानूनी जामा पहनाने की सिफारिश की है परंतुआयोग ने यह भी माना है कि इस पर लंबी बहस की गुंजाइश अभी बाकी है। वहीं यदि इससे संबंधित कोई कानून बनता है तो इसके दुरुपयोग की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

भारत में किडनी आदि के प्रत्यारोपण को लेकर कानून की आड़ में अवैध धंधा किया जाता है। चिकित्सकीय नीतिशास्त्र में कहा गया है डॉक्टर मरीज को तब तक जीवित रखने की कोशिश करें जब तक संभव है। वहीं भारतीय संस्कृति में प्रत्येक दशा में जीवन रक्षा करने का आदेश समाहित है। जिंदगी से पलायन यहां वर्जित माना जाता है। अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इसके सारे पक्षों का अवलोकन कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि उसके बाद देश को एक बेहतर व्यवस्था मिलेगी।

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