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अवधेश कुमार का लेख : शीर्ष देश बनने की उम्मीद

भारत राष्ट्र के अतीत,वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से मूल्यांकन करें तो निष्कर्ष यही आएगा कि यही भारत है, यही अंतः शक्ति है जिसके आधार पर भारत की पुनर्रचना इसे उस शिखर पर ले जाएगी जहां इसे होना चाहिए। कोरोना और उसके व्यापक दुष्प्रभावों के बावजूद अगर ये सारे कार्य देश में संपन्न हो रहे हैं तो मान कर चलना चाहिए कि भारत अपनी संस्कृति को पहचान कर उसके अनुरूप प्रखरता से गतिशील होना आरंभ कर दिया है। यह सब केवल विश्वास और धारणा के विषय नहीं है। इनके आधार पर भारत सर्वांगीण विकास करेगा। यही वह पुंज है जो भारत को आदर्श,संपूर्ण मानव समुदाय के प्रति संवेदनशील एवं एक दूसरे के लिए त्याग का व्यवहार पैदा करेगा।

अवधेश कुमार का लेख : शीर्ष देश बनने की उम्मीद
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अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

नए साल 2022 से हम क्या अपेक्षा करें? किसी भी वर्ष से अपेक्षाओं का अर्थ उसमें सत्ता, राजनीति, प्रशासन, अलग-अलग क्षेत्रों के नीति-निर्धारकों, समाज पर प्रभाव रखने वालों तथा आम लोगों से अपेक्षाएं ही हैं। हम इन सारे वर्गों से क्या अपेक्षा करते हैं यह मूलतः हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। वर्ष की शुरुआत भी कोरोना के ओमिक्रॉन वैरिएंट के डर के साये में हो रहा है, इसलिए बड़े समूह की आम अपेक्षा यही है कि लोगों की सुरक्षा इस तरह सुनिश्चित हो कि वे जीवनयापन तरीके से करते रहें। इस संदर्भ में दूसरी अपेक्षा स्वास्थ्य महकमे से है। अगर कोई कोरोना की गिरफ्त में आया तो उसके उपचार की सहज व्यवस्था हो। सामान्य तौर पर तीसरी अपेक्षा यही है कि पिछले 2 वर्षों में अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा उसकी क्षतिपूर्ति करने के साथ भारत अपनी संभावनाओं के अनुरूप विकास पर सरपट दौड़े।

वर्ष की शुरुआत में प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति यही प्रार्थना करता है। हां, भारत में ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में हैं जिनके लिए राजनीति सर्वाधिक महत्वपूर्ण और येन केन प्रकारेण अपने विरोधी के चुनाव में परास्त होने और लोकप्रिय होने या फिर उसके राजनीतिक अवसान की कामना करते हुए उसके लिए कोशिश भी करते हैं। राजनीति में रुचि रखते हुए भी अपेक्षा यही होनी चाहिए कि इस तरह के अतिवाद में रहने वालों को सद्बुद्धि आए और वे एक विचारधारा और राजनीति की लड़ाई को लोकतांत्रिक लड़ाई तक सीमित रखें और वही तक लड़े। इस वर्ष ऐसे राज्यों के चुनाव है, जहां भाजपा सत्ता में है इसलिए आपको यह परिदृश्य ज्यादा आक्रामक और असुंदर रूप में दिखेगा। आम अपेक्षाएं हैं कि राजनीति की लड़ाई राजनीति तक सीमित रहे, लेकिन भारत में जो परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं उसमें तत्काल संभव नहीं है। इससे पूरे समाज और विश्व में नकारात्मक वातावरण बनता है जिसमें हमें जीने का अभ्यास रखना ही पड़ेगा, लेकिन हर दृष्टि से राष्ट्र, विश्व और मनुष्यता का कल्याण चाहने वाले लोग निश्चित रूप से अपने-अपने स्तर पर इसकी कामना और कोशिश करेंगे कि ऐसे वातावरण को कमजोर किया जाए, तो 2022 में ऐसे लोगों से अपेक्षा होगी कि इसके समानांतर वह भारतीय राजनीति के साथ गैर राजनीतिक वैचारिक मोर्चों पर भी सकारात्मकता, स्नेह और संवेदनशीलता के माहौल के लिए हरसंभव कोशिश करें। इसमें ऐसे लोगों के खिलाफ जिनके अपने नकारात्मक एजेंडा है अगर प्रखरता से वैचारिक हमला भी करना हो तो इससे देश को लाभ ही होगा। ऐसे लोगों से 2022 में हम आप क्या अपेक्षा करेंगे यह बताने की आवश्यकता नहीं है। यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस तरह के राजनीतिक संघर्षों से संपूर्ण देश की बहुआयामी उन्नति दुष्प्रभावित होती है। किसी व्यक्ति समाज और देश की सफलता के लिए सबसे पहली शर्त सामूहिक मनोदश है। व्यक्ति के अंदर अगर आत्मविश्वास है तो वह बड़े से बड़े लक्ष्य को पा सकता है। यही बातें देश पर भी लागू होती है। सूक्ष्मता से भारत की स्थिति का विश्लेषण करें तो आपको ऐसी धारा सही आवेग और दिशा में बढ़ती हुई दिखाई पड़ेगी जो वाकई देश की प्रकृति, आत्मा और संस्कार के अनुरूप है। किसी भी देश की वास्तविक उन्नति तभी संभव है जब वह अपनी मूल प्रकृति, संस्कार और संस्कृति के साथ आगे बढ़े। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जो कुछ हमारी प्रकृति और हमारा स्वभाव नहीं है उसके अनुरूप हमें बदलने की कोशिश की जाएगी तो हम वह तो नहीं ही बनेंगे जो कुछ हम हैं वह भी पीछे छूट जाएगा। दुर्भाग्य से भारत के साथ यही हुआ। इतिहास के कालखंड में अनेक ऐसे अध्याय हैं जब भारत एक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान, अपनी संस्कृति के अनुरूप प्रखरता से खड़ा होने के लिए उठने की कोशिश की, लेकिन बार-बार धराशायी भी हुआ या जाने अनजाने किया गया।

गांधीजी ने अपने संपूर्ण जीवन में लगातार इसकी ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की। तो इसका आधार क्या हो सकता है? इन सबने कहा है कि धर्म, अध्यात्म, सभ्यता, संस्कृति यही वह आधार है जिस पर भारत दुनिया का शीर्ष देश बन सकता है और इसी कारण संपूर्ण विश्व इसे अपने लिए आदर्श और प्रेरक मानेगा। इतना ही नहीं इन सबने कहा है कि इसी में विश्व और संपूर्ण प्रकृति का कल्याण है। दुर्भाग्य से यह मूल सोच लगभग विलुप्त हो गई थी। अगर आप गहराई से देखें तो पिछले कुछ वर्षों में यह भाव अलग-अलग रूपों में प्रकट हुआ है। सत्ता ने किसी न किसी तरीके से देश के अंदर और बाहर विश्व मंच पर भी इसे घोषित करने का साहस दिखाया है। वाराणसी में काशी विश्वनाथ सहित हुए पुनरुद्धार के बारे में आपकी जो भी राय हो लेकिन यह लोगों के अंदर आत्मगौरव बोध का कारण बना है। जब आप सत्ता राजनीति के आईने से देखेंगे तो इसके नकारात्मक पहलू दिखेंगे, क्योंकि भय यह होगा कि जो पार्टी कर रही है उसे व्यापक समाज का वोट मिल जाएगा। भारत राष्ट्र के अतीत,वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से मूल्यांकन करें तो निष्कर्ष यही आएगा कि यही भारत है, यही अंतः शक्ति है जिसके आधार पर भारत की पुनर्रचना इसे उस शिखर पर ले जाएगी जहां इसे होना चाहिए। कोरोना और उसके व्यापक दुष्प्रभावों के बावजूद अगर ये सारे कार्य देश में संपन्न हो रहे हैं तो मान कर चलना चाहिए कि भारत अपनी संस्कृति को पहचान कर उसके अनुरूप प्रखरता से गतिशील होना आरंभ कर दिया है। यह सब केवल विश्वास और धारणा के विषय नहीं है। इनके आधार पर भारत सर्वांगीण विकास करेगा। यही वह पुंज है जो भारत को नैतिक, आदर्श ,संपूर्ण मानव समुदाय के प्रति संवेदनशील एवं एक दूसरे के लिए त्याग का व्यवहार पैदा करेगा। यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि पिछले 3 वर्षों में भारत ने जिस तरीके से खड़ा होने की कोशिश की है 2022 में वह सशक्त होगी। महात्मा गांधी, महर्षि अरविंद, विवेकानंद, पंडित मदन मोहन मालवीय सुभाष चंद्र बोस, डॉ राजेंद्र प्रसाद, अगर दूसरी विचारधारा में जाएं तो राम मनोहर लोहिया, पं. दीनदयाल उपाध्याय, आरएसएस के संस्थापक आदि सबने यही कहा कि अध्यात्म वह ताकत है जिसकी बदौलत भारत विश्व का शीर्ष देश बनेगा और संपूर्ण विश्व जो अनावश्यक संघर्ष तनाव, शोषण में उलझा हुआ है उसकी मुक्ति का रास्ता दिखाएगा। इसी में उसकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक प्रगति भी शामिल है। तो 2022 से हमारी अपेक्षा यही होगी कि यह धारा इतनी सशक्त हो कि फिर कोई झंझावात इसके कमजोर होने या धराशायी होने का कारण नहीं बने।

यह अपेक्षा मूर्त राष्ट्र की अवधारणा से नहीं हो सकती। कोई भी देश अपने लोगों के व्यवहार से ही लक्ष्य को प्राप्त करता है। इसलिए केवल राजनीति और धर्म ही नहीं हर क्षेत्र के लोगों वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, इतिहासकार, समाजसेवी, पुलिस, सेना, सरकारी कर्मचारी सभी इस लक्ष्य को समझकर प्राणपण से 2022 में जुटें और इस धारा को सशक्त करें। यह भारत की वास्तविक मुक्ति, प्रगति और चीरजीविता का आधार बनेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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