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योगेश कुमार गोयल का लेख: प्लाज्मा थेरेपी से उम्मीदें

कोरोना मरीजों की जान बचाने के लिए अब प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग किए जाने पर विचार किया जा रहा है। कोरोना की वैक्सीन और इस थेरेपी में सबसे बड़ा अंतर यही है कि जहां वैक्सीन लगने के बाद मरीज के शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र स्वयं एंटीबॉडीज बनाने लगता है, जिससे संक्रमण होने पर शरीर में बैक्टीरिया अथवा वायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता होती है। दूसरी ओर प्लाज्मा थेरेपी में मरीज को जो एंटीबॉडीज दी जाती हैं, वे शरीर में स्थायी तौर पर मौजूद नहीं रहती।

योगेश कुमार गोयल का लेख: प्लाज्मा थेरेपी से उम्मीदें

विश्वभर में लाखों लोगों की जान ले चुके कोरोना के कहर से लोगों को बचाने के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक वैक्सीन बनाने में जुटे हैं। कोरोना की प्रभावी वैक्सीन या टीके उपलब्ध होने में अभी काफी लंबा समय लग सकता है। यही कारण है कि कोरोना मरीजों की जान बचाने के लिए अब प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग किए जाने पर विचार किया जा रहा है। कोरोना की वैक्सीन और इस थैरेपी में सबसे बड़ा अंतर यही है कि जहां वैक्सीन लगने के बाद मरीज के शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र स्वयं एंटीबॉडीज बनाने लगता है, जिससे संक्रमण होने पर शरीर में बैक्टीरिया अथवा वायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता होती है। दूसरी ओर प्लाज्मा थेरेपी में मरीज को जो एंटीबॉडीज दी जाती हैं, वे शरीर में स्थायी तौर पर मौजूद नहीं रहती। एंटीबॉडीज प्रोटीन से बनी विशेष प्रकार की इम्यून कोशिकाएं होती हैं, जिन्हें मेडिकल भाषा में बी-लिम्फोसाइट कहा जाता है। शरीर के भीतर जब भी कोई बाहरी चीज पहुंचती है, ये तुरंत अलर्ट हो जाती हैं। शरीर में बैक्टीरिया अथवा वायरस द्वारा छोड़े जाने वाले विषाक्त पदार्थों को निष्क्रिय करने का कार्य ये एंटीबॉडीज ही करती हैं।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा इस थेरेपी के उपयोग हेतु रक्त प्लाज्मा से कोरोना मरीजों के उपचार के ट्रायल की अनुमति दे दी गई है। दिल्ली में यह प्रयोग सफल रहा है। ऐसा नहीं है कि इस थेरेपी के जरिये वायरस संक्रमित मरीजों का इलाज करने पर पहली बार विचार किया गया हो बल्कि पिछले करीब सौ वर्षों से इस पद्धति को अपनाया जाता रहा है। सबसे पहले वर्ष 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू के इलाज में अमेरिका द्वारा इस पद्धति को अपनाए जाने की जानकारी मिलती है। प्लाज्मा थेरेपी के दौरान ऐसे हाइपर इम्यून व्यक्तियों की पहचान की जाती है, जो वायरस को हराकर स्वस्थ हो चुके होते हैं और उनके श्वेत रक्त से प्लाज्मा लिया जाता है। इसी प्लाज्मा को कोन्वल्सेंट प्लाज्मा कहा जाता है। यही प्लाज्मा रोगी के शरीर में चढ़ाया जाता है, जिसके बाद वायरस संक्रमित व्यक्ति का शरीर रक्त में उस वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने लगता है। एंटीबॉडी बनने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद शरीर वायरस से लड़ने में समर्थ हो जाता है और रोगी के स्वस्थ होने की उम्मीद बढ़ जाती है।

प्लाज्मा थेरेपी इस धारणा पर कार्य करती है कि कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके मरीजों के शरीर में संक्रमण को बेअसर करने वाले प्रतिरोधी एंटीबॉडीज विकसित हो जाते हैं। इस थेरेपी में एस्पेरेसिस विधि से कोरोना से उबर चुके रोगी के शरीर से रक्त निकाला जाता है और इसी रक्त से केवल प्लाज्मा या प्लेटलेट्स निकालकर शेष बचा रक्त वापस डोनर के शरीर में चढ़ा दिया जाता है। एम्स के मेडिसन विभाग के डा. नवल विक्रम के मुताबिक प्लाज्मा थेरेपी सभी रोगियों को देने की जरूरत नहीं हैं बल्कि जिनकी तबीयत ज्यादा खराब है, यह उन्हीं को दी जाए तो ज्यादा बेहतर है।

प्लाज्मा थेरेपी के तहत डॉक्टर ऐसे मरीजों का प्लाज्मा एकत्र करते हैं, जो कोरोना वायरस का संक्रमण होने के बाद ठीक हो जाते हैं और फिर उस प्लाज्मा को उन मरीजों को चढ़ा दिया जाता है, जिनका कोरोना का इलाज चल रहा है। इससे रोगी का रोग प्रतिरोधक तंत्र इन एंटीबॉडीज की मदद से इन्हीं जैसी और एंटीबॉडीज बनाना शुरू कर सकता है। ये एंटीबॉडीज किसी भी व्यक्ति के शरीर में उस वक्त विकसित होना शुरू होती हैं, जब वायरस उनके शरीर पर हमला करता है। एक व्यक्ति के शरीर से निकालकर एक मरीज के शरीर में चढ़ाए गए प्लाज्मा के बाद मरीज के शरीर में जो रोग प्रतिरोधकता विकसित होती है, उसे ही पैसिव इम्युनिटी कहा जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना वायरस से लड़ते हुए जब कोई रोगी ठीक हो जाता है, उसके बाद भी उसके शरीर में रक्त के अंदर ये एंटीबॉडीज लंबे समय तक प्रवाहित होते रहते हैं, जिससे उसका शरीर इस वायरस को तुरंत पहचानकर उससे लड़ने के लिए हर पल तैयार रहता है। दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब इस दिशा में प्रयासरत हैं ताकि कोरोना से जंग जीत चुके मरीजों के शरीर में बनने वाले एंटीबॉडीज की मदद से इस बीमारी से संक्रमित हो रहे नए मरीजों का इलाज संभव किया जा सके।

ऐसा नहीं है कि इस थेरेपी का इस्तेमाल करना बेहद आसान है। वास्तव में इसमें बहुत सारी चुनौतियां मौजूद हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि प्रयोग के हिसाब से रक्त प्लाज्मा का इस्तेमाल सही है, लेकिन इसके लिए मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होनी आवश्यक है और डॉक्टरों के सामने कोरोना संक्रमित रोगी की रोग प्रतिरोधकता बढ़ाने की बड़ी चुनौती रहती है। सबसे बड़ी चुनौती रहती है कि संक्रमित कोरोना मरीजों की बढ़ती संख्या के हिसाब से कोरोना से जंग जीतने वाले व्यक्तियों के रक्त से पर्याप्त मात्रा में प्लाज्मा एकत्रित करना। विश्व स्वास्थ्य संगठन के हैल्थ इमरजेंसी प्रोग्राम के प्रमुख डा. माइक रेयान के मुताबिक जब तक कोरोना के इलाज के लिए बेहतर वैक्सीन तैयार नहीं होती, इस थेरेपी का उपयोग करना ठीक है लेकिन यह हर बार सफल ही हो, यह जरूरी नहीं। इस थैरेपी के इस्तेमाल से बड़ी उम्र वाले तथा उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी बीमारियों से जूझ रहे कोरोना मरीजों को ठीक करना सबसे बड़ी चुनौती है। वह कहते हैं कि यह थैरेपी वायरस को खासा नुकसान पहुंचाती है, जिससे मरीज का प्रतिरक्षा तंत्र बेहतर होता है और कोरोना वायरस से लड़ने में सक्षम हो सकता है लेकिन इसका इस्तेमाल सही समय पर किया जाना चाहिए। कुछ अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि पैसिव इम्युनिटी से वायरस से बहुत लंबे समय तक सुरक्षा की तो कोई गारंटी नहीं है क्योंकि शरीर ने एंटीबॉडीज खुद बनाना शुरू नहीं किया बल्कि बाहरी सेल्स की मदद से यह कार्य किया गया। उनके मुताबिक ऐसी रोग प्रतिरोेधकता व्यक्ति के शरीर में कुछ महीनों तक ही रह सकती है।



कुछ अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि यह थेरेपी इसलिए ज्यादा कारगर हो सकती है क्योंकि यह वायरस शरीर के अंगों पर धावा बोलकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है और ऐसे में एंटीबॉडीज के जरिये इस संक्रमण को रोका जा सकता है। प्लाज्मा थेरेपी ज्यादा खतरे वाले रोगियों को ही दी जाती है। बहरहाल, शोधकर्ताओं के लिए प्लाज्मा थैरेपी के जरिये कोरोना मरीजों की जान बचाना बड़ी चुनौती है और अगर उन्हें सफलता मिलती है तो उम्मीद जताई जा सकती है कि यह 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के उन कोरोना मरीजों के लिए संजीवनी साबित होगी, जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है। यदि ऐसा हुआ तो कोरोना के खिलाफ चल रही वैश्विक जंग में यह निश्चित रूप से बहुत बड़ी जीत होगी।

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