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प्रभात कुमार रॉय का लेख : विस्तारवादी नीति को छोड़ना होगा

शी जिनपिंग ने एकता, विकास और मज़बूती पर बड़ा जोर दिया और कहा कि समाजवादी चीन दुनिया के सामने आज तनकर खड़ा है, किंतु यक्षप्रश्न है कि शी जिनपिंग का यह किस तरह का समाजवादी चीन है, जो आर्थिक और समाजवाद के अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व के सिद्धांतों को दरकिनार करके आक्रामक विस्तारवाद को प्रमुख रणनीति बनाए हुए है। पाकिस्तान की अंध हिमायत में इस्लामिक ज़ेहाद पर दोहरी रणनीति अख्तियार करता है। चीनी हुकूमत ने हाफिज सईद को ग्लोब्ल आतंकवादी घोषित करने के विरुद्ध चार दफा वीटो अंजाम दिया। चीन में समाजवाद के स्वप्न को साकार करना है तो अपनी विस्तारवादी फितरत को पूरी तरह से त्यागना होगा।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : विस्तारवादी नीति को छोड़ना होगा
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के सौ वर्ष संपूर्ण हो जाने के उपलक्ष्य में चीन की राजधानी बीजिंग के थ्याननमेन चौक पर भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति का भरपूर प्रदर्शन किया। स्थापना समारोह को संबोधित करते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि चीन को डराने धमकाने की हिमाक़त करने वाले को एक करोड़ चालीस लाख चीनियों की फौलादी दीवार से टकराना होगा। शी जिनपिंन ने यह भी कहा कि चीन अब किसी से दबेगा, डरेगा नहीं। चीन अब किसी भी विदेशी ताक़त को यह इजाज़त भी नहीं देगा कि वो चीन को आंखें दिखाए, दबाव बनाए और अपने और आधीन करने की कोशिश करे। विश्व पटल पर चीन एक महाशक्ति के तौर पर उभरा। 1990 में सोवियत संघ के पराभव के तत्पश्चात विश्व में अमेरिका एक ध्रुवीय शक्ति बनकर उभरा, किंतु अब पुनः दुनिया में महाशक्तियों के विशिष्ट दो ध्रुवों में विभाजित है। महाशक्ति का एक ध्रुव अमेरिका तो दूसरा महाशक्ति ध्रुव चीन है। विश्व की एक महाशक्ति बन चुके, चीन के राष्ट्रपति को ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना कतई शोभा नहीं देता। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दक्षिण चीन सागर में विस्तारवादी रणनीति के प्रणेता हैं। चीन की कम्युनिस्ट सरकार भारत सहित अपने पड़ोसी 18 देशों के साथ सीमा विवाद में उलझी हुई है। चीन की हुकूमत ताइवान को सैन्य बलबूते पर हड़पना चाहती है। चीन वस्तुतः ब्रिटेन के साथ की गई अंतरराष्ट्रीय संधि की धज्जियां उड़ाकर हॉन्गकॉन्ग में जनतांत्रिक आंदोलन को कुचल डालने पर आमादा है।

कम्युनिस्ट पार्टी ने 1949 में जब कामरेड माओ के नेतृत्व में सत्ता संभाली थी, उस वक्त चीन एक बेहद गरीब और पिछड़ा हुआ देश हुआ करता था। 1927 में शंघाई से प्रारम्भ हुई चीन की कम्युनिस्ट क्रांति में तकरीबन एक करोड़ चीनी कुर्बान हुए। 1934 में कामरेड माओ के नेतृत्व में अंजाम दिए गए लाल फौज के लॉन्ग मार्च और जापान के साम्राज्यवादी आक्रमण के प्रबल प्रतिरोध ने कम्युनिस्टों को अंततः चीन की राजसत्ता पर आसीन करा दिया। चीन की राजसत्ता पर आधिपत्य स्थापित करने में कम्युनिस्टों को साम्यवाद से कहीं अधिक राष्ट्रवाद ने संबल प्रदान किया था। कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाह सत्ता का नेतृत्व करते हुए कामरेड माओ ने साम्यवादी तेवरों की अपेक्षा राष्ट्रवादी तरीके को अधिक अपनाया। चेयरमैन माओ ने 1959 में तेज आर्थिक प्रगति के लिए लीप फारवर्ड अर्थात लंबी छलांग की कार्यनीति को अंजाम दिया। कामरेड माओ द्वारा प्रतिपादित लंबी छलांग कार्यनीति, वस्तुतः औंधे मुंह गिरकर धराशायी हो गई। 1960-61 के भयंकर अकाल ने चीनी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी। लाखों चीनी नागरिक भूख से तड़पकर मर गए। चीनी हुकूमत की इन नाकामियों से चीनियों का ध्यान विचलित करने के लिए चेयरमैन माओ ने विस्तारवादी राष्ट्रवाद का दामन थाम लिया और सीमा विवाद के कारण भारत पर 1962 में सैन्य आक्रमण कर दिया। चीनी हुकूमत ने 1969 में सीमा विवाद के कारण सोवियत संघ के विरुद्ध सैन्य संघर्ष किया। 1966 में कम्युनिस्ट पार्टी में अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए कामरेड माओ द्वारा सांस्कृतिक क्रांति का आग़ाज किया गया। 1976 में कामरेड माओ की मृत्यु हो गई और उनके उत्तराधिकारी बन गए डेंग श्याओ पिंग।

उल्लेखनीय है कि कामरेड माओ द्वारा सांस्कृतिक दौर में डेंग श्याओ पिंग को उपप्रधानंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया गया था। उस वक्त चाऊ एन लाई चीन के प्रधानमंत्री थे। डेंग श्याओ पिंग ने चीन में कामरेड माओ द्वारा स्थापित कठोर समाजवादी अर्थव्यवस्था को बुनियादी तौर पर बाजारपरस्त अर्थव्यवस्था में परिवर्तित कर दिखाया। चीन के आधुनिक इतिहास का यही वह प्रस्थान बिंदु है, जहां से सत्तानशीन कम्युनिस्ट पार्टी ने माओवादी समाजवाद की राह का पूर्णतः परित्याग करके, बाजारपरस्त पूंजीवाद को अंगीकृत करके, जबरदस्त आर्थिक तरक्की अंजाम दी है। विगत 44 वर्षों में चीनी सरकार ने आर्थिक उदारवाद को तो अपना लिया, किंतु राजनीतिक तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाह पकड़ को किंचित मात्र भी शिथिल नहीं होने दिया। थ्याननमेन चौक पर 1989 में लाखों विद्यार्थियों ने चीन में जनतंत्र की स्थापना के लिए विराट आंदोलन किया तो उदारवादी अर्थव्यवस्था के प्रणेता तत्कालीन कम्युनिस्ट तानाशाह डेंग श्याओ पिंग सरकार के सैन्य टैंकों द्वारा विद्यार्थियों के आंदोलन को कुचल दिया गया।

चीन में जबर्दस्त आर्थिक प्रगति के साथ-साथ समाज में आर्थिक विषमता का बोलबाला हो गया है। आर्थिक विषमता के कारण चीनी जनमानस में असंतोष बहुत अधिक बढ़ गया है। आर्थिक बाजारवाद के चलते हुए एक विशाल उच्च मध्यवर्ग का उदय तो हो गया है, किंतु मजदूरों और किसानों जिनके नाम पर कम्युनिस्ट हुकूमत कायम की गई थी, उनके आर्थिक हालत बद से बदतर हो चले हैं। जन असंतोष का दूसरा अहम कारण तानाशाह हुकूमत का राजनीतिक व्यवहार है, जिसने जनमानस को अभिव्यक्ति और राजनीतिक असहमति के अधिकार से पूर्णतः वंचित कर दिया। ऐसी प्रबल चुनौतियों से निपटने के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग को कामरेड माओ की ऐतिहासिक छवि और विस्तारवादी राष्ट्रवाद का संबल लेने के लिए विवश होना पड़ा। पार्टी के स्थापना समारोह के दौरान शी जिनपिंग ने एकता, विकास और मज़बूती पर बड़ा जोर दिया और कहा कि समाजवादी चीन दुनिया के सामने आज तनकर खड़ा है, किंतु यक्षप्रश्न है कि शी जिनपिंग का यह किस तरह का समाजवादी चीन है, जो आर्थिक और समाजवाद के अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व के सिद्धांतों को दरकिनार करके आक्रामक विस्तारवाद को प्रमुख रणनीति बनाए हुए है। पाकिस्तान की अंध हिमायत में इस्लामिक ज़ेहाद पर दोहरी रणनीति अख्तियार करता है। चीनी हुकूमत ने जैश ए मोहम्मद सरीखे आतंकवादी तंजीम के सरगना को ग्लोब्ल आतंकवादी घोषित करने के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चार दफा वीटो अंजाम दिया। चीन में समाजवाद के स्वप्न को साकार करना है तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को अपनी विस्तारवादी फितरत को पूरी तरह से त्यागना होगा। चीनी समाज में आर्थिक समृद्धि और संपन्नता के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक समानता को बाकायदा स्थापित करना होगा। नकली समाजवाद का ढोल पीटने से चीन के कथित कम्युनिस्ट नेता किसी तौर पर अपने देश में शानदार भविष्य का निर्माण नहीं कर सकेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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