Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

रवि शंकर का लेख: हालात बदलने की कवायद

गांवों में उनके लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के मकसद से केंद्र सरकार ने मनरेगा के लिए 40,000 हजार करोड़ रके अतिरिक्त बजट की घोषणा करने के साथ कुल 300 करोड़ मानव दिवस काम के पैदा किए जाने की बात कही है।

रवि शंकर का लेख: हालात बदलने की कवायद

कोरोना महामारी के चलते श्रमिकों के भारी संख्या में गांव लौटने से चिंतित सरकार ने इन प्रवासी मज़दूरों को रोज़गार देने के लिए मनरेगा को मुख्य आधार बना लिया है। गांवों में उनके लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के मकसद से केंद्र सरकार ने मनरेगा के लिए 40,000 हजार करोड़ रके अतिरिक्त बजट की घोषणा करने के साथ कुल 300 करोड़ मानव दिवस काम के पैदा किए जाने की बात कही है। क्योंकि लॉकडाउन से सबसे अधिक प्रभावित शहरी गरीब और प्रवासी श्रमिक हुए हैं।

बहरहाल, सरकार का कहना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। साथ ही इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने में मदद मिल सकेगी। इससे पहले बजट में केंद्र सरकार ने मनरेगा के लिए 61,000 करोड़ रुपये के बजट का ऐलान किया था। लेकिन अहम सवाल यह है कि जब सरकार ने मनरेगा में 61,000 करोड़ रुपये के बजट का ऐलान किया था तब सरकार ने 270 करोड़ मानव दिवस काम के सृजन करने की बात कही थी, अब 40,000 करोड़ रुपये और दिए जाने के बावजूद सिर्फ 300 करोड़ मानव दिवस सृजन पैदा किए जाने का सरकार का यह गणित समझ के परे है।

भले सरकार मनरेगा में गाँव में रहने वालों को काम देने की बात कह रही है मगर यह बजट कितने मजदूरों के लिए है? गौर करने वाली बात यह है कि जो गाँव से शहर काम के लिए जाते थे, उन प्रवासी मजदूरों का आंकड़ा सरकार के पास कभी था ही नहीं, अब जब यही प्रवासी मजदूर अपने गाँव लौट रहे हैं तो यह अतिरिक्त बजट कितने मजदूरों के लिए प्रभावी रहेगा, यह कह पाना मुश्किल है।

निश्चित रूप से मनरेगा में 40 हजार करोड़ का अतिरिक्त बजट दिया जाना सराहनीय है। क्योंकि कोरोना संकट के समय जब सभी कारखाने व उद्योग धंधे बंद हो गए व शहरों में कोई काम नहीं बचा है मजदूर शहरों से वापस गांवों की ओर लौट रहे हैं तो मनरेगा उनकी आजीविका का एक मात्र सहारा बनी है। आज मनरेगा के सहारे लाखों लोग अपना व अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं तो इन मायनों में भी कि संकट के समय मनरेगा लोगों को संबल दे रही है। यह गांव के विकास के लिए सबसे अच्छी योजना है। ऐसे में किसी सरकार को मनरेगा को केवल मजदूरी देने की योजना के तौर पर न देख कर बल्कि गांव के विकास योजना के तौर पर देखा जाना चाहिए।

बहरहाल, सरकार की कोशिश है कि लौट रहे प्रवासी मजदूरों को काम मिले, मगर मजदूरों को आर्थिक रूप से मजबूती और लम्बे समय तक रोजगार देने के लिए सरकार को 100 दिन रोजगार की गारंटी को बढ़ाकर 150 से 200 दिन करना चाहिए। अभी तक मनरेगा के तहत ग्रामीण लोगों को घर के पास ही साल में 100 दिन रोजगार मुहैया कराने का प्रावधान किया गया है। कुछ राज्य सरकारों ने पहले भी मनरेगा में गांव के लोगों को साल में 150 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया है। लेकिन गौर करने वाली पिछले साल देश भर में मजदूरों को औसतन 48 दिन मनरेगा में काम मिला। बड़ी समस्या यह भी है कि मजदूरों को पूरे 100 दिन काम भी नहीं मिल रहा है, इसलिए सरकार न सिर्फ बजट बढ़ाए बल्कि जमीनी स्तर पर यह भी सुनिश्चित करे कि ग्रामीण मजदूरों को ज्यादा से ज्यादा दिनों तक मनरेगा में काम मिले। इसके लिए सरकार को कम से कम 150 दिन रोजगार की गारंटी देनी चाहिए। बहरहाल, जिस मनरेगा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपीए सरकार की विफलता का जीता-जागता स्मारक बताते हुए कहा था कि आजादी के 70 साल बाद भी गड्ढा खोदने और गड्ढा भरने की योजना चलाई जा रही है, यह शर्म की बात है। उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि वह कभी भी इस स्कीम को बंद नहीं करेंगे, क्योंकि यह कांग्रेस की नाकामियों को जीता जागता सबूत है।

लेकिन समय का तकाजा देखिए अब केंद्र सरकार उसी मनरेगा पर मेहरबान है। मौजूदा सरकार का रवैया मनरेगा को लेकर क्या है, यह किसी को नहीं पता। लेकिन अच्छी बात यह होती कि सरकार, मनरेगा कार्यक्रम को और अधिक व्यावहारिक एवं पारदर्शी बनाने की कोशिश करती। मसलन किस तरह ठेकेदारों और बिचौलियों के चंगुल से श्रमिकों को मुक्त करवाया जाए और उनके श्रम का वाजिब भुगतान मिले। इस योजना के तहत होने वाले कार्यों पर कड़ी नजर रखी जाए। किस तरह से मजदूरों को ज्यादा उत्पादक कार्यों में लगाया जाए। जाहिर है, यह सब सही तरह से हो पाए तो योजना के नतीजे भी देश में बेहतर दिखाई देंगे। सरकार यदि फिर भी योजना में कुछ संशोधन या बदलाव करना चाहती है तो उसे इस विषय में आर्थिक, सामाजिक विशेषज्ञों और सीधे जनता से राय लेनी चाहिए थी। वरना, सरकार की नीयत पर सवाल उठेंगे ही। देश में मनरेगा मजदूरों की बात करें तो मनरेगा के तहत 13.62 करोड़ जॉब कार्ड धारक हैं, इनमें 8.17 करोड़ जॉब कार्ड धारक सक्रिय हैं। भारत अमीर देश होने का ढकोसला तो कर सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि उसकी असली ताकत और सम्पदा गांवों में बसती है।

Next Story
Top