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स्पेन आतंकी हमला: आतंकवाद के खात्मे के लिए एकजुट हो विश्व

अब विश्व को आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक रूप से कठोर रुख अपनाना ही होगा।

स्पेन आतंकी हमला: आतंकवाद के खात्मे के लिए एकजुट हो विश्व
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अब विश्व को आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक रूप से कठोर रुख अपनाना ही होगा। इसी के साथ विश्व को उन देशों को भी बेनकाब करना होगा, तो आतंकवाद को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर मदद करते हैं।

स्पेन में 24 घंटे में दो आतंकी हमलों से स्पष्ट है कि लगातार इस्लामिक आतंकवाद के निशाने पर रहने के बावजूद यूरोप ग्लोबल आतंकवाद के खात्मे को लेकर यथोचित गंभीर नहीं है।

पिछले साल फ्रांस में आतंकी हमले के बाद अमेरिका और फ्रांस इस्लामिक स्टेट के खात्मे के लिए सीरिया में सैन्य अभियान जरूर शुरू किया था, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ जिस वैश्विक जनमत की जरूरत थी, उसके लिए किसी ने पहल नहीं की।

पिछले दो साल में कट्टर आतंकी गुट इस्लामिक स्टेट आईएस ने यूरोप के कई देशों में हमले को अंजाम दे चुका है। फ्रांस में तीन बार, ब्रिटेन में दो बार, बेल्जियम, जर्मनी में आईएस आतंकी हमला कर चुका है।

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जुलाई 2016 में फ्रांस के नीस शहर में ट्रक ने भीड़ को कुचला था, जिसमें 86 लोगों की मौत हो गई थी और अब स्पेन में आतंक मचाकर दहशत पैदा की है। इससे पहले 2004 में अलकायदा ने स्पेन की राजधानी मैड्रिड में ट्रेन में धमाका किया था, जिसमें 191 लोगों की मौत हो गई थी।

यूरोप के प्रमुख देशों में आतंकी हमलों को देखकर यही लगता है कि आईएस ने वहां अपनी जड़ें जमाई हैं। ये आतंकी हमले यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था व खुफिया नेटवर्क की पोल भी खोलते हैं। यूरोप करीब एक दशक से आतंकवाद की चपेट में है।

भारत चालीस साल से आतंकवाद से पीड़ित है। पहले वैश्विक मंचों पर भारत जब भी आतंकवाद की बात करता था, इसके ग्लोबल चरित्र को दुनिया के सामने रखता था और इसके खिलाफ वैश्विक लड़ाई की जरूरत बताता था,

तो यूरोपीय और अमेरिकी देश इसे केवल दक्षिण एशिया की समस्या मानकर भारत की मांग और चिंता को अनदेखा करते थे, लेकिन 9/11 के बाद अमेरिका और ब्रिटेन-फ्रांस में आतंकी हमले के बाद यूरोप की सोच में बदलाव आया।

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वे आतंकवाद को वैश्विक समस्या मानने लगे हैं और आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहे हैं, लेकिन जिस तरह का खतरा है, उसके खिलाफ वैश्विक एकजुटता की जरूरत है। नरेंद्र मोदी जब से पीएम बने हैं, सभी वैश्विक मंचों पर उन्होंने आतंकवाद के खात्मे के लिए आक्रामक सामूहिक ग्लोबल प्रयासों पर बल दिया है।

अब विश्व भारत की चिंता को अहमियत देने लगा है। विश्व के लगभग सभी देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की बात करते हैं, इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र की उदासीनता खटकती है।

अब तक संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवाद की परिभाषा तक तय नहीं किए जाने से आतंकी गुटों के खिलाफ वैश्विक अभियान चलाना काफी पेचीदा है। आतंकवाद पर चीन, ईरान, कतर, तुर्की जैसे देशों का रवैया संदिग्ध है। पाकिस्तान घोषित रूप से आतंकवाद को सरकारी नीति के रूप में पाल रहा है। भारत व अफगानिस्तान पाक के आतंकवाद से पीड़ित हैं।

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यूएन को चाहिए कि वह आतंकवाद को पारिभाषित करे, आतंक को प्रश्रय देने वाले देशों को आतंकी देश घोषित करे व उनसे विश्व नाता तोड़े, आतंकवादियों को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करे और आतंकवाद के पीछे की कट्टर विचारधारा को हताेत्साहित करे।

यूरोप और अमेरिका का यूएन में अधिक प्रभाव है, इसलिए यूएन में अपेक्षित बदलाव के लिए उन्हें सामूहिक प्रयास करना चाहिए। आतंकवाद के प्रति चीन जिस तरह नरम रुख अपना रहा है,

उसमें यूएन को चीन की स्थाई सदस्यता खत्म करने पर विचार करना चाहिए और भारत-जापान-जर्मनी जैसे देशों को स्थाई सदस्य बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए। सीरिया में बेशक आईएस की कमर तोड़ी गई है और इराक के मोसुल से उसका सफाया किया गया है,

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लेकिन आईएस विश्व में पांव पसार चुका है, इसलिए वह बड़ी चुनौती बनी हुई है। आईएस ही नहीं, अलकायदा, अल शबाब, जैश, लश्कर, हक्कानी, तालिबान जैसे सैकड़ों आतंकी गुट दुनिया में सक्रिय हैं।

सभी देशों को अपनी धरती से आतंकवाद के खात्मे का संकल्प लेना होगा। इसके साथ ही वैसी ग्लोबल वीपन्स कंपनियां जो अपने फायदे के लिए आतंकवाद की फसल में खाद-पानी देते हैं,

उनकी पहचान कर उसके खिलाफ भी कार्रवाई करनी होगी। आक्रामक जीरो टॉलरेंस नीति के साथ चरणबद्ध तरीके से सामूहिक वैश्विक प्रयासों से ही ग्लोबल आतंकवाद का सफाया किया जा सकता है।

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