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संपादकीय : एक साल बाद भी कोरोना से निपटने का तंत्र कमजोर ही

एक साल से सरकार कोरोना प्रबंधन में जुटी हुई है, इसके बावजूद सरकारी अस्पतालों की क्षमता में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी के एक अस्पताल में मरीज से ऑक्सीजन हटा लिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। लखनऊ में पूर्व जज की पत्नी को उचित इलाज नहीं मिला, जिससे उनकी मौत हो गई। उनके शव का अंतिम संस्कार का भी इंतजाम नहीं किया गया।

43 people died from corona in Bihar including Patna Coronavirus latest update
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प्रतीकात्मक तस्वीर

हरिभूमि संपादकीय: एक तरफ कोरोना महामारी फिर से विकराल रूप धारण कर रही है, दूसरी तरफ हमारे अस्पताल व सरकारी प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता सामने आ रही है। एक साल से सरकार कोरोना प्रबंधन में जुटी हुई है, इसके बावजूद सरकारी अस्पतालों की क्षमता में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी के एक अस्पताल में मरीज से ऑक्सीजन हटा लिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। लखनऊ में पूर्व जज की पत्नी को उचित इलाज नहीं मिला, जिससे उनकी मौत हो गई। उनके शव का अंतिम संस्कार का भी इंतजाम नहीं किया गया। बिहार के नालंदा में पूर्व फौजी की अस्पताल में भर्ती नहीं किए जाने से उनकी मौत हो गई। जबलपुर के दो अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी पांच मरीज की जान चली गई।

कोरोना की दूसरी लहर में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा आदि राजयों में अस्पतालों में बेड कम पड़ रही है, ऑक्सीजन और रेमडेसिविर इंजेक्शन का संकट बना हुआ है। ऑक्सीजन की कमी और बेहतर इलाज न मिल पाने के कारण कई राज्यों में मौतों का आंकड़ा बढ़ गया है। में श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ रही है। अस्पताल की लापरवाही सामने आ रही है। ये कुछ वानगी हैं कि हमारी सरकारी अस्पतालों की क्या स्थिति है। एक साल से अधिक समय से देश व राज्य की सरकारें कोरोना के नाम पर सभी कामों को छोड़ कर स्वास्थ्य सेवा दुरुस्त करने का दावा कर रह रही हैँ, लेकिन स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं दिखाई दे रहा है। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे का उसी नालंदा अस्पताल में दौरा होता है, तो अस्पताल के सभी प्रशासनिक अमला पीपीई किट में आवभगत करते दिखते हैं, जिसमें एक इमरजेंसी में पूर्व फौजी मरीज की भर्ती नहीं होती है और मौत हो जाती है। एमपी के मंत्री प्रेम सिंह पटेल कोरोना से हो रही मृत्यु पर शर्मनाक बयान देते हैं कि 'उम्र हो जाती है तो मरना भी पड़ता है।'

नित कोरोना की स्थिति विस्फोटक होने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने ब्लॉक द चेन कर्फ्यू लगाया है, जिससे वहां से मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। अभी तक रेल सेवा सुचारू नहीं हुई है और मजदूरों के पलायन शुरू होने से मुंबई में स्टेशनों पर प्रवासियों की भीड़ बेबसी में फंसी हुई है। ट्रेंनें हैं नहीं और प्रवासी मजदूरों की भीड़ पर पुलिस डंडे से सख्ती करती दिख रही है। जबकि प्रवासी मजदूरों के पलायन की त्रासदी देश ने देखा है, पिछले साल सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई थी, करोड़ों मजदूर सड़कों पर थे, तो सबक लेते हुए इस बार रेल प्रशासन को समय रहते इंतजाम करना चाहिए, लेकिन वह हाथ पर हाथ धरे बैठा है, मानो वह स्थिति के विस्फोटक होने का इंतजार कर रहा है। चुनाव वाले पांच राज्यों के 1 अप्रैल से 14 अप्रैल तक के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में 420 फीसदी, असम में 532 फीसदी, तमिलनाडु में 159 फीसदी, केरल में 103 फीसदी और पुड्डुचेरी में 165 फीसदी कोरोना केस बढ़ गए।

इन पांच राज्यों में औसतन मौतों में भी 45 प्रतिशत का इजाफा हो गया है। चुनाव प्रचार के लिए रैलियों के दौरान राजनीतिक दलों ने दो गज की दूरी, मास्क आदि नियमों की धज्जियां उड़ाईं। राजस्थान में पांच बजे से ही सख्त नाइट कर्फ्यू लगा दिया है। दिल्ली ने शुक्रवार शाम से सोमवार सुबह तक वीकेंड कर्फ्यू लगाया है। धीरे-धीरे अघोषित लॉकडाउन के दौर की वापसी हो रही है। एक साल बाद भी कोरोना पीड़ितों से निपटने का सरकारी तंत्र कमजोर ही है। आखिर सरकारें कब जागेंगी?

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