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शशिधर खान का लेख : मीठी-कड़वी यादों का आपातकाल

जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन का बिगुल बजा। इंदिरा गांध्ाी विरोध्ाी तकरीबन सभी छोटी पार्टियां जेेपी के पूरी व्यवस्था में बदलाव वाले जेपी के झंडे के नीचे आ गई। उनमें इंदिरा गांध्ाी से मतभेद रखने वाले बड़े कांग्रेसी नेता भी थे।

शशिधर खान का लेख :  मीठी-कड़वी यादों का आपातकाल
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शशिधर खान

26 जून 1975 को प्रधनमंत्री इंदिरा गांधी ने देश को आंतरिक खतरा बताकर इमरजेंसी लागू कर दी और अपने खिलाफ आंदोलन करने वाले सभी विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया। मीडिया पर भी पाबंदी लगा दी। धरपकड़ अभियान तो 1974 से ही शुरू हो गया, जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन का बिगुल बजा। इंदिरा गांधी विरोधी तकरीबन सभी छोटी पार्टियां जेेपी के पूरी व्यवस्था में बदलाव वाले जेपी के झंडे के नीचे आ गई। उनमें इंदिरा गांध्ाी से मतभेद रखने वाले बड़े कांग्रेसी नेता भी थे।

जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया, वे पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की बात हर जनसभा में करते थे। आपातकाल के समय मैं पटना काॅलेज में बीए का छात्रा था। आंदोलन की शुरुआत से लेकर आपातकाल के सारे हालातों का चश्मदीद गवाह हूूं। जेपी को नजदीक से देखा, सुना। 45 साल में जो कुछ गुजरा और जो व्यवस्था अभी देश की आंखों के सामने हैं, उसमें आपातकाल के दिन याद आ आते हैं। लोग आपातकाल के दिनों की व्यवस्था कुछ और अर्थ में याद करते हैं। आम लोग इसे सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था में उलटफेर से ज्यादा नहीं समझते और उसमें भी इंदिरा विरोधियों को सत्ता लाभ से ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो पाया। एकजुट हुए कुनबे जनता पार्टी में टूटने-बिखरने का कुछ ही दिनों में ऐसा सिलसिला चला, जो 45वें साल में भी समाप्त नहीं हुआ है।

1977 में आम चुनाव के बाद जो जनता पार्टी सरकार बनी, उसमें इंदिरा विरोध्ाी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई का प्रधनमंत्री बनने का सपना पूरा हुआ। मोरारजी के बाद फिर उसी सत्ता बदलाव आंदोलन को भुनाकर चौधरी चरण सिंह, चन्द्रशेखर जैसे नेताओं का प्रधनमंत्री बनने का सपना पूरा हुआ। इतना सब होने के बावजूद इंदिरा गांधी भारी बहुमत से सत्ता में लौटीं। अगर इंदिरा गांधी की हत्या नहीं होती तो राजीव गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। 1991 में अगर राजीव गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। उसके बाद तो इंदिरा गांधी और कांग्रेस विरोधी नेताओं के कांग्रेस के अप्रत्यक्ष समर्थन से प्रधानमंत्री बनने का तांता लग गया। विश्वनाथ प्रताप सिंह, इन्द्रकुमार गुजराल, एचडी. देवेगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने की कहानी लोग जानते हैं।

जेपी आंदोलन से उपजे अलग-अलग गुटों में बंटे सारे नेताओं का कांग्रेस और भाजपा के साथ सत्ता का गठजोड़ चलता रहा है। जनता पार्टी का एकमात्र घटक जनसंघ है, जिसका कांग्रेस से कभी गठजोड़ नहीं हुआ। इमरजेंसी के बाद से अब तक भाजपा देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरी। ये वही संगठन है, जिसका जनसंघ के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास वजूद नहीं था। जो भाजपा कांग्रेस का विकल्प और देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कही जाती थी, उसने कांग्रेस को इस हालत में ला दिया कि भाजपा का तगड़ा विकल्प बनना कठिन हो रहा है। यह तो हुई राजनीतिक व्यवस्था की बात। अवाम की जिंदगी के बीच चर्चा का विषय दूसरा है। आपातकाल के बारे में बुजुर्ग लोग अलग तरीके से बतियाते हैं। जबकि भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले अन्य बातों पर मंथन करते हैं। मगर कुछ बिंदुओं पर जन तथा देश की आम राय है, जो मौजूदा जनादेश की कही-अनकही है।

2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई और 2019 में फिर वैसा ही जनादेश लेकर लौटी। इंदिरा गांध्ाी के समय और उसके पहले राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प नहीं था। देश में हमेशा यही बात कही जाती थी कि राज को कांग्रेस ही कर सकती है। 1980 में जनसंघ भाजपा के रूप में नए कलेवर के साथ आई। आपातकाल के पुलिसराज में जनसंघ के संगठन आरएसएस पर कहर बरपा, जो समाजवादी नेता जेपी का पक्का अनुयायी था। नक्सलियों पर भी शिकंजा कसा गया। जनसंघ के कारण नक्सली गुट जेपी के साथ नहीं आए। वाम दलों में सीपीएम जेपी के साथ थी और सीपीआई इंदिरा गांध्ाी के साथ। यह एक ऐसा मौका था, जब वामदल बंटे हुए नजर आ रहे थे। अब आपात्ाकाल के 45वें साल में आज वामदलों को अपना अस्तित्व बचाना कठिन हो रहा है। वे एक के बाद एक जनाधार खोते जा रहे हैं।

ट्रेनों में हमेशा जिस समस्या की ज्यादा चर्चा होती है, वो है लेटलतीफी। एक कहते हैं भाई इमरजेंसी मेें हालात सुधार गए थे। गाड़ियां समय से खुलती थी, समय से पहुंचती थी। बेटिकट यात्रियों का चलना कम हो गया था। चारों तरफ कड़ाई थी। दूसरा यात्री, उतना ही नहीं, कार्यालयों में लोग समय पर आते थे, अपनी ड्यूटी करते थे। डर सा समाया रहता था, लोगों का काम होता था, दौड़ना नहीं पड़ता था। तीसरे यात्री, स्कूलों, काॅलेजों में पढ़ाई होती थी। चोरबाजारियों को इंदिरा ने जेल में डाल दिया था। जनसाधरण की इमरजेंसी से जुड़ी अधिकांश यादें मीठी हैं। बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो यह कहेंगे कि उन दिनों ये गलत हुआ, ये ठीक नहीं हुआ। हां, कुछ नेताओं को जरूर इससे परेशानी हुई।

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