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सुशील राजेश का लेख : उखड़ती सांसों का 'आपातकाल'

आपातकाल की खबर यह है कि चिकित्सकों ने अभी से आगाह करना शुरू कर दिया है कि अगले चार महीने में वायरस की तीसरी लहर भी देखनी पड़ सकती है। कुछ विशेषज्ञों ने चौथी लहर की भी चेतावनी दी है और अभी से सचेत किया है।

सुशील राजेश का लेख :  उखड़ती सांसों का आपातकाल
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सुशील राजेश

सुशील राजेश

सर्वाेच्च न्यायालय की सटीक टिप्पणी थी कि देश में 'राष्ट्रीय आपातकाल' जैसे हालात हैं। आपातकाल शब्द सुनते और पढ़ते ही एक सहमी और डरावनी-सी याद ताज़ा होने लगती है। आपातकाल 1975 में थोपा गया था। वह लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि संवैधानिक शक्तियों का 'तानाशाही' इस्तेमाल था। उस काले अध्याय को देश के तमाम नागरिक भूलना चाहते होंगे। अब सर्वोच्च अदालत ने जिस राष्ट्रीय आपातकाल की चिंता जताई है, वह बुनियादी तौर पर कोरोना संक्रमण के क्रूर प्रहारों से जुड़ी है, लेकिन कार्यकारी और चिकित्सीय व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है। भारत के संविधान में 'राष्ट्रीय आपातकाल' से जुड़े अनुच्छेदों का उल्लेख है। अनुच्छेद 352 में युद्ध या बाहरी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह सरीखी स्थितियों का उल्लेख किया गया है।

मूल संविधान में 'आंतरिक अशांति' का उल्लेख था, लेकिन 1972 में 44वें संविधान संशोधन के तहत उसे बदलकर 'सशस्त्र विद्रोह' कर दिया गया। कोरोना के कारण देश में जो हालात बने हैं, वे किसी 'आंतरिक अशांति' से कम नहीं हैं। दरअसल अनुच्छेद 352 को ही 'राष्ट्रीय आपातकाल' के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा, अनुच्छेद 360 में व्याख्या की गई है कि भारत की वित्तीय अस्थिरता या ऋण के लिए खतरा होने के कारण 'वित्तीय आपातकाल' की घोषणा की जा सकती है। सभी तरह के आपातकालों का फैसला केंद्रीय कैबिनेट लेती है और राष्ट्रपति उसे अंतिम स्वीकृति देते हैं। 1980 में सर्वोच्च अदालत ने ही फैसला सुनाया था कि किसी भी तरह के आपातकाल की घोषणा को अदालत में चुनौती दी सकती है। संविधान के अनुच्छेद 352 से 360 तक में आपातकाल से जुड़े उपबंधों की व्याख्या की गई है। मकसद है कि देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता, लोकतांत्रिक एवं राजनीतिक व्यवस्था और संविधान की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके, लिहाजा आपातकाल लगाया जा सकता है।

फिलहाल सर्वोच्च अदालत ने जिन संदर्भों में 'राष्ट्रीय आपातकाल' की टिप्पणी की है, वह देश की चौतरफा सुरक्षा के मद्देनजर इतनी गंभीर नहीं है, जितनी नाराज़गी व्यवस्था, स्वास्थ्य ढांचे और केंद्र सरकार की उदासीनता को लेकर जताई गई है। यकीनन यह कोरोना की मारक संक्रामकता का दौर है, लिहाजा सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना पड़ा कि आॅक्सीजन की कमी, दवाओं की किल्लत, टीकाकरण की प्रक्रिया और तालाबंदी के अधिकार पर केंद्र सरकार की कोई राष्ट्रीय योजना या नीति है अथवा नहीं? सर्वोच्च न्यायालय को इस मुद्दे पर सुनवाई करनी है। तारीख 27 अप्रैल तय की गई है। जाहिर है कि उसके फैसले की मीमांसा बाद में ही की जा सकेगी। फिलहाल 'आपातकाल' शब्द की चिंता और प्रासंगिकता का विश्लेषण अनिवार्य है। राजधानी के एक नामी अस्पताल में कोरोना के 25 मरीज मर गए, क्योंकि उन्हें आक्सीजन नहीं मिल पाई। राजधानी के ही एक अन्य अस्पताल में आॅक्सीजन की कमी के कारण 20 कोविड मरीजों ने दम तोड़ दिया। मुंबई के विरार में एक कोविड अस्पताल में आग लग गई और 15 मरीज मर गए। देश की राजधानी दिल्ली में ही सुनते रहे हैं कि कहीं 45 मिनट की आॅक्सीजन बची है, तो कहीं 2-4 घंटों या कुछ ज्यादा देर के लिए प्राण-वायु शेष है। कोरोना के असंख्य मरीज इन अस्पतालों में आॅक्सीजन के सहारे जिंदा हैं। जीवन और मौत के बीच इतनी अनिश्चितता कि आदमी सोचने पर मजबूर है कि संक्रमण होने पर भी अस्पताल जाएं या नहीं। यह स्थिति आपातकाल नहीं है, तो क्या है?

भारत सरकार के महंगे वकील सर्वोच्च अदालत में भी सरकार का पक्ष मजबूती से रख लेंगे और एक योजना का खाका भी पेश कर देंगे, लेकिन सरकार को पिछले लाॅकडाउन के एक सप्ताह बाद ही चेतावनी दे दी गई थी कि देश में आक्सीजन की आपूर्ति की कमी हो सकती है। वह चेतावनी किसी विपक्ष की नहीं थी, बल्कि भारत सरकार ने जो 11 अधिकारप्राप्त समूह गठित कर रखे हैं, उनमें एक समूह ने ही बैठक के बाद चेताया था। बीती 1 अप्रैल, 2020 को सम्पन्न बैठक की अध्यक्षता नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने की थी और करीब 7-8 मंत्रालयों के बड़े अफसरों ने भी भाग लिया था। अक्तूबर में भी टास्क फोर्स ने यह चेतावनी दोहराई थी। उनकी चेतावनी का कोई तो सशक्त आधार होगा। अब फिर प्रधानमंत्री मोदी लगातार बैठकें कर रहे हैं। अफसर भी मौजूद रहे और कोरोना से सबसे ज्यादा ग्रस्त 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी संवाद किया गया। आॅक्सीजन की कंपनियों के प्रमुखों से भी प्रधानमंत्री ने बातचीत की है। टाटा स्टील, जिंदल स्टील, रिलायंस, स्टील अथाॅरिटी आॅफ इंडिया सरीखे संस्थान और कंपनियां अब आॅक्सीजन सप्लाई कर रही हैं। अस्पतालों के लिए तरल आक्सीजन की व्यवस्था दिसंबर तक की जा सकती थी, जब अमेरिका और ब्रिटेन में उबलते कोरोना संक्रमण ने स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि वायरस का उनका प्रकार भारत पर भी हमला बोल सकता है। सवाल यह है कि अब एकदम हाथ-पांव क्यों फूलने लगे हैं? करीब एक साल पहले जिन संसदीय समितियों और समूहों ने सरकार को चेताया था,उस पर क्या अमल किए गए? अमल क्यों नहीं किए गए? यदि अमल किए गए, तो सरकार पहले से ही तैयार क्यों नहीं रही? त्रासदियां क्यों हो रही हैं? आशंकाएं और खतरे क्यों बरकरार हैं?

आज वायुसेना के विमान आकाश में उड़ते दिख रहे हैं। रेलवे की सेवा भी शुरू कर दी गई है। जर्मनी से आक्सीजन उत्पादन की यूनिट्स मंगवानी पड़ रही हैं। सिंगापुर से भी बंदोबस्त किया जा रहा है। सरकार ने 50,000 मीट्रिक टन आक्सीजन आयात करने का आॅर्डर दिया है। भारत सरकार ने बीते अक्तूबर में प्राण-वायु के 162 प्लांट स्थापित करने का निर्णय लिया था। उनमें से सिर्फ 30-32 ही लगाए जा सके हैं। दावा किया जा रहा है कि जून के अंत तक सभी प्लांट स्थापित कर दिए जाएंगे। यह विलंब क्यों हुआ, सरकार से शायद सर्वोच्च अदालत ही पूछेगी। भारत में आक्सीजन के उत्पादन की किल्लत नहीं है, लेकिन जो मांग 5000 मीट्रिक टन होती थी, वह कोरोना के मौजूदा दौर में 8000 एमटी तक बढ़ गई है। इस फासले की भरपाई कौन करेगा और कैसे होगी? जाहिर है कि संकट पैदा होगा। आपातकाल की खबर यह है कि प्रख्यात चिकित्सकों ने अभी से आगाह करना शुरू कर दिया है कि अगले चार महीने में वायरस की तीसरी लहर भी देखनी पड़ सकती है। कुछ विशेषज्ञों ने चौथी लहर की भी चेतावनी दी है और अभी से तैयारी करने को सचेत किया है। बहरहाल ऐसे आपातकाल पर गंभीर संज्ञान लिया जाना चाहिए।

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