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तेजी से हो चुनाव सुधार, भारतीय जनतंत्र धनबल और बाहुबल का शिकार

राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया का आगाज 1970 के दशक में ही हो गया था।

तेजी से हो चुनाव सुधार, भारतीय जनतंत्र धनबल और बाहुबल का शिकार
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भारत के जंग-ए-आजादी के योद्धाओं ने भारतीय संविधान की संरचना की और भारत के लिए जनतांत्रिक तौर तरीकों से हूकुमत के निर्माण के लिए जनतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया का निर्देश दिया था। भारतीय जनतंत्र के तहत वास्तविक तौर पर चुनाव प्रक्रिया का जो स्वरूप सामने आ गया है वह निराशाजनक है। भारतीय जनतंत्र की सबसे विराट विकृति रही है कि जनतंत्र धनबल और बाहुबल का शिकार बन चुका है।
जनतंत्र की विकृतियों के चलते लोकसभा और विधानसभा धनकुबेरों और बाहुबलियों के आधिपत्य के तले दबकर सिसक रही हैं। राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया का आगाज तो 1970 के दशक में ही हो गया था किंतु इसका प्रकोप 1990 के दशक के दौरान सामने आया। इस पर लगाम कसने के लिए केद्रीय हुकूमत द्वारा अनेक कमेटियों का गठन किया गया जिनमें एनएन वोहरा कमेटी और इंद्रजीत गुप्त कमेटी का उल्लेख करना उचित होगा क्योंकि बड़ी ही शिद्दत के साथ इन कमेटियों द्वारा राजनीति का अपराधीकरण पर रोक लगाने के लिए बुनियादी रूप से चुनाव प्रक्रिया में सुधीर करने की अनुशंसा की गई थी।
इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इन कमेटियों की अनुशंसाओं को हुकूमत द्वारा बट्टे खाते में डाल दिया गया। आज के दौर की तल्ख हकीकत है कि लोकसभा की सीटों पर करीब चौंतीस प्रतिशत सदस्य रजिस्टर्ड अपराधी विराजमान हैं। विधानसभाओं की सीटों पर करीब चालीस फीसदी रजिस्टर्ड अपराधी विराजमान है। राज्यसभा सीटों पर करीब पचास फीसदी धनकुबेर विराजमान हैं। काली दौलत के रखवालों की ताकत चुनाव फतह की प्रक्रिया में निर्णायक सिद्ध हो रही है। अपराधी माफिया गिरोह के अनेक सरगना राजनेता का चोला धारण करके अग्रिम कतारों में जा खड़े हुए हैं।
भारतीय जनतंत्र की चुनाव प्रणाली में गहन सुधार अंजाम देने की महती आवश्यकता बनी रही। चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित चुनाव खर्च की सरहद एक मजाक बनकर रह गई है। राजनीतिक पार्टी द्वारा चुनाव में किए गए खर्च को चुनाव प्रत्याशी द्वारा किए जाने वाले खर्च से पृथक रखा गया है। विगत अनेक दशक से अत: काली दौलत का प्रभुत्व जनतांत्रिक चुनाव के सिर पर सवार रहा है। राजनीतिक पार्टियों के प्रदान किए जाने वाले चंदे का कतई कोई पारदर्शी चरित्र स्थापित नहीं हो सका है। फिलहाल तो कानूनी तौर पर बीस हजार रुपये तक का चंदा राजनीतिक पार्टियां नकद राशि के तौर पर प्राप्त कर सकती थी। इस छूट के आधार पर पार्टियों ने काली दौलत का अंबार अपने खजाने में लगा दिया।
हालांकि अब नकद चंदे की राशि को दो हजार रुपये किया है, लेकिन चुनाव में सुधार प्रक्रिया में प्रथम कदम के तौर पर चुनाव आयोग द्वारा नकद राशि को पूर्णत: समाप्त किया जाना चाहिए। इस दिशा में दूसरा कदम चुनाव प्रक्रिया से अपराधी तत्वों को पूर्णत: मुक्त करना है। अपराधी तत्वों को चुनाव प्रक्रिया से पृथक करने की प्राथमिक शर्त होनी चाहिए कि इन जघन्य तत्वों को चुनाव में उतरने से ही रोक दिया जाए। इसके लिए उन सभी राजनीतिक पार्टियों को आगे आना चाहिए जो राजनीति के शुद्धिकरण करने करने की दुहाई देते रहे हैं। भारतीय जनमानस की प्रबल जागरुकता ही राजनीति के अलंबरदारों को इस वैधानिक कदम के विवश कर सकती है कि चुनाव सुधारों के लिए वैधानिक प्रक्रिया का शुभारंभ हो सकता है।
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