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उमेश चतुर्वेदी का लेख : नाकाम रही शिक्षा व्यवस्था

नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों के प्री प्राथमिक स्तर के 44.2 प्रतिशत छात्र ही सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्तर के 73.7 प्रतिशत और उच्च प्राथमिक यानी छठवीं से आठवीं कक्षा तक के 76.1 प्रतिशत, सेकेंडरी और हायर सेंकेंडरी स्तर के 68 प्रतिशत छात्र ही सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थी हैं। ग्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी स्तर तक के सरकारी विद्यालयों के प्रति रूझान है। लेकिन उच्च शिक्षा के स्तर पर यह रूझान ग्रामीण क्षेत्रों में भी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों के आधे से भी कम यानी 49.7 फीसद छात्र ही सरकारी कॉलेजों में शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

उमेश चतुर्वेदी का लेख : नाकाम रही शिक्षा व्यवस्था
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उमेश चतुर्वेदी

देश में इन दिनों नई शिक्षा नीति की धूम है। 34 साल बाद आई नई शिक्षा नीति का गुणदोष के आधार पर स्वागत होना चाहिए। इसी बीच राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की भी एक रिपोर्ट आई है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था की हालत पर आंख खोलने वाली इस रिपोर्ट पर ध्यान दिया जाना चाहिए। शिक्षा पर सामाजिक-पारिवारिक उपभोग शीर्षक वाली इस रिपोर्ट के आंकड़े सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति लोगों के भरोसे को जाहिर करती है। यह जताती है कि जिस शिक्षा व्यवस्था पर भारत सरकार देश की जीडीपी का करीब चार फीसदी खर्च कर रही है, जिसके लिए केंद्रीय बजट में 99 हजार 300 करोड़ के खर्च का प्रावधान किया गया है, वह अपने ही नागरिकों को आकर्षित करने में नाकाम साबित हो रही है।

आखिर इस नाकामी की वजह क्या है? इसकी मीमांसा से पहले जान लेते हैं कि नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े क्या कहते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण भारत को सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा है। हालांकि कुछ जानकार बताते हैं कि भरोसे से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्र में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों की मजबूरी है कि वे चाहकर भी निजी क्षेत्र की शिक्षा अपने बच्चों को नहीं दिला सकते। नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों के प्री प्राथमिक स्तर के 44.2 प्रतिशत छात्र ही सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्तर के 73.7 प्रतिशत और उच्च प्राथमिक यानी छठवीं से आठवीं कक्षा तक के 76.1 प्रतिशत, सेकेंडरी और हायर सेंकेंडरी स्तर के 68 प्रतिशत छात्र ही सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थी हैं। ग्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी स्तर तक के सरकारी विद्यालयों के प्रति रूझान है। लेकिन उच्च शिक्षा के स्तर पर यह रूझान ग्रामीण क्षेत्रों में भी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों के आधे से भी कम यानी 49.7 फीसद छात्र ही सरकारी कॉलेजों में शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

इसी सर्वेक्षण के मुताबिक शहरों के सरकारी विद्यालयों के प्रति छात्रों के रूझान को देखना चाहिए। शहरों के प्री प्राथमिक छात्रों का 68.8 प्रतिशत हिस्सा जहां निजी विद्यालयों में पढ़ रहा है। जबकि सिर्फ 13.9 फीसद बच्चे ही सरकारी विद्यालयों में पढ़ने जाते हैं। बाकी सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। इसी तरह शहरी इलाके के प्राथमिक स्तर के 50.5 फीसद बच्चे जहां निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, वहीं 18.2 प्रतिशत बच्चे सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं। जाहिर है कि शहरी इलाके में प्राथमिक स्तर के सिर्फ 31.3 प्रतिशत बच्चे ही सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं।

इस रिपोर्ट से एक बात साफ है कि देश में निजी स्कूलों और संस्थानों ने अपना दबदबा बना लिया है। दिलचस्प यह है कि निजी क्षेत्रों के कुछ प्रतिष्ठित और नामी स्कूलों-कॉलेजों को छोड़ दें तो योग्य प्राध्यापक या अध्यापक नहीं है। सरकारी क्षेत्र में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार के कुछ अपवादों को छोड़ दें तो यहां अध्यापकों के लिए निर्धारित योग्यता में कमी नहीं है। सरकारी क्षेत्र के अध्यापक कहीं ज्यादा योग्य और प्रशिक्षित हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर क्या वजह है कि भारी-भरकम बजट, अध्यापकों को बेहतर वेतन के बावजूद सरकारी शिक्षण व्यवस्था लगातार पिछड़ रही है?

हमने जिस तरह की शासन व्यवस्था को अपनाया है, उसमें ऐसी हर कमी के लिए हम सिर्फ सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हम सामाजिक व्यस्था में इंसान की नैतिक जिम्मेदारियों को भूल जाते हैं। सरकारी क्षेत्र में एक बार नौकरी मिल जाने के बाद नागरिक मानने लगता है कि उसका अब एक मात्र काम अवकाश प्राप्ति की तिथि तक हाजिरी लगाना और वेतन प्राप्त करना रह गया है। वह अपनी जिम्मेदारियों को भूलने में देर नहीं लगाता। जबकि निजी क्षेत्र में लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव रहता है।

यह मूल्यों और नैतिकता का क्षरण ही कहा जाएगा कि आज शासन और प्रशासन में शीर्ष पर जो ताकतें हैं, उनमें से ज्यादातर ने अपनी कम से कम प्राथमिक या सेकेंडरी स्तर की शिक्षा टाट-पट्टी वाले विद्यालयों में पूरी की है, लेकिन कार्य क्षेत्र में प्रभावशाली बनने के बावजूद इन्होंने सामाजिक अवदान के रूप में इन विद्यालयों या शिक्षा को ताकत देने, उनका नैतिक ढांचा सुधारने और उनमें जवाबदेही और जिम्मेदारी बढ़ाने पर जोर नहीं दिया। यह उस देश के लिए निश्चित ही बदहाली का प्रतीक है, जिसके यहां आज से तीस-चालीस साल पहले तक कम वेतन में भी जवाबदेह अध्यापकों का एक तंत्र था।

जब भी निजीकरण होता है, तब उसे लेकर सरकारों पर सवाल उठता है, लेकिन निजीकरण के पीछे के एक कारण सरकारी कर्मचारी और अधिकारी तंत्र में जवाबदेही और जिम्मेदारी की कमी का सवाल नहीं उठता। यह सही है कि सरकारी शिक्षण तंत्र के सीधे निजीकरण की अभी तक कोशिश नहीं हुई है, लेकिन सरकारी शिक्षण तंत्र ने खुद में सकारात्मक बदलाव लाने की संजीदा कोशिश नहीं की तो वह दिन दूर नहीं, जब सरकारी शिक्षण तंत्र के निजीकरण के प्रयास भी शुरू हो जाएंगे। इसलिए बेहतर है कि सरकारी शिक्षण तंत्र अपनी जिम्मेदारी समझे और सरकारें भी उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाएं। जब सरकारी शिक्षा तंत्र जिम्मेदार और चमकते नागरिक तैयार करने लगेगा, तभी वह सवालों से बच सकेगा और आने वाले खतरों से भी...लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या तंत्र इस दिशा में सोचने की भी जहमत करने को तैयार है?

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