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भारत के रत्न महामना मालवीय और वाजपेयी

स्वतंत्रता सेनानी मदन मोहन मालवीय औऱ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत सरकार द्वारा भारत रत्न देने की घोषणा की गई है।

भारत के रत्न महामना मालवीय और वाजपेयी
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स्वतंत्रता सेनानी महामना मदन मोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी निश्चित रूप से भारत के रत्न हैं। भारत सरकार ने दोनों को सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित कर उनके देश निर्माण में योगदान को याद करने का एक अवसर प्रदान किया है। संयोगवश दोनों का जन्म 25 दिसंबर को हुआ था। मालवीय को यह सम्मान मरणोपरांत दिया जा रहा है, जबकि आज अटल बिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति से सन्यास ले चुके हैं। देखा जाए तो इन दोनों विभूतियों का जीवन सफर भारतीय राजनीति व लोकतंत्र की यात्रा का दर्शन कराते हैं। मालवीय ने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी मिलने तक और वाजपेयी ने आजादी मिलने से अब तक के भारत को खासा प्रभावित किया है।

मदन मोहन मालवीय कांग्रेस की स्थापना के शुरुआती साल में ही राजनीति में आ गए थे। वह 1909 से 1918 के बीच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। मालवीय को स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सशक्त भूमिका और हिंदू राष्ट्रवाद के प्रति उनके समर्थन के लिए भी याद किया जाता है। उन्होंने हिंदू महासभा की स्थापना की थी। उनकी मुख्य उपलब्धियों में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना भी शामिल है। उन्होंने इसकी स्थापना तब की थी, जब देश गुलाम था। यह विश्वविद्यालय आज देश-विदेश के छात्रों में शिक्षा का अलख जगा रहा है। वे देश के एकमात्र ऐसी शख्सियत थे, जिन्हें महामना की उपाधि से नवाजा गया था।

वे एक ही साथ स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, शिक्षाविद्, विधिवेत्ता, पत्रकार और राजनीतिज्ञ थे। भारत की आजादी के एक साल पहले ही उनका निधन हो गया था। वहीं भारत छोड़ो आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता रहे अटल बिहारी वाजपेयी आजाद भारत में पहली बार 1957 में लोकसभा में आए, जहां उनकी वाक् कला से प्रभावित होकर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था की यह लड़का एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। वह मौका भी आया जब उनके नेतृत्व में भाजपा ने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई। वे देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे-पहली बार 13 दोनों के लिए, दूसरी बार 13 माह के लिए और तीसरी बार पूरे पांच साल देश का नेतृत्व किया। इस प्रकार वे गैर-कांग्रेसी पार्टी के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था।

अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। वे दस बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। वाजपेयी को मोरारजी देसाई सरकार में विदेशमंत्री के रूप में काफी प्रसिद्धि मिली थी, जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया था। देश में गठबंधन की राजनीति को दिशा देने का काम वाजपेयी ने ही किया है। उन्होंने अपने नेतृत्व में 24 पार्टियों को साथ लेकर पहली बार केंद्र में राजग सरकार को पांच साल चलाया।

आजाद भारत में शायद ही कोईहो जो वाजपेयी के व्यक्तित्व से प्रभावित नहीं हुआ हो। ये दोनों नेता भारतीय राजनीति के अजातशत्रु की तरह हैं। इन दोनों नेताओं को किसी एक विचारधारा में नहीं बांधा जा सकता। यही वजह है कि दोनों दलगत राजनीति से ऊपर सर्वमान्य नेता के रूप में पहचाने जाते हैं।

मालवीय का योगदान जहां देश को आजाद करने में रहा वहीं वाजपेयी ने स्वतंत्र भारत को दिशा देने का काम किया है। देश आज जिस मुकाम पर खड़ा है निश्चित रूप से इन दोनों के योगदान के बिना संभव नहीं हो पाता। आज देश के युवाओं को इनकी जीवन शैली से पे्ररणा लेनी चाहिए।

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