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चितंनः सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अविवाहित मां के हक में ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम आदेश एक अविवाहित मां की याचिका पर दिया है।

चितंनः सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अविवाहित मां के हक में ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि बिन ब्याही मां को अपने बच्चे की गाजिर्यनशिप पाने के लिए बच्चे के पिता का नाम बताने और उसकी सहमति जरूरी नहीं है। जस्टिस विक्रमजीत सेन की अध्यक्षता वाली बेंच ने दिल्ली की निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा है कि यदि एकल अभिभावक या अविवाहित मां अगर बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करती है तो संबंधित अथॉरिटी को जन्म प्रमाण पत्र देना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम आदेश एक अविवाहित मां की याचिका पर दिया है, जिसमें गाजिर्यनशिप पाने की प्रक्रिया में पिता को शामिल करने को जरूरी बताने को चुनौती दी गई थी, भले ही महिला ने उससे शादी न की हो। वर्तमान कानून के अनुसार पिता से सहमति के लिए उसे नोटिस भेजना जरूरी होता था। आज हमारा समाज तेजी से बदल रहा है। ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है जो स्वयं बच्चों का पालन पोषण करना चाहती हैं। ऐसे में इस तरह की शर्त रखना कि मां को गाजिर्यनशिप देने के लिए पिता की अनुमति जरूरी है और वह भी तब जब पिता न तो बच्चे को साथ रखने का इच्छुक है और न ही उसे बच्चे से कोई मतलब है, उचित नहीं है। अब इस फैसले के बाद देश में कोई भी अविवाहित मां अपने बच्चे का कानूनी तौर पर एकल अभिभावक बन सकेगी। इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि संबंधित मां अपने बच्चे के पिता का नाम जाहिर किए बिना ही एक अभिभावक के सारे अधिकार हासिल कर सकती है। वह उसका अपने स्तर पर संरक्षण कर सकेगी। इससे उन महिलाओं की निजता के अधिकारों की रक्षा होगी। साथ ही देश में लैंगिक भेदभाव को भी दूर किया जा सकेगा।
आज हमारे समाज में बिन ब्याही मांओं की कैसी स्थिति है इसे बताने की ज्यादा जरूरत नहीं है। आज भी हमारा समाज उन्हें सहजता से नहीं लेता है जिससे उन्हें हर स्तर पर उपेक्षा और अपमान का शिकार होना पड़ता है। उन्हें घुट घुट कर जीने को मजबूर होना पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ता है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निश्चित रूप से हालात बदलेंगे और ऐसी मांएं अपने बच्चों की परवरिश कहीं बेहतर तरीके से कर सकेंगी। इससे पहले भी उन महिलाओं को अपने बच्चे का कानूनी संरक्षण प्राप्त करने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी है, जो तलाक लेने या दूसरे कारणों से अपने पति के साथ नहीं रहती हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले में पिता की अनुपस्थिति यानी पति-पत्नी के बीच तलाक होने या अलग रहने के दौरान मां को बच्चे का अभिभावक करार दे चुका है। उससे पूर्व यह अधिकार पिता को ही था। पिता के नहीं रहने पर ही मां कानूनन अभिभावक बन सकती थी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में यह रेखांकित नहीं किया है कि ऐसे बच्चों का उनके पिता के साथ क्या रिश्ते होंगे और बच्चों का पिता की संपत्ति या विरासत पर कोई अधिकार होगा या नहीं? संभव है कि आने वाले दिनों में ऐसे सवाल अदालत के सामने आएंगे तब इस सवाल का हल मिल जाए। दरअसल, बच्चों पर पिता का अधिकार जताने की मानसिकता हमारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का दोष है, उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत के फैसले से समाज की सोच बदलेगी और वह बदलाव की ओर अग्रसर होगा।
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