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बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करती बड़ी आबादी

दूषित पेयजल गंभीर बीमारियों जैसे पीलिया, टायफाइड, हैजा और हेपेटाइटिस के वाहक होते हैं।

बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करती बड़ी आबादी
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नई दिल्ली. अपने नागरिकों को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि पीने का पानी एक मूलभूत जरूरत है और इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में पीने के पानी को नागरिक अधिकारों के दायरे में माना है। संयुक्त राष्ट्र ने भी मानवाधिकारों के दायरे में आने वाली बुनियादी जरूरतों की अपनी सूची में पेयजल को प्रमुखता से जगह दी है, लेकिन परंतु लगता हैकि जनता को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना हमारी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है।
देश की एक दर्दनाक तस्वीर पेश करते हुए संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मणिपुर, मेघालय, झारखंड, असम, ओडिशा और मध्यप्रदेश जैसे कुछ राज्यों के करीब 36 फीसदी परिवारों को पेयजल के लिए अभी भी 500 मीटर से अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो जनगणना 2011 के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के लिए करीब 22 फीसदी ग्रामीण परिवारों को आधे किलोमीटर से अधिक पैदल चलना पड़ता है जबकि शहरी क्षेत्रों के करीब आठ फीसदी परिवारों को पेयजल के लिए सौ मीटर से अधिक पैदल चलना पड़ता है। हालांकि देश में अभी भी कई ऐसे इलाके हैं जहां महिलाओं को पानी लाने के लिए कोसों दूर जाना पड़ता है। उनका अधिकांश समय अपने परिवार को पानी की जरूरतों को पूरा करने में बीतता है। जबकि आजादी के बाद से लोगों को सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल देने के उद्देश्य से करीब 1.65 लाख करोड़ रुपयों से अधिक खर्च किए जा चुके हैं।
सरकार ने देश के सभी गांवों को 2022 तक सौ फीसदी संपूर्ण स्वच्छ बना देने का लक्ष्य रखा है, इसके तहत शौचालयों के निर्माण के साथ-साथ हर परिवार तक स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने की बात कही गई है, परंतु मुश्किल यह है कि लक्ष्य को पाने के लिए जिस सक्रियता और निरंतरता की जरूरत है वह हासिल नहीं की जा सकी है। कार्य निष्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में 50 प्रतिशत की कमी आने की खबरें भी सामने आ चुकी हैं। यही नहीं 12वीं पंचवर्षीय योजना में मंत्रालय के बजट में भी कटौती कर दी गई है, जिससे आने वाले दिनों में पर्याप्त संसाधन के अभाव में इस योजना के शिथिल पड़ने की पूरी संभावना है। वहीं जिन घरों में पानी आता है उनमें खतरनाक रसायन होने की बात आए दिन खबरों में होती है।
दूषित पेयजल गंभीर बीमारियों जैसे पीलिया, टायफाइड, हैजा और हेपेटाइटिस के वाहक होते हैं। इन जलजनित बीमारियों के कारण देश में हर वर्ष लाखों लोगों की मौत हो जाती है। इस देशव्यापी समस्या पर गंभीरता से सोचना सबसे पहली जरूरत होनी चाहिए। जरूरत इस संबंध में न्यायसंगत नीतियां बनाने की है और साथ ही उनके बेहतर क्रियान्वयन के लिए व्यापक जन-भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। इस सच्चाई से देश को रू-ब-रू कराने वाली संसदीय समिति ने भी सरकार से आग्रह किया कि ग्रामीण आबादी को स्वच्छ और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराने के लक्ष्य को पाने में वह पूरी ईमानदारी और निष्ठा दिखाए। अब जिम्मेदारी लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार पर है कि वह इस समस्या से कितनी जल्दी पार पाती है।
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